महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 995, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत्तवारणविक्रान्तो मत्तवारणवेगवान् ॥ २८ ॥
उनकी कद बहुत ऊँची थी। शरीरका रंग स्वर्ण-सा दमक रहा था। उनके सम्पूर्ण अंग सिंहके समान सुदृढ़ थे। उन्होंने युवावस्थामें पदार्पण किया था। वे मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे। उनका वेग मदोन्मत्त गजराजके समान था ॥ २८ ॥
मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवारणः । प्रियपार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः ॥ २९ ॥ यक्षगन्धर्वयोषाभिर्दृश्याभिर्निरीक्षितः । नवावतारो रूपस्य विक्रीडन्निव पाण्डवः ॥ ३० ॥ चचार रमणीयेषु गन्धमादनसानुषु । संस्मरन् विविधान् क्लेशान् दुर्योधनकृतान् बहून् ॥ ३१ ॥ द्रौपद्या वनवासिन्याः प्रियं कर्तुं समुद्यतः । सोऽचिन्तयद् गते स्वर्गमर्जुने मयि चागते ॥ ३२ ॥ पुष्पहेतोः कथं त्वार्यः करिष्यति युधिष्ठिरः । स्नेहान्नवरो नूनमविश्वासाद् बलस्य च ॥ ३३ ॥ नकुलं सहदेवं च न मोक्ष्यति युधिष्ठिरः । कथं तु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तयन् ॥ ३४ ॥ प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः । सज्जमानमनोदृष्टिः फुल्लेषु गिरिसानुषु ॥ ३५ ॥
मतवाले हाथीके समान ही उनकी लाल-लाल आँखें थीं। वे समरभूमिमें मदोन्मत्त हाथियोंको भी पीछे हटानेमें समर्थ थे। अपने प्रियतमके पार्श्वभागमें बैठी हुई यक्ष और गन्धर्वोंकी युवतियाँ सब प्रकारकी चेष्टाओंसे निवृत्त हो स्वयं अलक्षित रहकर भीमसेनकी ओर देख रही थीं। वे उन्हें सौन्दर्यके नूतन अवतार-से प्रतीत होते थे। इस प्रकार पाण्डुनन्दन भीम गन्धमादनके रमणीय शिखरोंपर खेल-सा करते हुए विचरने लगे। वे दुर्योधनद्वारा दिये गये नाना प्रकारके असंख्य क्लेशोंका स्मरण करते हुए वनवासिनी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए थे। उन्होंने मन-ही-मन सोचा—'अर्जुन स्वर्गलोकमें चले गये हैं और मैं फूल लेनेके लिये इधर चला आया हूँ। ऐसी दशामें आर्य युधिष्ठिर कोई कार्य कैसे करेंगे? नरश्रेष्ठ महाराज युधिष्ठिर नकुल और सहदेवपर अत्यन्त स्नेह रखते हैं। उन दोनोंके बलपर उन्हें विश्वास नहीं है। अतः वे निश्चय ही उन्हें नहीं छोड़ेंगे, अर्थात् कहीं नहीं भेजेंगे। अब कैसे मुझे शीघ्र वह फूल प्राप्त हो जाय—यह चिन्ता करते हुए नरश्रेष्ठ भीम पक्षिराज गरुड़के समान वेगसे आगे बढ़े। उनके मन और नेत्र फूलोंसे भरे हुए पर्वतीय शिखरोंपर लगे हुए थे॥ २९—३५ ॥
द्रौपदीवाक्यपाथेयो भीमः शीघ्रतरं ययौ । कम्पयन् मेदिनीं पद्भ्यां निर्घात इव पर्वसु ॥ ३६ ॥