भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1000, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1000

आस्फोटयच्च लाङ्गूलमिन्द्राशनिसमस्वनम् ॥ ७० ॥ कदलीवनमें आय हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनको इस मार्गपर आनेके कारण किसीसे शाप या तिरस्कार न प्राप्त हो जाय, यह विचारकर ही कपिप्रवर हनुमान्जी उस वनके भीतर स्वर्गका रास्ता रोककर सो गये। उस समय उन्होंने अपने शरीरको बड़ा कर लिया था। निद्राके वशीभूत होकर जब वे जँभाई लेते और इन्द्रकी ध्वजाके समान ऊँचे तथा विशाल लंगूरको फटकारते, उस समय वज्रकी गड़गड़ाहटके समान आवाज होती थी ॥ ६८—७० ॥

तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः सुगुहामुखैः । उद्गारमिव गौर्नर्दन्नुत्ससर्ज समन्ततः ॥ ७१ ॥ वह पर्वत उनकी पूँछकी फटकारके उस महान् शब्दको सुन्दर कन्दरारूपी मुखोंद्वारा सब ओर प्रतिध्वनिके रूपमें दोहराता था, मानो कोई साँड़ जोर-जोरसे गर्जना कर रहा हो ॥ ७१ ॥

लाङ्गूलास्फोटशब्दाच्च चलितः स महागिरिः । विघूर्णमानशिखरः समन्तात् पर्यशीर्यत ॥ ७२ ॥ स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिःस्वनम् । अन्तर्धाय विचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ॥ ७३ ॥ पूँछके फटकारनेकी आवाजसे वह महान् पर्वत हिल उठा। उसके शिखर झूमते-से जान पड़े और वह सब ओरसे टूट-फूटकर बिखरने लगा। वह शब्द मतवाले हाथीके चिग्घाड़नेकी आवाजको भी दबाकर विचित्र पर्वत-शिखरोंपर चारों ओर फैल गया ॥ ७२-७३ ॥

स भीमसेनस्तच्छ्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरुहः । शब्दप्रभवमन्विच्छंश्चचार कदलीवनम् ॥ ७४ ॥ उसे सुनकर भीमसेनके रोंगटे खड़े हो गये और उसके कारणको ढूँढ़नेके लिये वे उस केलेके बगीचेमें घूमने लगे ॥ ७४ ॥

कदलीवनमध्यस्थमथ पीने शिलातले । ददर्श सुमहाबाहुर्वानराधिपतिं तदा ॥ ७५ ॥ उस समय विशाल भुजाओंवाले भीमसेनने कदलीवनके भीतर ही एक मोटे शिलाखण्डपर लेटे हुए वानरराज हनुमान्जीको देखा ॥ ७५ ॥

विद्युत्सम्पातदुष्प्रेक्षं विद्युत्सम्पातपिङ्गलम् । विद्युत्सम्पातनिनदं विद्युत्सम्पातचञ्चलम् ॥ ७६ ॥ विद्युत्पातके समान चकाचौंध पैदा करनेके कारण उनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो रहा था। उनकी अंगकान्ति गिरती हुई बिजलीके समान पिंगल-वर्णकी थी। उनका