भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 2580 में से

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ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया । सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो ॥ १४ ॥ यह सुनकर मैं कौरवोंकी दशा देखनेके लिये तुम्हारे पास आया हूँ। राजन्! तुम्हारे ऊपर सदासे ही मेरा स्नेह और प्रेम अधिक रहा है ॥ १४ ॥

नैतदौपयिकं राजंस्त्वयि भीष्मे च जीवति । यदन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते कथंचन ॥ १५ ॥ महाराज! तुम्हारे और भीष्मके जीते-जी यह उचित नहीं जान पड़ता कि तुम्हारे पुत्र किसी प्रकार आपसमें विरोध करें ॥ १५ ॥

मेढीभूतः स्वयं राजन् निग्रहे प्रग्रहे भवान् । किमर्थमनयं घोरमुत्पद्यन्तमुपेक्षसे ॥ १६ ॥ महाराज! तुम स्वयं इन सबको बाँधकर नियन्त्रणमें रखनेके लिये खंभेके समान हो; फिर पैदा होते हुए इस घोर अन्यायकी क्यों उपेक्षा कर रहे हो ॥ १६ ॥

दस्यूनामिव यद् वृत्तं सभायां कुरुनन्दन । तेन न भ्राजसे राजंस्तापसानां समागमे ॥ १७ ॥ कुरुनन्दन! तुम्हारी सभामें डाकुओंकी भाँति जो बर्ताव किया गया है, उसके कारण तुम तपस्वी मुनियोंके समुदायमें शोभा नहीं पा रहे हो ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो व्यावृत्य राजानं दुर्योधनममर्षणम् । उवाच श्लक्ष्णया वाचा मैत्रेयो भगवानृषिः ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर महर्षि भगवान् मैत्रेय अमर्षशील राजा दुर्योधनकी ओर मुड़कर उससे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले ॥ १८ ॥

मैत्रेय उवाच

दुर्योधन महाबाहो निबोध वदतां वर । वचनं मे महाभाग ब्रुवतो यद्धितं तव ॥ १९ ॥ मैत्रेयजीने कहा—महाबाहु दुर्योधन! तुम वक्ताओंमें श्रेष्ठ हो; मेरी एक बात सुनो। महाभाग! मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ ॥ १९ ॥

मा द्रुहः पाण्डवान् राजन् कुरुष्व प्रियमात्मनः । पाण्डवानां कुरूणां च लोकस्य च नरर्षभ ॥ २० ॥ राजन्! तुम पाण्डवोंसे द्रोह न करो। नरश्रेष्ठ! अपना, पाण्डवोंका, कुरुकुलका तथा सम्पूर्ण जगत्का प्रिय साधन करो ॥ २० ॥

ते हि सर्वे नरव्याघ्राः शूरा विक्रान्तयोधिनः । सर्वे नागायुतप्राणा वज्रसंहनना दृढाः ॥ २१ ॥

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