महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैत्रेयं प्राह किर्मीरः कथं भीमेन पातितः ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब दुर्योधनके पिता महाराज धृतराष्ट्रने भीमसेनके बलका विशेष परिचय पानेके लिये मैत्रेयजीसे पूछा—‘मुने! भीमने किर्मीरको कैसे मारा?’ ॥ ३७ ॥
मैत्रेय उवाच
नाहं वक्ष्यामि ते भूयो न ते शुश्रूषते सुतः ।
एष ते विदुरः सर्वमाख्यास्यति गते मयि ॥ ३८ ॥
मैत्रेयजीने कहा— राजन्! तुम्हारा पुत्र मेरी बात सुनना नहीं चाहता, अतः मैं तुमसे इस समय फिर कुछ नहीं कहूँगा। ये विदुरजी मेरे चले जानेपर वह सारा प्रसंग तुम्हें बतायेंगे ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा मैत्रेयः प्रातिष्ठत यथाऽऽगतम् ।
किर्मीरवधसंविग्नो बहिर्दुर्योधनो ययौ ॥ ३९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर मैत्रेयजी जैसे आये थे वैसे ही चले गये। किर्मीरवधका समाचार सुनकर उद्विग्न हो दुर्योधन भी बाहर निकल गया ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि मैत्रेयशापे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें मैत्रेयशापविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥