महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1041, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यगाहत महाबाहुर्नलिनीं तां महाबलः ॥ १३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सभी राक्षसोंसे ऐसा कहकर अमर्षमें भरे हुए महाबली महाबाहु भीमसेन उस सरोवरमें प्रवेश करने लगे ॥ १३ ॥
ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् । मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सयद्भिः समन्ततः ॥ १४ ॥ उस समय क्रोधमें भरे राक्षस चारों ओरसे प्रतापी भीमको फटकारते हुए वाणीद्वारा रोकने लगे—‘नहीं-नहीं, ऐसा न करो’ ॥ १४ ॥
कदर्थीकृत्य तु स तान् राक्षसान् भीमविक्रमः । व्यगाहत महातेजास्ते तं सर्वे न्यवारयन् ॥ १५ ॥ परंतु भयंकर पराक्रमी महातेजस्वी भीम उन सब राक्षसोंकी अवहेलना करके उस जलाशयमें उतर ही गये। यह देख सब राक्षस उन्हें रोकनेकी चेष्टा करते हुए चिल्ला उठे— ॥ १५ ॥
गृह्णीत बध्नीत विकर्ततेमं पचाम खादाम च भीमसेनम् । क्रुद्धा ब्रुवन्तोऽभिययुर्द्रुतं ते शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ॥ १६ ॥ ‘अरे! इसे पकड़ो, बाँध लो, काट डालो, हम सब लोग इस भीमको पकायेंगे और खा जायँगे।’ क्रोधपूर्वक उपर्युक्त बातें कहते और आँखें फाड़-फाड़कर देखते हुए वे सभी राक्षस शस्त्र उठाकर तुरंत उनकी ओर दौड़े ॥ १६ ॥
ततः स गुर्वी यमदण्डकल्पां महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् । प्रगृह्य तानभ्यपतत् तरस्वी ततोऽब्रवीत् तिष्ठत तिष्ठतेति ॥ १७ ॥ तब भीमसेनने यमदण्डके समान विशाल और भारी गदा उठा ली, जिसपर सोनेका पत्र मढ़ा हुआ था। उसे लेकर वे बड़े वेगसे उन राक्षसोंपर टूट पड़े और ललकारते हुए बोले—‘खड़े रहो, खड़े रहो’ ॥ १७ ॥