महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1043, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा प्रवीरान् निजघान भीमः परं शतं पुष्करिणीसमीपे ॥ २० ॥ महामना भीमने शत्रुओंके भाँति-भाँतिके पैंतरों तथा अस्त्र-शस्त्रोंको विफल करके उनके सौसे भी अधिक प्रमुख वीरोंको उस सरोवरके समीप मार गिराया ॥ २० ॥ ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा विद्याबलं बाहुबलं तथैव । अशक्नुवन्तः सहितं समन्ताद् द्रुतं प्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २१ ॥ भीमसेनका पराक्रम, शारीरिक बल, विद्याबल और बाहुबल देखकर वे वीर राक्षस एक साथ संगठित होकर भी उनका वेग सहनेमें असमर्थ हो गये और सहसा सब ओरसे युद्ध छोड़कर निवृत्त हो गये ॥ २१ ॥ विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण- माकाशमास्थाय विमूढसंज्ञाः । कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ॥ २२ ॥ भीमसेनकी मारसे क्षत-विक्षत एवं पीड़ित हो वे क्रोधवश नामक राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। अतः उनके पाँव उखड़ गये और वे तुरंत वहाँसे आकाशमें उड़कर कैलासके शिखरोंपर भाग गये ॥ २२ ॥ स शक्रवद् दानवदैत्यसङ्घान् विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् । विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः कामाय जग्राह ततोऽम्बुजानि ॥ २३ ॥ शत्रुविजयी भीम इन्द्रकी भाँति पराक्रम करके दानव और दैत्योंके दलको युद्धमें हराकर उस सरोवरमें प्रविष्ट हो इच्छानुसार कमलोंका संग्रह करने लगे ॥ २३ ॥ ततः स पीत्वामृतकल्पमम्भो भूयो बभूवोत्तमवीर्यतेजाः । उत्पाट्य जग्राह च सोऽम्बुजानि सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ॥ २४ ॥ तदनन्तर उस सरोवरका अमृतके समान मधुर जल पीकर वे पुनः उत्तम बल और तेजसे सम्पन्न हो गये और श्रेष्ठ सुगन्धसे युक्त सौगन्धिक कमलोंको उखाड़-उखाड़कर संगृहीत करने लगे ॥ २४ ॥ ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य धनेश्वरं भीमबलप्रणुन्नाः ।