भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1042, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1042

ते तं तदा तोमरपट्टिशाद्यै- र्व्याविद्धशस्त्रैः सहसा निपेतुः । जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा भीमं समन्तात् परिवव्रुरुग्राः ॥ १८ ॥ वातेन कुन्त्यां बलवान् सुजातः शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता । सत्ये च धर्मे च रतः सदैव पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १९ ॥ यह देख वे भयंकर क्रोधवश नामक राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुओंके शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले तोमर, पट्टिश आदि आयुधोंको लेकर सहसा उनकी ओर दौड़े और उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। वे सब-के-सब बड़े उग्र स्वभावके थे। इधर भीमसेन कुन्तीदेवीके गर्भसे वायु देवताके द्वारा उत्पन्न होनेके कारण बड़े बलवान्, शूरवीर, वेगशाली एवं शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। वे सदा ही सत्य एवं धर्ममें रत थे। पराक्रमी तो वे ऐसे थे कि अनेक शत्रु मिलकर भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १८-१९ ॥ तेषां स मार्गान् विविधान् महात्मा विहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् ।

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