महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 996, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रासयन् गजयूथानि वातरंहा वृकोदरः ।
सिंहव्याघ्रमृगांश्चैव मर्दयानो महाबलः ॥ ३७ ॥
उन्मूलयन् महावृक्षान् पोथयंस्तरसा बली ।
लतावल्लीश्च वेगेन विकर्षन् पाण्डुनन्दनः ।
उपर्युपरि शैलाग्रमारुरुक्षुरिव द्विपः ॥ ३८ ॥
द्रौपदीका अनुरोधपूर्ण वचन ही उनका पाथेय (मार्गका कलेवा) था, वे उसीको लेकर
शीघ्रतापूर्वक चले जा रहे थे। वायुके समान वेगशाली वृकोदर पर्वकालमें होनेवाले उत्पात
(भूकम्प और बिजली गिरने)-के समान अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित और
हाथियोंके समूहोंको आतंकित करते हुए चलने लगे। वे महाबली कुन्तीकुमार सिंहों, व्याघ्रों
और मृगोंको कुचलते तथा अपने वेगसे बड़े-बड़े वृक्षोंको जड़से उखाड़ते और विनाश करते
हुए आगे बढ़ने लगे। पाण्डुनन्दन भीम अपने वेगसे लताओं और बल्लरियोंको खींचे लिये
जाते थे। वे ऊपर-ऊपर जाते हुए ऐसे प्रतीत होते थे, मानो कोई गजराज पर्वतकी सबसे
ऊँची चोटीपर चढ़ना चाहता हो ॥ ३६—३८ ॥
विनर्दमानोऽतिभृशं सविद्युदिव तोयदः ।
तेन शब्देन महता भीमस्य प्रतिबोधिताः ॥ ३९ ॥
गुहां संतत्यजुर्व्याघ्रा निलिल्युर्वनवासिनः ।
समुत्पेतुः खगास्त्रस्ता मृगयूथानि दुद्रुवुः ॥ ४० ॥
वे बिजलियोंसे सुशोभित मेघकी भाँति बड़े जोरसे गर्जना करने लगे। भीमसेनकी उस
भयंकर गर्जनासे जगे हुए व्याघ्र अपनी गुफा छोड़कर भाग गये, वनवासी प्राणी वनमें ही
छिप गये, डरे हुए पक्षी आकाशमें उड़ गये और मृगोंके झुंड दूरतक भागते चले
गये ॥ ३९-४० ॥
ऋक्षाश्चोत्ससृजुर्वृक्षांस्तत्यजुर्हरयो गुहाम् ।
व्यजृम्भन्त महासिंहा महिषाश्चावलोकयन् ॥ ४१ ॥
रीछोंने वृक्षोंका आश्रय छोड़ दिया, सिंहोंने गुफाएँ त्याग दीं, बड़े-बड़े सिंह जँभाई लेने
लगे और जंगली भैंसे दूरसे ही उनकी ओर देखने लगे ॥ ४१ ॥
तेन वित्रासिता नागाः करेणुपरिवारिताः ।
तद् वनं स परित्यज्य जग्मुरन्यन्महावनम् ॥ ४२ ॥
भीमसेनकी उस गर्जनासे डरे हुए हाथी उस वनको छोड़कर हथिनियोंसे घिरे हुए दूसरे
विशाल वनमें चले गये ॥ ४२ ॥
वराहमृगसंघाश्च महिषाश्च वनेचराः ।
व्याघ्रगोमायुसंघाश्च प्रणेदुर्गवयैः सह ॥ ४३ ॥
रथाङ्गसाह्वदात्यूहा हंसकारण्डवप्लवाः ।
शुकाः पुंस्कोकिलाः क्रौञ्चा विसंज्ञा भेजिरे दिशः ॥ ४४ ॥