महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 999, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंआस्फोटयच्च बलवान् भीमः संनादयन् दिशः ॥ ६१ ॥ तस्य शङ्खस्य शब्देन भीमसेनरवेण च । बाहुशब्देन चोग्रेण नदन्तीव गिरेर्गुहाः ॥ ६२ ॥ उस समय बलवान् पाण्डुनन्दन भीमने अपनी सारी शक्ति लगाकर बड़े जोरसे शंख बजाया और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए ताल ठोंका। उस शंखकी ध्वनि, भीमसेनकी गर्जना और उनके ताल ठोंकनेके भयंकर शब्दसे मानो पर्वतोंकी कन्दराएँ गूँज उठीं ॥ ६१-६२ ॥
तं वज्रनिष्पेषसममास्फोटितमहारवम् । श्रुत्वा शैलगुहासुप्तैः सिंहैर्मुक्तो महास्वनः ॥ ६३ ॥ पर्वतोंपर वज्रपात होनेके कारण उस ताल ठोंकनेके भयानक शब्दको सुनकर गुफाओंमें सोये हुए सिंहोंने भी जोर-जोरसे दहाड़ना आरम्भ किया ॥ ६३ ॥
सिंहनादभयत्रस्तैः कुञ्जरैरपि भारत । मुक्तो विरावः सुमहान् पर्वतो येन पूरितः ॥ ६४ ॥ भारत! उन सिंहोंका दहाड़ना सुनकर भयसे डरे हुए हाथी भी चीत्कार करने लगे, जिससे वह विशाल पर्वत शब्दायमान हो उठा ॥ ६४ ॥
तं तु नादं ततः श्रुत्वा मुक्तं वारणपुङ्गवैः । भ्रातरं भीमसेनं तु विज्ञाय हनुमान् कपिः ॥ ६५ ॥ बड़े-बड़े गजराजोंका वह चीत्कार सुनकर कपिप्रवर हनुमान्जी, जो उस समय कदलीवनमें ही रहते थे, यह समझ गये कि मेरे भाई भीमसेन इधर आये हैं ॥ ६५ ॥
दिवंगमं रुरोधाथ मार्गं भीमस्य कारणात् । अनेन हि पथा मा वै गच्छेदिति विचार्य सः ॥ ६६ ॥ आस्त एकायने मार्गे कदलीषण्डमण्डिते । भ्रातुर्भीमस्य रक्षार्थं तं मार्गमवरुध्य वै ॥ ६७ ॥ तब उन्होंने भीमसेनके हितके लिये स्वर्गकी ओर जानेवाला मार्ग रोक दिया। हनुमान्जीने यह सोचकर कि भीमसेन इसी मार्गसे स्वर्गलोककी ओर न चले जायँ, एक मनुष्यके आने-जाने योग्य उस संकुचित मार्गपर बैठ गये। वह मार्ग केलेके वृक्षोंसे घिरा होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था। उन्होंने अपने भाई भीमकी रक्षाके लिये ही यह राह रोकी थी ॥ ६६-६७ ॥
मात्र प्राप्स्यति शापं वा धर्षणां वेति पाण्डवः । कदलीषण्डमध्यस्थो ह्येवं संचिन्त्य वानरः ॥ ६८ ॥ प्राजृम्भत महाकायो हनूमान् नाम वानरः । कदलीषण्डमध्यस्थो निद्रावशगतस्तदा ॥ ६९ ॥ जृम्भमाणः सुविपुलं शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् ।