महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गर्जन-तर्जन वज्रपातकी गड़गड़ाहटके समान था। वे विद्युत्पातके सदृश चञ्चल प्रतीत होते थे॥ ७६ ॥ बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम् । स्कन्धभूयिष्ठकायत्वात् तनुमध्यकटीतटम् ॥ ७७ ॥ किंचिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च । लाङ्गूलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ॥ ७८ ॥ उनके कंधे चौड़े और पुष्ट थे। अतः उन्होंने बाँहके मूलभागको तकिया बनाकर उसीपर अपनी मोटी और छोटी ग्रीवाको रख छोड़ा था और उनके शरीरका मध्यभाग एवं कटिप्रदेश पतला था। उनकी लंबी पूँछका अग्रभाग कुछ मुड़ा हुआ था। उसकी रोमावलि घनी थी तथा वह पूँछ ऊपरकी ओर उठकर फहराती हुई ध्वजा-सी सुशोभित होती थी॥ ७७-७८ ॥ ह्रस्वौष्ठं ताम्रजिह्वास्यं रक्तकर्णं चलद्भ्रुवम् । विवृत्तदंष्ट्रादशनं शुक्लतीक्ष्णाग्रशोभितम् ॥ ७९ ॥ अपश्यद् वदनं तस्य रश्मिवन्तमिवोडुपम् । वदनाभ्यन्तरगतैः शुक्लैर्दन्तैरलंकृतम् ॥ ८० ॥ उनके ओठ छोटे थे। जीभ और मुखका रंग ताँबेके समान था। कान भी लाल रंगके ही थे और भौंहें चञ्चल हो रही थीं। उनके खुले हुए मुखमें श्वेत चमकते हुए दाँत और दाढ़ें अपने सफेद और तीखे अग्रभागके द्वारा अत्यन्त शोभा पा रही थीं। इन सबके कारण उनका मुख किरणोंसे प्रकाशित चन्द्रमाके समान दिखायी देता था। मुखके भीतरकी श्वेत दन्तावलि उसकी शोभा बढ़ानेके लिये आभूषणका काम दे रही थी॥ ७९-८० ॥ केसरोत्करसम्मिश्रमशोकानामिवाेत्करम् । हिरण्मयीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् ॥ ८१ ॥ सुवर्णमय कदली-वृक्षोंके बीच विराजमान महातेजस्वी हनुमान्जी ऐसे जान पड़ते थे मानो केसरोंकी क्यारीमें अशोकपुष्पोंका गुच्छ रख दिया गया हो॥ ८१ ॥ दीप्यमानेन वपुषा स्वर्चिष्मन्तमिवानलम् । निरीक्षन्तममित्रघ्नं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥ ८२ ॥ वे शत्रुसूदन वानरवीर अपने कान्तिमान् शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे और अपनी मधुके समान पीली आँखोंसे इधर-उधर देख रहे थे॥
तं वानरवरं धीमानतिकायं महाबलम् । स्वर्गपन्थानमावृत्य हिमवन्तमिव स्थितम् ॥ ८३ ॥ दृष्ट्वा चैनं महाबाहुरेकं तस्मिन् महावने । अथोपसृत्य तरसा विभीर्भीमस्ततो बली ॥ ८४ ॥ सिंहनादं चकारोग्रं वज्राशनिसमं बली । तेन शब्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥ ८५ ॥
परम बुद्धिमान् बलवान् महाबाहु भीमसेन उस महान् वनमें विशालकाय महाबली वानरराज हनुमान्जीको अकेले ही स्वर्गका मार्ग रोककर हिमालयके समान स्थित देख निर्भय होकर वेगपूर्वक उनके पास गये और वज्र-गर्जनाके समान भयंकर सिंहनाद करने लगे। भीमसेनके उस सिंहनादसे वहाँके मृग और पक्षी थर्रा उठे ॥ ८३—८५ ॥
हनूमांश्च महासत्त्व ईषदन्मील्य लोचने । दृष्ट्वा तमथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः । स्मितेन चैनमासाद्य हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८६ ॥
तब महान् धैर्यशाली हनुमान्जीने आँखें कुछ खोलकर अपने मधुपिंगल नेत्रोंद्वारा अवहेलनापूर्वक उनकी ओर देखा और उन्हें निकट पाकर उनसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा ॥ ८६ ॥
हनूमानुवाच
किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रबोधितः । ननु नाम त्वया कार्या दया भूतेषु जानता ॥ ८७ ॥ हनूमान्जी बोले—भाई! मैं तो रोगी हूँ और यहाँ सुखसे सो रहा था। तुमने क्यों मुझे जगा दिया? तुम समझदार हो। तुम्हें सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ ८७ ॥
वयं धर्मं न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः । नरास्तु बुद्धिसम्पन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥ ८८ ॥ हमलोग तो पशुयोनिके प्राणी हैं, अतः धर्मकी बात नहीं जानते; परंतु मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं, अतः वे सब जीवोंपर दया करते हैं ॥ ८८ ॥
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु । धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ८९ ॥ किंतु पता नहीं, तुम्हारे-जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं? ॥ ८९ ॥
न त्वं धर्मं विजानासि बुधा नोपासितास्त्वया । अल्पबुद्धितया बाल्यादुत्सादयसि यन्मृगान् ॥ ९० ॥ तुम्हें धर्मका बिलकुल ज्ञान नहीं है। मालूम होता है, तुमने विद्वानोंकी सेवा नहीं की है। मन्दबुद्धि होनेके कारण अज्ञानवश तुम यहाँके मृगोंको कष्ट पहुँचाते हो ॥ ९० ॥
ब्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा किमिदं वनमागतः । वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ॥ ९१ ॥ बोलो तो, तुम कौन हो? इस वनमें तुम क्यों और किसलिये आये हो? यहाँ तो न कोई मानवीय भाव हैं और न मनुष्योंका ही प्रवेश है ॥ ९१ ॥
क्व च त्वयाद्य गन्तव्यं प्रब्रूहि पुरुषर्षभ । अतः परमगम्योऽयं पर्वतः सुदुरारुहः ॥ ९२ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! ठीक-ठीक बतलाओ, तुम्हें आज इधर कहाँतक जाना है? यहाँसे आगे तो यह पर्वत अगम्य है। इसपर चढ़ना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ ९२ ॥
विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते । देवलोकस्य मार्गोऽयमगम्यो मानुषैः सदा ॥ ९३ ॥ वीर! सिद्ध पुरुषोंके सिवा और किसीकी यहाँ गति नहीं है। यह देवलोकका मार्ग है, जो मनुष्योंके लिये सदा अगम्य है ॥ ९३ ॥
कारुण्यात् त्वामहं वीर वारयामि निबोध मे । नातः परं त्वया शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ॥ ९४ ॥ वीरवर! मैं दयावश ही तुम्हें आगे जानेसे रोकता हूँ। मेरी बात सुनो। प्रभो! यहाँसे आगे तुम किसी प्रकार जा नहीं सकते। इसपर विश्वास करो ॥ ९४ ॥
स्वागतं सर्वथैवेह तवाद्य मनुजर्षभ ।
इमान्यमृतकल्पानि मूलानि च फलानि च ॥ ९५ ॥
भक्षयित्वा निवर्तस्व मा वृथा प्राप्स्यसे वधम् ।
ग्राह्यं यदि वचो मह्यं हितं मनुजपुङ्गव ॥ ९६ ॥
मानवशिरोमणे! आज यहाँ सब प्रकारसे तुम्हारा स्वागत है। ये अमृतके समान मीठे फल-मूल खाकर यहींसे लौट जाओ, अन्यथा व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जायँगे। नरपुंगव! यदि मेरा कथन हितकर जान पड़े तो इसे अवश्य मानो ॥ ९५-९६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
भीमकदलीषण्डप्रवेशे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें भीमसेनका कदलीवनमें प्रवेशविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥
श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य वानरेन्द्रस्य धीमतः ।
भीमसेनस्तदा वीरः प्रोवाचामित्रकर्षणः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय परम बुद्धिमान् वानरराज हनुमान्जीका यह वचन सुनकर शत्रुसूदन वीरवर भीमसेनने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
भीम उवाच
को भवान् किं निमित्तं वा वानरं वपुरास्थितः ।
ब्राह्मणानन्तरो वर्णः क्षत्रियस्त्वां तु पृच्छति ॥ २ ॥
**भीमसेनने पूछा—**आप कौन हैं? और किसलिये वानरका रूप धारण कर रखा है? मैं ब्राह्मणके बादका वर्ण—क्षत्रिय हूँ, और मैं आपसे आपका परिचय पूछता हूँ ॥ २ ॥
कौरवः सोमवंशीयः कुन्त्या गर्भेण धारितः ।
पाण्डवो वायुतनयो भीमसेन इति श्रुतः ॥ ३ ॥
मेरा परिचय इस प्रकार है—मैं चन्द्रवंशी क्षत्रिय हूँ। मेरा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। माता कुन्तीने मुझे गर्भमें धारण किया था। मैं वायुपुत्र पाण्डव हूँ। मेरा नाम भीमसेन है ॥ ३ ॥
स वाक्यं कुरुवीरस्य स्मितेन प्रतिगृह्य तत् ।
हनूमान् वायुतनयो वायुपुत्रमभाषत ॥ ४ ॥
कुरुवीर भीमसेनका वह वचन मन्द मुसकानके साथ सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जीने वायुके ही पुत्र भीमसेनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
हनूमानुवाच
वानरोऽहं न ते मार्गं प्रदास्यामि यथेप्सितम् ।
साधु गच्छ निवर्तस्व मा त्वं प्राप्स्यसि वैशसम् ॥ ५ ॥
**हनुमान्जी बोले—**भैया! मैं वानर हूँ। तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार मार्ग नहीं दूँगा। अच्छा तो यह होगा कि तुम यहींसे लौट जाओ, नहीं तो तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जायेंगे ॥ ५ ॥
भीमसेन उवाच
वैशसं वास्तु यद्धान्यन्न त्वां पृच्छामि वानर ।
प्रयच्छ मार्गमुत्तिष्ठ मा मत्तः प्राप्स्यसे व्यथाम् ॥ ६ ॥
**भीमसेनने कहा—**वानर! मेरे प्राण संकटमें पड़े या और कोई दुष्परिणाम भोगना पड़े, इसके विषयमें तुमसे कुछ नहीं पूछता हूँ। उठो और मुझे आगे जानेके लिये रास्ता दो। ऐसा होनेपर तुमको मेरे हाथोंसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा ।। ६ ।।
हनूमानुवाच
नास्ति शक्तिर्ममोत्थातुं व्याधिना क्लेशितो ह्यहम् ।
यद्यवश्यं प्रयातव्यं लङ्घयित्वा प्रयाहि माम् ।। ७ ।।
**हनुमान्जी बोले—**भाई! मैं रोगसे कष्ट पा रहा हूँ। मुझमें उठनेकी शक्ति नहीं है। यदि तुम्हें जाना अवश्य है तो मुझे लाँघकर चले जाओ ।। ७ ।।
भीम उवाच
निर्गुणः परमात्मा तु देहं व्याप्यावतिष्ठते ।
तमहं ज्ञानविज्ञेयं नावमन्ये न लङ्घये ।। ८ ।।
**भीमसेनने कहा—**निर्गुण परमात्मा समस्त प्राणियोंके शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं। वे ज्ञानसे ही जाननेमें आते हैं। मैं उनका अपमान या उल्लंघन नहीं करूँगा ।। ८ ।।
यद्यागमैर्न विद्यां च तमहं भूतभावनम् ।
क्रमेयं त्वां गिरिं चैव हनूमानिव सागरम् ।। ९ ।।
यदि शास्त्रोंके द्वारा मुझे उन भूतभावन भगवान्के स्वरूपका ज्ञान न होता तो मैं तुम्हींको क्या इस पर्वतको भी उसी प्रकार लाँघ जाता, जैसे हनुमान्जी समुद्रको लाँघ गये थे ।। ९ ।।
हनूमानुवाच
क एष हनुमान् नाम सागरो येन लङ्घितः ।
पृच्छामि त्वां नरश्रेष्ठ कथ्यतां यदि शक्यते ।। १० ।।
**हनुमान्जी बोले—**नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, वह हनुमान् कौन था जो समुद्रको लाँघ गया था? उसके विषयमें यदि तुम कुछ कह सको तो कहो ।। १० ।।
भीम उवाच
भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः ।
रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ।। ११ ।।
**भीमसेनने कहा—**वानरप्रवर श्रीहनुमान्जी मेरे बड़े भाई हैं। वे अपने सद्गुणोंके कारण सबके लिये प्रशंसनीय हैं। वे बुद्धि, बल, धैर्य एवं उत्साहसे युक्त हैं। रामायणमें उनकी बड़ी ख्याति है ।। ११ ।।
रामपत्नीकृते येन शतयोजनविस्तृतः ।
सागरः प्लवगेन्द्रेण क्रमेणैकेन लङ्घितः ।। १२ ।।
वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी सीताजीकी खोज करनेके लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको एक ही छलाँगमें लाँघ गये थे॥ १२॥
स मे भ्राता महावीर्यस्तुल्योऽहं तस्य तेजसा।
बले पराक्रमे युद्धे शक्तोऽहं तव निग्रहे॥ १३॥
वे महापराक्रमी वानरवीर मेरे भाई लगते हैं। मैं भी उन्हींके समान तेजस्वी, बलवान् और पराक्रमी हूँ तथा युद्धमें तुम्हें परास्त कर सकता हूँ॥ १३॥
उत्तिष्ठ देहि मे मार्गं पश्य मे चाद्य पौरुषम्।
मच्छासनमकुर्वाणं त्वां वा नेष्ये यमक्षयम्॥ १४॥
उठो और मुझे रास्ता दो तथा आज मेरा पराक्रम अपनी आँखों देख लो। यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो तुम्हें यमलोक भेज दूँगा॥ १४॥
वैशम्पायन उवाच
विज्ञाय तं बलोन्मत्तं बाहुवीर्येण दर्पितम्।
हृदयेनावहस्यैनं हनूमान् वाक्यमब्रवीत्॥ १५॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेनको बलके अभिमानसे उन्मत्त तथा अपनी भुजाओंके पराक्रमसे घमंडमें भरा हुआ जान हनुमान्जीने मन-ही-मन उनका उपहास करते हुए उनसे इस प्रकार कहा॥ १५॥
हनूमानुवाच
प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरयानघ।
ममानुकम्पया त्वेतत् पुच्छमुत्सार्य गम्यताम्॥ १६॥
**हनुमान्जी बोले—**अनघ! मुझपर कृपा करो। बुढ़ापेके कारण मुझमें उठनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। इसलिये मेरे ऊपर दया करके इस पूँछको हटा दो और निकल जाओ॥ १६॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते हनुमता हीनवीर्यपराक्रमम्।
मनसाचिन्तयद् भीमः स्वबाहुबलदर्पितः॥ १७॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर अपने बाहुबलका घमंड रखनेवाले भीमने मन-ही-मन उन्हें बल और पराक्रमसे हीन समझा॥ १७॥
पुच्छे प्रगृह्य तरसा हीनवीर्यपराक्रमम्।
सालोक्यमन्तकस्यैनं नयाम्यद्येह वानरम्॥ १८॥
और भीतर-ही-भीतर यह संकल्प किया कि 'आज मैं इस बल और पराक्रमसे शून्य वानरको वेगपूर्वक इसकी पूँछ पकड़कर यमराजके लोकमें भेज देता हूँ'॥ १८॥
सावज्ञमथ वामेन स्मयञ्जग्राह पाणिना ।
न चाशकच्चालयितुं भीमः पुच्छं महाकपेः ॥ १९ ॥
ऐसा सोचकर उन्होंने बड़ी लापरवाही दिखाते और मुसकराते हुए अपने बायें हाथसे उस महाकपिकी पूँछ पकड़ी, किंतु वे उसे हिला-डुला भी न सके ॥ १९ ॥
उच्चिक्षेप पुनर्दोर्भ्यामिन्द्रायुधमिवोच्छ्रितम् ।
नोद्धर्तुमशकद् भीमो दोर्भ्यामपि महाबलः ॥ २० ॥
तब महाबली भीमसेनने उनकी इन्द्रधनुषके समान ऊँची पूँछको दोनों हाथोंसे उठानेका पुनः प्रयत्न किया, परंतु दोनों हाथ लगा देनेपर भी वे उसे उठा न सके ॥
उत्क्षिप्तभूर्विवृत्ताक्षः संहतभ्रुकुटीमुखः ।
स्विन्नगात्रोऽभवद् भीमो न चोद्धर्तुं शशाक तम् ॥ २१ ॥
फिर तो उनकी भौंहें तन गयीं, आँखें फटी-सी रह गयीं, मुखमण्डलमें भुकुटी स्पष्ट दिखायी देने लगी और उनके सारे अंग पसीनेसे तर हो गये। फिर भी भीमसेन हनुमान्जीकी पूँछको किंचित् भी हिला न सके ॥ २१ ॥
यत्नवानपि तु श्रीमाँल्लाङ्गूलोद्धरणोद्धुरः ।
कपेः पार्श्वगतो भीमस्तस्थौ व्रीडानताननः ॥ २२ ॥
प्रणिपत्य च कौन्तेयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
प्रसीद कपिशार्दूल दुरुक्तं क्षम्यतां मम ॥ २३ ॥
यद्यपि श्रीमान् भीमसेन उस पूँछको उठानेमें सर्वथा समर्थ थे और उसके लिये उन्होंने बहुत प्रयत्न भी किया, तथापि सफल न हो सके। इससे उनका मुँह लज्जासे झुक गया और वे कुन्तीकुमार भीम हनुमान्जीके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े होकर बोले—‘कपिवर! मैंने जो कठोर बातें कही हों, उन्हें क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न होइये ॥
सिद्धो वा यदि वा देवो गन्धर्वो वाथ गुह्यकः ।
पृष्टः सन् काम्यया ब्रूहि कस्त्वं वानररूपधृक् ॥ २४ ॥
‘आप कोई सिद्ध हैं या देवता? गन्धर्व हैं या गुह्यक? मैं परिचय जाननेकी इच्छासे पूछ रहा हूँ। बतलाइये, इस प्रकार वानरका रूप धारण करनेवाले आप कौन हैं? ॥ २४ ॥
न चेद् गुह्यं महाबाहो श्रोतव्यं चेद् भवेन्मम ।
शिष्यवत् त्वां तु पृच्छामि उपपन्नोऽस्मि तेऽनघ ॥ २५ ॥
‘महाबाहो! यदि कोई गुप्त बात न हो और वह मेरे सुननेयोग्य हो, तो बताइये। अनघ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ और शिष्यभावसे पूछता हूँ। अतः अवश्य बतानेकी कृपा करें’ ॥ २५ ॥
हनूमानुवाच
यत् ते मम परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । तत् सर्वमखिलेन त्वं शृणु पाण्डवनन्दन ॥ २६ ॥ हनुमान्जी बोले— शत्रुदमन पाण्डुनन्दन! तुम्हारे मनमें मेरा परिचय प्राप्त करनेके लिये जो कौतूहल हो रहा है उसकी शान्तिके लिये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनो ॥ अहं केसरिणः क्षेत्रे वायुना जगदायुषा । जातः कमलपत्राक्ष हनूमान् नाम वानरः ॥ २७ ॥ कमलनयन भीम! मैं वानरश्रेष्ठ केसरीके क्षेत्रमें जगत्के प्राणस्वरूप वायुदेवसे उत्पन्न हुआ हूँ। मेरा नाम हनुमान् वानर है ॥ २७ ॥ सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् । सर्वे वानरराजानस्तथा वानरयूथपाः ॥ २८ ॥ उपतस्थुर्महावीर्या मम चामित्रकर्षण । सुग्रीवेणाभवत् प्रीतिरनिलस्याग्निना यथा ॥ २९ ॥ पूर्वकालमें सभी वानरराज और वानरयूथपति, जो महान् पराक्रमी थे, सूर्यनन्दन सुग्रीव तथा इन्द्रकुमार वालीकी सेवामें उपस्थित रहते थे। शत्रुसूदन भीम! उन दिनों सुग्रीवके साथ मेरी वैसी ही प्रेमपूर्ण मित्रता थी, जैसी वायुकी अग्निके साथ मानी गयी है ॥ २८-२९ ॥ निकृतः स ततो भ्रात्रा कस्मिंश्चित् कारणान्तरे । ऋष्यमूके मया सार्धं सुग्रीवो न्यवसच्चिरम् ॥ ३० ॥ किसी कारणान्तरसे वालीने अपने भाई सुग्रीवको घरसे निकाल दिया, तब बहुत दिनोंतक वे मेरे साथ ऋष्यमूक पर्वतपर रहे ॥ ३० ॥ अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः । विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधात लम् ॥ ३१ ॥ उस समय महाबली वीर दशरथनन्दन श्रीराम, जो साक्षात् भगवान् विष्णु ही थे, मनुष्यरूप धारण करके इस भूतलपर विचर रहे थे ॥ ३१ ॥ स पितुः प्रियमन्विच्छन् सहभार्यः सहानुजः । सधनुर्धन्विनां श्रेष्ठो दण्डकारण्यमाश्रितः ॥ ३२ ॥ वे अपने पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यमें चले आये। धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ रघुनाथजी सदा धनुष-बाण लिये रहते थे ॥ ३२ ॥ तस्य भार्या जनस्थानाच्छलेनापहृता बलात् । राक्षसेन्द्रेण बलिना रावणेन दुरात्मना ॥ ३३ ॥ सुवर्णरत्नचित्रेण मृगरूपेण रक्षसा । वञ्चयित्वा नरव्याघ्रं मारीचेन तदानघ ॥ ३४ ॥
अनघ! दण्डकारण्यमें आकर वे जनस्थानमें रहा करते थे। एक दिन अत्यन्त बलवान् दुरात्मा राक्षसराज रावण मायासे सुवर्ण-रत्नमय विचित्र मृगका रूप धारण करनेवाले मारीच नामक राक्षसके द्वारा नरश्रेष्ठ श्रीरामको धोखेमें डालकर उनकी पत्नी सीताको छल-बलपूर्वक हर ले गया॥ ३३-३४॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसंवादे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४७॥
हनुमान्जी कहते हैं—भीमसेन! इस प्रकार स्त्रीका अपहरण हो जानेपर अपने भाईके साथ उसकी खोज करते हुए श्रीरघुनाथजी जनस्थानसे आगे बढ़े। उन्होंने ऋष्यमूकपर्वत
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
हनुमान्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना
हनूमानुवाच
हृतदारः सह भ्रात्रा पत्नीं मार्गन् स राघवः ।
दृष्टवान् शैलशिखरे सुग्रीवं वानरर्षभम् ॥ १ ॥
हनुमान्जी कहते हैं—भीमसेन! इस प्रकार स्त्रीका अपहरण हो जानेपर अपने भाईके साथ उसकी खोज करते हुए श्रीरघुनाथजी जनस्थानसे आगे बढ़े। उन्होंने ऋष्यमूकपर्वतके शिखरपर रहनेवाले वानरराज सुग्रीवसे भेंट की ॥ १ ॥
तेन तस्याभवत् सख्यं राघवस्य महात्मनः ।
स हत्वा वालिनं राज्ये सुग्रीवमभिषिक्तवान् ॥ २ ॥
वहाँ सुग्रीवके साथ महात्मा श्रीरघुनाथजीकी मित्रता हो गयी। तब उन्होंने वालीको मारकर किष्किन्धाके राज्यपर सुग्रीवका अभिषेक कर दिया ॥ २ ॥
स राज्यं प्राप्य सुग्रीवः सीतायाः परिमार्गणे ।
वानरान् प्रेषयामास शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३ ॥
राज्य पाकर सुग्रीवने सीताजीकी खोजके लिये सौ-सौ तथा हजार-हजार वानरोंकी टोली इधर-उधर भेजी ॥ ३ ॥
ततो वानरकोटीभिः सहितोऽहं नरर्षभ ।
सीतां मार्गन् महाबाहो प्रयातो दक्षिणां दिशम् ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ! महाबाहो! उस समय करोड़ों वानरोंके साथ मैं भी सीताजीका पता लगाता हुआ दक्षिण दिशाकी ओर गया ॥ ४ ॥
ततः प्रवृत्तिः सीताया गृध्रेण सुमहात्मना ।
सम्पातिना समाख्याता रावणस्य निवेशने ॥ ५ ॥
तदनन्तर गृध्रजातीय महाबुद्धिमान् सम्पातिने सीताजीके सम्बन्धमें यह समाचार दिया कि वे रावणके नगरमें विद्यमान हैं ॥ ५ ॥
ततोऽहं कार्यसिद्धयर्थं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
शतयोजनविस्तीर्णमर्णवं सहसाऽऽप्लुतः ॥ ६ ॥
तब मैं अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरघुनाथजीकी कार्यसिद्धिके लिये सहसा सौ योजन विस्तृत समुद्रको लाँघ गया ॥ ६ ॥
अहं स्ववीर्यादुत्तीर्य सागरं मकरालयम् ।
सुतां जनकराजस्य सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ ७ ॥
दृष्टवान् भरतश्रेष्ठ रावणस्य निवेशने ।
समेत्य तामहं देवीं वैदेहीं राघवप्रियाम् ॥ ८ ॥ दग्ध्वा लङ्कामशेषेण साट्टप्राकारतोरणाम् । प्रत्यागतश्चास्य पुनर्नाम तत्र प्रकाश्य वै ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! मगर और ग्राह आदिसे भरे हुए उस समुद्रको अपने पराक्रमसे पार करके मैं रावणके नगरमें देवकन्याके समान तेजस्विनी जनकराजनन्दिनी सीतासे मिला। रघुनाथजीकी प्रियतमा विदेहराजकुमारी सीता-देवीसे भेंट करके अट्टालिका, चहारदीवारी और नगर-द्वारसहित समूची लङ्कापुरीको जलाकर वहाँ श्रीराम-नामकी घोषणा करके मैं पुनः लौट आया ॥ ७—९ ॥ मद्वाक्यं चावधार्याशु रामो राजीवलोचनः । स बुद्धिपूर्वं सैन्यस्य बद्ध्वा सेतुं महोदधौ ॥ १० ॥ वृतो वानरकोटीभिः समुत्तीर्णो महार्णवम् । ततो रामेण वीरेण हत्वा तान् सर्वराक्षसान् ॥ ११ ॥ रणे तु राक्षसगणं रावणं लोकरावणम् । निशाचरेन्द्रं हत्वा तु सभ्रातृसुतबान्धवम् ॥ १२ ॥ मेरी बात मानकर कमलनयन भगवान् श्रीरामने बुद्धिपूर्वक विचार करके सैनिकोंकी सलाहसे महासागर-पर पुल बँधवाया और करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए वे महासमुद्रको पार करके लंकापर जा चढ़े। तदनन्तर वीरवर श्रीरामने उन समस्त राक्षसोंको मारकर युद्धमें समस्त लोकोंको रुलानेवाले राक्षसराज रावणको भी भाई, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मार डाला ॥ १०—१२ ॥ राज्येऽभिषिच्य लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । धार्मिकं भक्तिमन्तं च भक्तानुगतवत्सलम् ॥ १३ ॥ ततः प्रत्याहृता भार्या नष्टा वेदश्रुतिर्यथा । तयैव सहितः साध्व्या पत्न्या रामो महायशाः ॥ १४ ॥ गत्वा ततोऽतित्वरितः स्वां पुरीं रघुनन्दनः । अध्यावसत् ततोऽयोध्यामयोध्यां द्विषतां प्रभुः ॥ १५ ॥ ततः प्रतिष्ठितो राज्ये रामो नृपतिसत्तमः । वरं मया याचितोऽसौ रामो राजीवलोचनः ॥ १६ ॥ यावद् राम कथेयं ते भवेल्लोकेषु शत्रुहन् । तावज्जीवेयमित्येवं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत् ॥ १७ ॥ तत्पश्चात् धर्मात्मा, भक्तिमान् तथा भक्तों और सेवकोंपर स्नेह रखनेवाले राक्षसराज विभीषणको लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किया और खोयी हुई वैदिकी श्रुतिकी भाँति अपनी पत्नीका वहाँसे उद्धार करके महायशस्वी रघुनन्दन श्रीराम अपनी उस साध्वी पत्नीके साथ ही बड़ी उतावलीके साथ अपनी अयोध्यापुरीमें लौट आये। इसके बाद
शत्रुओंको भी वशमें करनेवाले नृपश्रेष्ठ भगवान् श्रीराम अवधके राज्यसिंहासनपर आसीन हो उस अजेय अयोध्यापुरीमें रहने लगे। उस समय मैंने कमलनयन श्रीरामसे यह वर माँगा कि 'शत्रुसूदन! जबतक आपकी यह कथा संसारमें प्रचलित रहे तबतक मैं अवश्य जीवित रहूँ'। भगवान्ने 'तथास्तु' कहकर मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ १३—१७ ॥
सीताप्रसादाच्च सदा मामिहस्थमरिंदम ।
उपतिष्ठन्ति दिव्या हि भोगा भीम यथेप्सिताः ॥ १८ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले भीमसेन! श्रीसीताजीकी कृपासे यहाँ रहते हुए ही मुझे इच्छानुसार सदा दिव्य भोग प्राप्त हो जाते हैं ॥ १८ ॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
राज्यं कारितवान् रामस्ततः स्वभवनं गतः ॥ १९ ॥
श्रीरामजीने ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीपर राज्य किया, फिर वे अपने परमधामको चले गये ॥ १९ ॥
तदिहाप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च सदानघ ।
तस्य वीरस्य चरितं गायन्तो रमयन्ति माम् ॥ २० ॥
निष्पाप भीम! इस स्थानपर गन्धर्व और अप्सराएँ वीरवर रघुनाथजीके चरित्रोंको गाकर मुझे आनन्दित करते रहते हैं ॥ २० ॥
अयं च मार्गो मर्त्यानामगम्यः कुरुनन्दन ।
ततोऽहं रुद्धवान् मार्गं तवेमं देवसेवितम् ॥ २१ ॥
धर्षयेद् वा शपेद् वापि मा कश्चिदिति भारत ।
दिव्यो देवपथो ह्येष नात्र गच्छन्ति मानुषाः ।
यदर्थमागतश्चासि अत एव सरश्च तत् ॥ २२ ॥
कुरुनन्दन! यह मार्ग मनुष्योंके लिये अगम्य है। अतः इस देवसेवित पथको मैंने इसीलिये तुम्हारे लिये रोक दिया था कि इस मार्गसे जानेपर कोई तुम्हारा तिरस्कार न कर दे या शाप न दे दे; क्योंकि यह दिव्य देवमार्ग है। इसपर मनुष्य नहीं जाते हैं। भारत! तुम जहाँ जानेके लिये आये हो वह सरोवर तो यहीं है ॥ २१-२२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसंवादे
अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान्जी और भीमसेनका संवाद नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥
हनुमान्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन
एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
हनुमान्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो महाबाहुर्भीमसेनः प्रतापवान् ।
प्रणिपत्य ततः प्रीत्या भ्रातरं हृष्टमानसः ॥ १ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा हनूमन्तं कपीश्वरम् ।
मया धन्यतरो नास्ति यदार्यं दृष्टवानहम् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर प्रतापी वीर महाबाहु भीमसेनके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपने भाई वानरराज हनुमान्को प्रणाम करके मधुर वाणीमें कहा—'अहा! आज मेरे समान बड़भागी दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि आज मुझे अपने ज्येष्ठ भ्राताका दर्शन हुआ है ॥ १-२ ॥
अनुग्रहो मे सुमहांस्तृप्तिश्च तव दर्शनात् ।
एकं तु कृतमिच्छामि त्वयाद्य प्रियमात्मनः ॥ ३ ॥
'आर्य! आपने मुझपर बड़ी कृपा की है। आपके दर्शनसे मुझे बड़ा सुख मिला है। अब मैं पुनः आपके द्वारा अपना एक और प्रिय कार्य पूर्ण करना चाहता हूँ ॥
यत् ते तदाऽऽसीत् प्लवतः सागरं मकरालयम् ।
रूपमप्रतिमं वीर तदिच्छामि निरीक्षितुम् ॥ ४ ॥
एवं तुष्टो भविष्यामि श्रद्धास्यामि च ते वचः ।
एवमुक्तः स तेजस्वी प्रहस्य हरिरब्रवीत् ॥ ५ ॥
'वीरवर! मकरालय समुद्रको लाँघते समय आपने जो अनुपम रूप धारण किया था, उसका दर्शन करनेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है। उसे देखनेसे मुझे संतोष तो होगा ही, आपकी बातपर श्रद्धा भी हो जायगी।' भीमसेनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी हनुमान्जीने हँसकर कहा— ॥ ४-५ ॥
न तच्छक्यं त्वया द्रष्टुं रूपं नान्येन केनचित् ।
कालावस्था तदा ह्यन्या वर्तते सा न साम्प्रतम् ॥ ६ ॥
'भैया! तुम उस स्वरूपको नहीं देख सकते, कोई दूसरा मनुष्य भी उसे नहीं देख सकता। उस समयकी अवस्था कुछ और ही थी, अब वह नहीं है ॥ ६ ॥
अन्यः कृतयुगे कालस्त्रेतायां द्वापरे परः ।
अयं प्रध्वंसनः कालो नाद्य तद् रूपमस्ति मे ॥ ७ ॥
भूमिर्नद्यो नगाः शैलाः सिद्धा देवा महर्षयः ।
कालं समनुवर्तन्ते यथा भावा युगे युगे ॥ ८ ॥
बलवर्ष्मप्रभावा हि प्रहीयन्त्युद्भवन्ति च ।
तदलं बत तद् रूपं द्रष्टुं कुरुकुलोद्वह ।
युगं समनुवर्तामि कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ९ ॥
‘सत्ययुगका समय दूसरा था तथा त्रेता और द्वापरका दूसरा ही है। यह काल सभी वस्तुओंको नष्ट करनेवाला है। अब मेरा वह रूप है ही नहीं। पृथ्वी, नदी, वृक्ष, पर्वत, सिद्ध, देवता और महर्षि—ये सभी कालका अनुसरण करते हैं। प्रत्येक युगके अनुसार सभी वस्तुओंके शरीर, बल और प्रभावमें न्यूनाधिकता होती रहती है। अतः कुरुश्रेष्ठ! तुम उस स्वरूपको देखनेका आग्रह न करो। मैं भी युगका अनुसरण करता हूँ; क्योंकि कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है’ ॥ ७—९ ॥
भीम उवाच
युगसंख्यां समाचक्ष्व आचारं च युगे युगे ।
धर्मकामार्थभावांश्च कर्मवीर्ये भवाभवौ ॥ १० ॥
**भीमसेनने कहा—**कपिप्रवर! आप मुझे युगोंकी संख्या बताइये और प्रत्येक युगमें जो आचार, धर्म, अर्थ एवं कामके तत्त्व, शुभाशुभ कर्म, उन कर्मोंकी शक्ति तथा उत्पत्ति और विनाशादि भाव होते हैं, उनका भी वर्णन कीजिये ॥ १० ॥
हनूमानुवाच
कृतं नाम युगं तात यत्र धर्मः सनातनः ।
कृतमेव न कर्तव्यं तस्मिन् काले युगोत्तमे ॥ ११ ॥
**हनुमान्जी बोले—**तात! सबसे पहला कृतयुग है। उसमें सनातनधर्मकी पूर्ण स्थिति रहती है। उसका कृतयुग नाम इसलिये पड़ा है कि उस उत्तम युगके लोग अपना सब कर्तव्यकर्म सम्पन्न ही कर लेते थे। उनके लिये कुछ करना शेष नहीं रहता था (अतः ‘कृतम् एव सर्वं शुभं यस्मिन् युगे’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार वह ‘कृतयुग’ कहलाया) ॥ ११ ॥
न तत्र धर्माः सीदन्ति क्षीयन्ते न च वै प्रजाः ।
ततः कृतयुगं नाम कालेन गुणतां गतम् ॥ १२ ॥
उस समय धर्मका ह्रास नहीं होता था। प्रजाका अर्थात् (माता-पिताके रहते हुए) संतानका नाश नहीं होता था। तदनन्तर कालक्रमसे उसमें गौणता आ गयी ॥ १२ ॥
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
नासन् कृतयुगे तात तदा न क्रयविक्रयः ॥ १३ ॥
तात! कृतयुगमें देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग नहीं थे, अर्थात् ये परस्पर भेद-भाव नहीं रखते थे। उस समय क्रय-विक्रयका व्यवहार भी नहीं था ॥ १३ ॥
न सामऋग्यजुर्वर्णाः क्रिया नासीच्च मानवी ।
अभिध्याय फलं तत्र धर्मः संन्यास एव च ॥ १४ ॥
ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रवर्णोंका पृथक्-पृथक् विभाग नहीं था। कोई मानवी क्रिया (कृषि आदि) भी नहीं होती थी। उस समय चिन्तन करनेमात्रसे सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती थी। सत्ययुगमें एक ही धर्म था, स्वार्थका त्याग ।। १४ ।।
न तस्मिन् युगसंसर्गे व्याधयो नेन्द्रियक्षयः ।
नासूया नापि रुदितं न दर्पो नापि वैकृतम् ।। १५ ।।
उस युगमें बीमारी नहीं होती थी। इन्द्रियोंमें भी क्षीणता नहीं आने पाती थी। कोई किसीके गुणोंमें दोष-दर्शन नहीं करता था। किसीको दुःखसे रोना नहीं पड़ता था और न किसीमें घमंड था; तथा न कोई अन्य विकार ही होता था ।। १५ ।।
न विग्रहः कुतस्तन्द्री न द्वेषो न च पैशुनम् ।
न भयं नापि संतापो न चेर्ष्या न च मत्सरः ।। १६ ।।
कहीं लड़ाई-झगड़ा नहीं था, आलसी भी नहीं थे। द्वेष, चुगली, भय, संताप, ईर्ष्या और मात्सर्य भी नहीं था* ।। १६ ।।
ततः परमकं ब्रह्म सा गतिर्योगिनां परा ।
आत्मा च सर्वभूतानां शुक्लो नारायणस्तदा ।। १७ ।।
उस समय योगियोंके परम आश्रय और सम्पूर्ण भूतोंकी अन्तरात्मा परब्रह्मस्वरूप भगवान् नारायणका वर्ण शुक्ल था ।। १७ ।।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च कृतलक्षणाः ।
कृते युगे समभवन् स्वकर्मनिरताः प्रजाः ।। १८ ।।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी शम-दम आदि स्वभावसिद्ध शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। सत्ययुगमें समस्त प्रजा अपने-अपने कर्तव्यकर्मोंमें तत्पर रहती थी ।। १८ ।।
समाश्रयं समाचारं समज्ञानं च केवलम् ।
तदा हि समकर्माणो वर्णा धर्मानवाप्नुवन् ।। १९ ।।
उस समय परब्रह्म परमात्मा ही सबके एकमात्र आश्रय थे। उन्हींकी प्राप्तिके लिये सदाचारका पालन किया जाता था। सब लोग एक परमात्माका ही ज्ञान प्राप्त करते थे। सभी वर्णोंके मनुष्य परब्रह्म परमात्माके उद्देश्यसे ही समस्त सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते थे और इस प्रकार उन्हें उत्तम धर्म-फलकी प्राप्ति होती थी ।। १९ ।।
एकदेवसदायुक्ता एकमन्त्रविधिक्रियाः ।
पृथग्धर्मास्त्वेकवेदा धर्ममेकमनुव्रताः ।। २० ।।
सब लोग सदा एक परमात्मदेवमें ही चित्त लगाये रहते थे। सब लोग एक परमात्माके ही नामका जप और उन्हींकी सेवा-पूजा किया करते थे। सबके वर्णाश्रमानुसार पृथक्-पृथक् धर्म होनेपर भी वे एकमात्र वेदको ही माननेवाले थे और एक ही सनातनधर्मके अनुयायी थे ।।
चातुराश्रम्ययुक्तेन कर्मणा कालयोगिना ।
अकामफलसंयोगात् प्राप्नुवन्ति परां गतिम् ॥ २१ ॥ सत्ययुगके लोग समय-समयपर किये जानेवाले चार आश्रमसम्बन्धी सत्कर्मोंका अनुष्ठान करके कर्म-फलकी कामना और आसक्ति न होनेके कारण परम गति प्राप्त कर लेते थे ॥ २१ ॥
आत्मयोगसमायुक्तो धर्मोऽयं कृतलक्षणः । कृते युगे चतुष्पादश्चातुर्वर्ण्यस्य शाश्वतः ॥ २२ ॥ चित्तवृत्तियोंको परमात्मामें स्थापित करके उनके साथ एकताकी प्राप्ति करानेवाला यह योग नामक धर्म सत्ययुगका सूचक है। सत्ययुगमें चारों वर्णोंका यह सनातन धर्म चारों चरणोंसे सम्पन्न—सम्पूर्ण रूपसे विद्यमान था ॥ २२ ॥
एतत् कृतयुगं नाम त्रैगुण्यपरिवर्जितम् त्रेतामपि निबोध त्वं यस्मिन् सत्रं प्रवर्तते ॥ २३ ॥ यह तीनों गुणोंसे रहित सत्ययुगका वर्णन हुआ। अब त्रेताका वर्णन सुनो, जिसमें यज्ञ-कर्मका आरम्भ होता है ॥
पादेन ह्रसते धर्मो रक्तां याति चाच्युतः । सत्यप्रवृत्ताश्च नराः क्रियाधर्मपरायणाः ॥ २४ ॥ उस समय धर्मके एक चरणका ह्रास हो जाता है और भगवान् अच्युतका स्वरूप लाल वर्णका हो जाता है। लोग सत्यमें तत्पर रहते हैं। शास्त्रोक्त यज्ञक्रिया तथा धर्मके पालनमें परायण रहते हैं ॥ २४ ॥
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते धर्माश्च विविधाः क्रियाः । त्रेतायां भावसंकल्पाः क्रियादानफलोपगाः ॥ २५ ॥ त्रेतायुगमें ही यज्ञ, धर्म तथा नाना प्रकारके सत्कर्म आरम्भ होते हैं। लोगोंको अपनी भावना तथा संकल्पके अनुसार वेदोक्त कर्म तथा दान आदिके द्वारा अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है ॥ २५ ॥
प्रचलन्ति न वै धर्मात् तपोदानपरायणाः । स्वधर्मस्थाः क्रियावन्तो नरास्त्रेतायुगेऽभवन् ॥ २६ ॥ त्रेतायुगके मनुष्य तप और दानमें तत्पर रहकर अपने धर्मसे कभी विचलित नहीं होते थे। सभी स्वधर्मपरायण तथा क्रियावान् थे ॥ २६ ॥
द्वापरे च युगे धर्मो द्विभागोनः प्रवर्तते । विष्णुर्वै पीततां याति चतुर्धा वेद एव च ॥ २७ ॥ द्वापरमें हमारे धर्मके दो ही चरण रह जाते हैं, उस समय भगवान् विष्णुका स्वरूप पीले वर्णका हो जाता है और वेद (ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—इन) चार भागोंमें बँट जाता है ॥ २७ ॥
ततोऽन्ये च चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्च तथापरे ।
द्विवेदाश्चैकवेदाश्चाप्यनृचश्च तथापरे ॥ २८ ॥ उस समय कुछ द्विज चार वेदोंके ज्ञाता, कुछ तीन वेदोंके विद्वान्, कुछ दो ही वेदोंके जानकार, कुछ एक ही वेदके पण्डित और कुछ वेदकी ऋचाओंके ज्ञानसे सर्वथा शून्य होते हैं ॥ २८ ॥
एवं शास्त्रेषु भिन्नेषु बहुधा नीयते क्रिया । तपोदानप्रवृत्ता च राजसी भवति प्रजा ॥ २९ ॥ इस प्रकार भिन्न-भिन्न शास्त्रोंके होनेसे उनके बताये हुए कर्मोंमें भी अनेक भेद हो जाते हैं तथा प्रजा तप और दान—इन दो ही धर्मोंमें प्रवृत्त होकर राजसी हो जाती है ॥ २९ ॥
एकवेदस्य चाज्ञानाद् वेदास्ते बहवः कृताः । सत्त्वस्य चेह विभ्रंशात् सत्ये कश्चिदवस्थितः ॥ ३० ॥ द्वापरमें सम्पूर्ण एक वेदका भी ज्ञान न होनेसे वेदके बहुत-से विभाग कर लिये गये हैं। इस युगमें सात्त्विक बुद्धिका क्षय होनेसे कोई विरला ही सत्यमें स्थित होता है ॥ ३० ॥
सत्यात् प्रच्यवमानानां व्याधयो बहवोऽभवन् । कामाश्चोपद्रवाश्चैव तदा वै दैवकारिताः ॥ ३१ ॥ सत्यसे भ्रष्ट होनेके कारण द्वापरके लोगोंमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। उनके मनमें अनेक प्रकारकी कामनाएँ पैदा होती हैं और वे बहुत-से दैवी उपद्रवोंसे भी पीड़ित हो जाते हैं ॥ ३१ ॥
यैर्ध्यमानाः सुभृशं तपस्तप्यन्ति मानवाः । कामकामाः स्वर्गकामा यज्ञांस्तन्वन्ति चापरे ॥ ३२ ॥ उन सबसे अत्यन्त पीड़ित होकर लोग तप करने लगते हैं। कुछ लोग भोग और स्वर्गकी कामनासे यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं ॥ ३२ ॥
एवं द्वापरमासाद्य प्रजाः क्षीयन्त्यधर्मतः । पादेनैकेन कौन्तेय धर्मः कलियुगे स्थितः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार द्वापरयुगके आनेपर अधर्मके कारण प्रजा क्षीण होने लगती है। (तत्पश्चात् कलियुगका आगमन होता है।) कुन्तीनन्दन! कलियुगमें धर्म एक ही चरणसे स्थित होता है ॥ ३३ ॥
तामसं युगमासाद्य कृष्णो भवति केशवः । वेदाचाराः प्रशाम्यन्ति धर्मयज्ञक्रियास्तथा ॥ ३४ ॥ इस तमोगुणी युगको पाकर भगवान् विष्णुके श्रीविग्रहका रंग काला हो जाता है। वैदिक सदाचार, धर्म तथा यज्ञ-कर्म नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४ ॥
ईतयो व्याधयस्तन्द्री दोषाः क्रोधादयस्तथा । उपद्रवाः प्रवर्तन्ते आधयः क्षुद्भयं तथा ॥ ३५ ॥
ईति, व्याधि, आलस्य, क्रोध आदि दोष, मानसिक रोग तथा भूख-प्यासका भय—ये सभी उपद्रव बढ़ जाते हैं ।। ३५ ।। युगेष्वावर्तमानेषु धर्मो व्यावर्तते पुनः । धर्मे व्यावर्तमाने तु लोको व्यावर्तते पुनः ॥ ३६ ॥ युगोंके परिवर्तन होनेपर आनेवाले युगोंके अनुसार धर्मका भी ह्रास होता जाता है। इस प्रकार धर्मके क्षीण होनेसे लोक (की सुख-सुविधा)-का भी क्षय होने लगता है ।। ३६ ।। लोके क्षीणे क्षयं यान्ति भावा लोकप्रवर्तकाः । युगक्षयकृता धर्माः प्रार्थनानि विकुर्वते ॥ ३७ ॥ लोकके क्षीण होनेपर उसके प्रवर्तक भावोंका भी क्षय हो जाता है। युग-क्षयजनित धर्म मनुष्यकी अभीष्ट कामनाओंके विपरीत फल देते हैं ।। ३७ ।। एतत् कलियुगं नाम अचिराद् यत् प्रवर्तते । युगानुवर्तनं त्वेतत् कुर्वन्ति चिरजीविनः ॥ ३८ ॥ यह कलियुगका वर्णन किया गया, जो शीघ्र ही आनेवाला है। चिरजीवीलोग भी इस प्रकार युगका अनुसरण करते हैं ।। ३८ ।। यच्च ते मत्परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम । अनर्थकेषु को भावः पुरुषस्य विजानतः ॥ ३९ ॥ शत्रुदमन! तुम्हें मेरे पुरातन स्वरूपको देखने या जाननेके लिये जो कौतूहल हुआ है, वह ठीक नहीं है। किसी भी समझदार मनुष्यका निरर्थक विषयोंके लिये आग्रह क्यों होना चाहिये? ।। ३९ ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । युगसंख्यां महाबाहो स्वस्ति प्राप्नुहि गम्यताम् ॥ ४० ॥ महाबाहो! तुमने युगोंकी संख्याके विषयमें मुझसे जो प्रश्न किया है, उसके उत्तरमें मैंने यह सब बातें बतायी हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम लौट जाओ ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कदलीषण्डे हनुमद्भीमसंवादे एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें कदलीवनके भीतर हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४९ ।।
* सत्ययुगके मनुष्य आदि प्राणियोंमें दोषोंका अभाव बतलाया है, उसका यह अभिप्राय समझना चाहिये कि अधिकांशमें उनमें इन दोषोंका अभाव था।
१५०-
पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
श्रीहनुमान्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन
भीमसेन उवाच
पूर्वरूपमदृष्ट्वा ते न यास्यामि कथंचन ।
यदि तेऽहमनुग्राह्यो दर्शयात्मानमात्मना ॥ १ ॥
भीमसेनने कहा— कपिप्रवर! मैं आपका वह पूर्वरूप देखे बिना किसी प्रकार नहीं जाऊँगा। यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ, तो आप स्वयं ही अपने-आपको मेरे सामने प्रकट कर दीजिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु भीमेन स्मितं कृत्वा प्लवंगमः ।
तद् रूपं दर्शयामास यद् वै सागरलङ्घने ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीमसेनके ऐसा कहनेपर हनुमान्जीने मुसकराकर उन्हें अपना वह रूप दिखाया, जो उन्होंने समुद्र-लंघनके समय धारण किया था ॥ २ ॥
भ्रातुः प्रियमभीप्सन् वै चकार सुमहद् वपुः ।
देहस्तस्य ततोऽतीव वर्धतायामविस्तरैः ॥ ३ ॥
सद्रुमं कदलीषण्डं छादयन्नमितद्युतिः ।
गिरेश्चोच्छ्रयमाक्रम्य तस्थौ तत्र च वानरः ॥ ४ ॥
उन्होंने अपने भाईका प्रिय करनेकी इच्छासे अत्यन्त विशाल शरीर धारण किया। उनका शरीर लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाईमें बहुत बड़ा हो गया। वे अमित तेजस्वी वानरवीर वृक्षोंसहित समूचे कदलीवनको आच्छादित करते हुए गन्धमादन पर्वतकी ऊँचाईको भी लाँघकर वहाँ खड़े हो गये ॥ ३-४ ॥
समुच्छ्रितमहाकायो द्वितीय इव पर्वत: ।
ताम्रेक्षणस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भुकुटीकुटिलाननः ॥ ५ ॥
उनका वह उन्नत विशाल शरीर दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था। लाल आँखों, तीखी दाढ़ों और टेढ़ी भौंहोंसे युक्त उनका मुख था ॥ ५ ॥