भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1003

हनूमानुवाच

किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रबोधितः । ननु नाम त्वया कार्या दया भूतेषु जानता ॥ ८७ ॥ हनूमान्‌जी बोले—भाई! मैं तो रोगी हूँ और यहाँ सुखसे सो रहा था। तुमने क्यों मुझे जगा दिया? तुम समझदार हो। तुम्हें सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ ८७ ॥

वयं धर्मं न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः । नरास्तु बुद्धिसम्पन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥ ८८ ॥ हमलोग तो पशुयोनिके प्राणी हैं, अतः धर्मकी बात नहीं जानते; परंतु मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं, अतः वे सब जीवोंपर दया करते हैं ॥ ८८ ॥

क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु । धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ८९ ॥ किंतु पता नहीं, तुम्हारे-जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं? ॥ ८९ ॥

न त्वं धर्मं विजानासि बुधा नोपासितास्त्वया । अल्पबुद्धितया बाल्यादुत्सादयसि यन्मृगान् ॥ ९० ॥ तुम्हें धर्मका बिलकुल ज्ञान नहीं है। मालूम होता है, तुमने विद्वानोंकी सेवा नहीं की है। मन्दबुद्धि होनेके कारण अज्ञानवश तुम यहाँके मृगोंको कष्ट पहुँचाते हो ॥ ९० ॥

ब्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा किमिदं वनमागतः । वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ॥ ९१ ॥ बोलो तो, तुम कौन हो? इस वनमें तुम क्यों और किसलिये आये हो? यहाँ तो न कोई मानवीय भाव हैं और न मनुष्योंका ही प्रवेश है ॥ ९१ ॥

क्व च त्वयाद्य गन्तव्यं प्रब्रूहि पुरुषर्षभ । अतः परमगम्योऽयं पर्वतः सुदुरारुहः ॥ ९२ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! ठीक-ठीक बतलाओ, तुम्हें आज इधर कहाँतक जाना है? यहाँसे आगे तो यह पर्वत अगम्य है। इसपर चढ़ना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ ९२ ॥

विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते । देवलोकस्य मार्गोऽयमगम्यो मानुषैः सदा ॥ ९३ ॥ वीर! सिद्ध पुरुषोंके सिवा और किसीकी यहाँ गति नहीं है। यह देवलोकका मार्ग है, जो मनुष्योंके लिये सदा अगम्य है ॥ ९३ ॥

कारुण्यात् त्वामहं वीर वारयामि निबोध मे । नातः परं त्वया शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ॥ ९४ ॥ वीरवर! मैं दयावश ही तुम्हें आगे जानेसे रोकता हूँ। मेरी बात सुनो। प्रभो! यहाँसे आगे तुम किसी प्रकार जा नहीं सकते। इसपर विश्वास करो ॥ ९४ ॥