महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वदभिद्रोहसंयुक्तं युद्धमुत्पत्स्यते महत् ।
तत्र भीमो गदाघातैस्तवोरूं भेत्स्यते बली ॥ ३४ ॥
‘तेरे द्रोहके कारण बड़ा भारी युद्ध छिड़ेगा, उसमें बलवान् भीमसेन अपनी गदाकी चोटसे तेरी जाँघ तोड़ डालेंगे’ ॥ ३४ ॥
इत्येवमुक्ते वचने धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
प्रसादयामास मुनिं नैतदेवं भवेदिति ॥ ३५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर महाराज धृतराष्ट्रने मुनिको प्रसन्न किया और कहा—‘भगवन्! ऐसा न हो’ ॥ ३५ ॥
मैत्रेय उवाच
शमं यास्यति चेत् पुत्रस्तव राजन् यदा तदा ।
शापो न भविता तात विपरीते भविष्यति ॥ ३६ ॥
मैत्रेयजीने कहा— राजन्! जब तुम्हारा पुत्र शान्ति धारण करेगा (पाण्डवोंसे वैर-विरोध न करके मेल-मिलाप कर लेगा), तब यह शाप इसपर लागू न होगा। तात! यदि इसने विपरीत बर्ताव किया तो यह शाप इसे अवश्य भोगना पड़ेगा ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
विलक्षयंस्तु राजेन्द्रो दुर्योधनपिता तदा ।