भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1002

तं वानरवरं धीमानतिकायं महाबलम् । स्वर्गपन्थानमावृत्य हिमवन्तमिव स्थितम् ॥ ८३ ॥ दृष्ट्वा चैनं महाबाहुरेकं तस्मिन् महावने । अथोपसृत्य तरसा विभीर्भीमस्ततो बली ॥ ८४ ॥ सिंहनादं चकारोग्रं वज्राशनिसमं बली । तेन शब्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥ ८५ ॥

परम बुद्धिमान् बलवान् महाबाहु भीमसेन उस महान् वनमें विशालकाय महाबली वानरराज हनुमान्जीको अकेले ही स्वर्गका मार्ग रोककर हिमालयके समान स्थित देख निर्भय होकर वेगपूर्वक उनके पास गये और वज्र-गर्जनाके समान भयंकर सिंहनाद करने लगे। भीमसेनके उस सिंहनादसे वहाँके मृग और पक्षी थर्रा उठे ॥ ८३—८५ ॥

हनूमांश्च महासत्त्व ईषदन्मील्य लोचने । दृष्ट्वा तमथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः । स्मितेन चैनमासाद्य हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८६ ॥

तब महान् धैर्यशाली हनुमान्जीने आँखें कुछ खोलकर अपने मधुपिंगल नेत्रोंद्वारा अवहेलनापूर्वक उनकी ओर देखा और उन्हें निकट पाकर उनसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा ॥ ८६ ॥