महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 998, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवनान्तरगताश्चापि वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ।। ५५ ।।
इसी समय गन्धमादनके शिखरोंपर महाबाहु भीमने एक परम सुन्दर केलेका बगीचा
देखा, जो कई योजन दूरतक फैला हुआ था। मदकी धारा बहानेवाले महाबली गजराजकी
भाँति उस कदलीवनमें हलचल मचाते और भाँति-भाँतिके वृक्षोंको तोड़ते हुए वे बड़े वेगसे
वहाँ गये। वहाँके केलेके वृक्ष खम्भोंके समान मोटे थे। उनकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर
थी। बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमने बड़े वेगसे उन्हें उखाड़-उखाड़कर सब ओर फेंकना आरम्भ
किया। वे महान् तेजस्वी तो थे ही, अपने बल और पराक्रमपर गर्व भी रखते थे; अतः
भगवान् नृसिंहकी भाँति विकट गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् और भी बहुत-से बड़े-बड़े
जन्तुओंपर आक्रमण किया। रुरु, वानर, सिंह, भैंसे तथा जल-जन्तुओंपर भी धावा किया।
उन पशु-पक्षियोंके एवं भीमसेनके उस भयंकर शब्दसे दूसरे वनमें रहनेवाले मृग और पक्षी
भी थर्रा उठे ।। ५०-५५ ।।
तं शब्दं सहसा श्रुत्वा मृगपक्षिसमीरितम् ।
जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ।। ५६ ।।
मृगों और पक्षियोंके उस भयसूचक शब्दको सहसा सुनकर सहस्रों पक्षी आकाशमें
उड़ने लगे। उन सबकी पाँखें जलसे भीगी हुई थीं ।। ५६ ।।
तानौदकान् पक्षिगणान् निरीक्ष्य भरतर्षभः ।
तानेवानुसरन् रम्यं ददर्श सुमहत् सरः ।। ५७ ।।
भरतश्रेष्ठ भीमने यह देखकर कि ये तो जलके पक्षी हैं, उन्हींके पीछे चलने लगे और
आगे जानेपर एक अत्यन्त रमणीय विशाल सरोवर देखा ।। ५७ ।।
काञ्चनैः कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितैः ।
वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरात् तीरविसर्पिभिः ।। ५८ ।।
उस सरोवरके एक तीरसे लेकर दूसरे तीरतक फैले हुए सुवर्णमय केलेके वृक्ष मन्द
वायुसे विकम्पित होकर मानो उस अगाध जलाशयको पंखा झल रहे थे ।। ५८ ।।
तत् सरोऽथावतीर्याशु प्रभूतनलिनोत्पलम् ।
महागज इवोद्दामश्चिक्रीड बलवद् बली ।। ५९ ।।
उसमें प्रचुर कमल और उत्पल खिले हुए थे। बन्धनरहित महान् गजके समान
बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन सहसा उस सरोवरमें उतरकर जल-क्रीड़ा करने लगे ।। ५९ ।।
विक्रीड्य तस्मिन् सुचिरमुत्ततारामितद्युतिः ।
ततोऽध्यगन्तुं वेगेन तद् वनं बहुपादपम् ।। ६० ।।
दीर्घ कालतक उस सरोवरमें क्रीड़ा करनेके पश्चात् अमित तेजस्वी भीम जलसे बाहर
निकले और असंख्य वृक्षोंसे सुशोभित उस कदलीवनमें वेगपूर्वक जानेको उद्यत
हुए ।। ६० ।।
दध्मौ च शङ्खं स्वनवत् सर्वप्राणेन पाण्डवः ।