भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1047

तरहके बहुत-से पुष्प तुम्हें दिखायी दें, तो उन सबको लेकर शीघ्र यहाँ लौट आना।' ॥ १३-१४ ॥

स तु नूनं महाबाहुः प्रियार्थं मम पाण्डवः । प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ॥ १५ ॥ महाराज! मालूम होता है कि वे महाबाहु पाण्डुकुमार निश्चय ही मेरा प्रिय करनेके लिये उन्हीं फूलोंको लानेके निमित्त यहाँसे पूर्वोत्तर दिशाको गये हैं ॥ १५ ॥

उक्तस्त्वेवं तया राजा यमाविदमथाब्रवीत् । गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ॥ १६ ॥ द्रौपदीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने नकुल-सहदेवसे इस प्रकार कहा—'अब हम लोग भी एक साथ शीघ्र ही उस मार्गपर चलें' जिससे भीमसेन गये हैं ॥ १६ ॥

वहन्तु राक्षसा विप्रान् यथाश्रान्तान् यथाकृशान् । त्वमप्यमरसंकाश वह कृष्णां घटोत्कच ॥ १७ ॥ 'देवताओंके समान तेजस्वी घटोत्कच! तुम्हारे साथी राक्षस लोग इन ब्राह्मणोंको, जो जैसे थके और दुर्बल हों, उसके अनुसार कंधेपर बिठाकर ले चलें और तुम भी द्रौपदीको ले चलो ॥ १७ ॥

व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इति मे मतिः । चिरं च तस्य कालोऽयं स च वायुसमो जवे ॥ १८ ॥ तरस्वी वैनतेयस्य सदृशो भुवि लंघने । उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ॥ १९ ॥ 'यह स्पष्ट जान पड़ता है कि भीमसेन यहाँसे बहुत दूर चले गये हैं, मेरा यही विश्वास है। क्योंकि उनको गये बहुत समय हो गया है तथा वे वेगमें वायुके समान हैं और इस पृथ्वीको लाँघनेमें गरुड़के समान शीघ्रगामी हैं। वे आकाशमें छलाँग मार सकते हैं और इच्छानुसार कहीं भी कूद सकते हैं ॥ १८-१९ ॥

तमन्वियाम भवतां प्रभावाद् रजनीचराः । पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां ब्रह्मवादिनाम् ॥ २० ॥ 'निशाचरो! भीमसेन ब्रह्मवादी सिद्धोंका कुछ अपराध न कर पावें, इसके पहले ही तुम्हारे प्रभावसे हम उन्हें ढूँढ़ निकालें' ॥ २० ॥

तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे हैडिम्बप्रमुखास्तदा । उद्देशज्ञाः कुबेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ॥ २१ ॥ आदाय पाण्डवांश्चैव तांश्च विप्राननेकशः । लोमशेनैव सहिताः प्रययुः प्रीतमानसाः ॥ २२ ॥ जनमेजय! तब कुबेरके उस सरोवरका पता जाननेवाले उन घटोत्कच आदि सब राक्षसोंने 'तथास्तु' कहकर पाण्डवों तथा उन अनेकानेक ब्राह्मणोंको कंधेपर बैठाकर