महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1044, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीमस्य वीर्यं च बलं च संख्ये यथावदाचख्युरतीव भीताः ॥ २५ ॥ तब भीमसेनके बलसे पीड़ित और अत्यन्त भयभीत हुए क्रोधवशोंने धनाध्यक्ष कुबेरके पास जाकर युद्धमें भीमके बल और पराक्रमका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २५ ॥
तेषां वचस्तत् तु निशम्य देवः प्रहस्य रक्षांसि ततोऽभ्युवाच । गृह्णातु भीमो जलजानि कामात् कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ॥ २६ ॥ उनकी बातें सुनकर देवप्रवर कुबेरने हँसकर उन राक्षसोंसे कहा—‘मुझे यह मालूम है। भीमसेनको द्रौपदीके लिये इच्छानुसार कमल ले लेने दो’ ॥ २६ ॥
ततोऽभ्यनुज्ञाप्य धनेश्वरं ते जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः । भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां यथोपजोषं विहरन्तमेकम् ॥ २७ ॥ तब धनाध्यक्षकी आज्ञा पाकर वे राक्षस रोषरहित हो कुरुप्रवर भीमके पास गये और उन्हें अकेले ही उस सरोवरमें इच्छानुसार विहार करते देखा ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥