भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

मनुष्योंमें श्रेष्ठ सब पाण्डव शूरवीर, पराक्रमी और युद्धकुशल हैं। उन सबमें दस हजार हाथियोंका बल है। उनका शरीर वज्रके समान दृढ़ है ॥ २१ ॥
सत्यव्रतधराः सर्वे सर्वे पुरुषमानिनः।
हन्तारो देवशत्रूणां रक्षसां कामरूपिणाम् ॥ २२ ॥
हिडिम्बबकमुख्यानां किर्मीरस्य च रक्षसः।
वे सब-के-सब सत्यव्रतधारी और अपने पौरुषपर अभिमान रखनेवाले हैं। इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले देवद्रोही हिडिम्ब आदि राक्षसोंका तथा राक्षसजातीय किर्मीरका वध भी उन्होंने ही किया है ॥ २२ १/२ ॥
इतः प्रद्रवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम् ॥ २३ ॥
आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः।
तं भीमः समरश्लाघी बलेन बलिनां वरः ॥ २४ ॥
जघान पशुमारेण व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा।
पश्य दिग्विजये राजन् यथा भीमेन पातितः ॥ २५ ॥
जरासंधो महेष्वासो नागायुतबलो युधि।
सम्बन्धी वासुदेवश्च श्यालाः सर्वे च पार्षताः ॥ २६ ॥
यहाँसे रातमें जब वे महात्मा पाण्डव चले जा रहे थे, उस समय उनका मार्ग रोककर भयंकर और पर्वतके समान विशालकाय किर्मीर उनके सामने खड़ा हो गया। युद्धकी श्लाघा रखनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उस राक्षसको बलपूर्वक पकड़कर पशुकी तरह वैसे ही मार डाला, जैसे व्याघ्र छोटे मृगको मार डालता है। राजन्! देखो, दिग्विजयके समय भीमसेनने उस महान् धनुर्धर राजा जरासंधको भी युद्धमें मार गिराया, जिसमें दस हजार हाथियोंका बल था। (यह भी स्मरण रखना चाहिये कि) वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण उनके सम्बन्धी हैं तथा द्रुपदके सभी पुत्र उनके साले हैं ॥ २३—२६ ॥
कस्तान् युधि समासीत जरामरणवान् नरः।
तस्य ते शम एवास्तु पाण्डवैर्भरतर्षभ ॥ २७ ॥
जरा और मृत्युके वशमें रहनेवाला कौन मनुष्य युद्धमें उन पाण्डवोंका सामना कर सकता है। भरतकुल-भूषण! ऐसे महापराक्रमी पाण्डवोंके साथ तुम्हें शान्तिपूर्वक मिलकर ही रहना चाहिये ॥ २७ ॥
कुरु मे वचनं राजन् मा मन्युवशमन्वगाः।
राजन्! तुम मेरी बात मानो; क्रोधके वशमें न होओ ॥ २७ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं तु ब्रुवतस्तस्य मैत्रेयस्य विशाम्पते ॥ २८ ॥
ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान सः।