महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूअर, मृगसमूह, जंगली भैंसे, बाघों तथा गीदड़ोंके समुदाय और गवय—ये सब-के-
सब एक साथ चीत्कार करने लगे। चक्रवाक, चातक, हंस, कारण्डव, प्लव, शुक, कोकिल
और क्रौंच आदि पक्षियोंने अचेत होकर भिन्न-भिन्न दिशाओंकी शरण ली ॥ ४३-४४ ॥
तथान्ये दर्पिता नागाः करेणुशरपीडिताः ।
सिंहव्याघ्राश्च संक्रुद्धा भीमसेनमथाद्रवन् ॥ ४५ ॥
शकृन्मूत्रं च मुञ्चाना भयविभ्रान्तमानसाः ।
व्यादितास्या महारौद्रा व्यनदन् भीषणान् रवान् ॥ ४६ ॥
तथा हथिनियोंके कटाक्ष-बाणसे पीड़ित हुए दूसरे बलोन्मत्त गजराज, सिंह और व्याघ्र
क्रोधमें भरकर भीमसेनपर टूट पड़े। वे मल-मूत्र छोड़ते हुए मन-ही-मन भयसे घबरा रहे थे
और मुँह बाये हुए अत्यन्त भयानक रूपसे भैरव-गर्जना कर रहे थे ॥ ४५-४६ ॥
ततो वायुसुतः क्रोधात् स्वबाहुबलमाश्रितः ।
गजेनान्यान गजाञ्छ्रीमान् सिंहं सिंहेन वा विभुः ॥ ४७ ॥
तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत् पाण्डवो बली ।
ते वध्यमाना भीमेन सिंहव्याघ्रतरक्षवः ॥ ४८ ॥
भयाद् विससृजुर्भीमं शकृन्मूत्रं च सुस्रुवुः ।
प्रविवेश ततः क्षिप्रं तानपास्य महाबलः ॥ ४९ ॥
वनं पाण्डुसुतः श्रीमाञ्छब्देनापूरयन् दिशः ।
तब अपने बाहु-बलका भरोसा रखनेवाले श्रीमान् वायुपुत्र भीमने कुपित हो एक
हाथीसे दूसरे हाथियोंको और एक सिंहसे दूसरे सिंहोंको मार भगाया तथा उन महाबली
पाण्डुकुमारने कितनोंको तमाचोंके प्रहारसे मार डाला। भीमसेनकी मार खाकर सिंह, व्याघ्र
और चीते (बघेरे) भयसे उन्हें छोड़कर भाग चले तथा घबराकर मल-मूत्र करने लगे।
तदनन्तर महान् शक्तिशाली पाण्डुनन्दन भीमसेनने शीघ्र उन सबको छोड़कर अपनी
गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए एक वनमें प्रवेश किया ॥ ४७—४९ १/२ ॥
अथापश्यन्महाबाहुर्गन्धमादनसानुषु ॥ ५० ॥
सुरम्यं कदलीषण्डं बहुयोजनविस्तृतम् ।
तमभ्यगच्छद् वेगेन क्षोभयिष्यन् महाबलः ॥ ५१ ॥
महागज इवासावी प्रभञ्जन् विविधान् द्रुमान् ।
उत्पाट्य कदलीस्तम्भान् बहुतालसमुच्छ्रयान् ॥ ५२ ॥
चिक्षेप तरसा भीमः समन्ताद् बलिनां वरः ।
विनदन् सुमहातेजा नृसिंह इव दर्पितः ॥ ५३ ॥
ततः सत्त्वान्युपाक्रामद् बहूनि सुमहन्ति च ।
रुरुवानरसिंहांश्च महिषांश्च जलाशयान् ॥ ५४ ॥
तेन शब्देन चैवाथ भीमसेनरवेण च ।