महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगर्जन-तर्जन वज्रपातकी गड़गड़ाहटके समान था। वे विद्युत्पातके सदृश चञ्चल प्रतीत होते थे॥ ७६ ॥ बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम् । स्कन्धभूयिष्ठकायत्वात् तनुमध्यकटीतटम् ॥ ७७ ॥ किंचिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च । लाङ्गूलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ॥ ७८ ॥ उनके कंधे चौड़े और पुष्ट थे। अतः उन्होंने बाँहके मूलभागको तकिया बनाकर उसीपर अपनी मोटी और छोटी ग्रीवाको रख छोड़ा था और उनके शरीरका मध्यभाग एवं कटिप्रदेश पतला था। उनकी लंबी पूँछका अग्रभाग कुछ मुड़ा हुआ था। उसकी रोमावलि घनी थी तथा वह पूँछ ऊपरकी ओर उठकर फहराती हुई ध्वजा-सी सुशोभित होती थी॥ ७७-७८ ॥ ह्रस्वौष्ठं ताम्रजिह्वास्यं रक्तकर्णं चलद्भ्रुवम् । विवृत्तदंष्ट्रादशनं शुक्लतीक्ष्णाग्रशोभितम् ॥ ७९ ॥ अपश्यद् वदनं तस्य रश्मिवन्तमिवोडुपम् । वदनाभ्यन्तरगतैः शुक्लैर्दन्तैरलंकृतम् ॥ ८० ॥ उनके ओठ छोटे थे। जीभ और मुखका रंग ताँबेके समान था। कान भी लाल रंगके ही थे और भौंहें चञ्चल हो रही थीं। उनके खुले हुए मुखमें श्वेत चमकते हुए दाँत और दाढ़ें अपने सफेद और तीखे अग्रभागके द्वारा अत्यन्त शोभा पा रही थीं। इन सबके कारण उनका मुख किरणोंसे प्रकाशित चन्द्रमाके समान दिखायी देता था। मुखके भीतरकी श्वेत दन्तावलि उसकी शोभा बढ़ानेके लिये आभूषणका काम दे रही थी॥ ७९-८० ॥ केसरोत्करसम्मिश्रमशोकानामिवाेत्करम् । हिरण्मयीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् ॥ ८१ ॥ सुवर्णमय कदली-वृक्षोंके बीच विराजमान महातेजस्वी हनुमान्जी ऐसे जान पड़ते थे मानो केसरोंकी क्यारीमें अशोकपुष्पोंका गुच्छ रख दिया गया हो॥ ८१ ॥ दीप्यमानेन वपुषा स्वर्चिष्मन्तमिवानलम् । निरीक्षन्तममित्रघ्नं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥ ८२ ॥ वे शत्रुसूदन वानरवीर अपने कान्तिमान् शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे और अपनी मधुके समान पीली आँखोंसे इधर-उधर देख रहे थे॥