महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयथारूपाणि पश्यामि स्वभ्यग्रो नः पराक्रमः । एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षाञ्चक्रे समन्ततः ॥ ८ ॥ इसके सिवा और भी बहुत-से भयानक उत्पात वहाँ प्रकट होने लगे। यह अद्भुत घटना देखकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने कहा—'कौन हम लोगोंको पराजित कर सकेगा? रणोन्मत्त पाण्डवो! तुम्हारा भला हो, तुम युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं जैसे लक्षण देख रहा हूँ, उससे पता लगता है कि हमारे लिये पराक्रम दिखानेका समय अत्यन्त निकट आ गया है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने चारों ओर दृष्टिपात किया ॥ ६—८ ॥
अपश्यमानो भीमं तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । ततः कृष्णां यमौ चापि समीपस्थावरिंदमः ॥ ९ ॥ पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे । कच्चित् क्व भीमः पाञ्चालि किंचित् कृत्यं चिकीर्षति ॥ १० ॥ जब भीम नहीं दिखायी दिये, तब शत्रुदमन धर्मनन्दन युधिष्ठिरने द्रौपदी तथा पास ही बैठे हुए नकुल-सहदेवसे अपने भाई भीमके सम्बन्धमें, जो रणभूमिमें भयानक कर्म करनेवाले थे, पूछा—'पांचाल-राजकुमारी! भीमसेन कहाँ है? क्या वे कोई काम करना चाहते हैं? ॥ ९-१० ॥
कृतवानपि वा वीरः साहसं साहसप्रियः । इमे ह्यकस्मादुत्पाता महासमरदर्शनाः ॥ ११ ॥ 'अथवा साहसप्रेमी वीरवर भीमने कोई साहसका कार्य तो नहीं कर डाला? यह अकस्मात् प्रकट हुए उत्पात महान् युद्धके सूचक हैं ॥ ११ ॥
दर्शयन्तो भयं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः । तं तथावादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी । प्रिया प्रियं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ॥ १२ ॥ 'ये चारों ओर तीव्र भयका प्रदर्शन करते हुए प्रकट हो रहे हैं।' धर्मराज युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मनोहर मुसकानवाली मनस्विनी महारानी पतिप्रिया द्रौपदीने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे इस प्रकार उत्तर दिया ॥
द्रौपद्युवाच
यत् तत् सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना । तन्मया भीमसेनस्य प्रीतयाद्योपपादितम् ॥ १३ ॥ अपि चोक्तो मया वीरो यदि पश्येर्बहून्यपि । तानि सर्वाण्युपादाय शीघ्रमागम्यतामिति ॥ १४ ॥ द्रौपदी बोली—राजन्! आज जो सौगन्धिक पुष्प वायु उड़ा लायी थी, उसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक भीमसेनको दिया और उन वीरशिरोमणिसे यह भी कहा कि 'यदि इसी