महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोमशजीके साथ वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान किया ।। २१-२२ ।। ते सर्वे त्वरिता गत्वा ददृशुः शुभकाननाम् । पद्मसौगन्धिकवतीं नलिनीं सुमनोरमाम् ।। २३ ।। उन सबने शीघ्रतापूर्वक जाकर सुन्दर वनस्थलीसे सुशोभित वह अत्यन्त मनोरम सरोवर देखा, जिसमें सौगन्धिक कमल थे ।। २३ ।। तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे मनस्विनम् । ददृशुर्निहतांश्चैव यक्षांश्च विपुलेक्षणान् ।। २४ ।। भिन्नकायाक्षिबाहूरून् संचूर्णितशिरोधरान् । तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् ।। २५ ।। उसके तटपर मनस्वी महामना भीमको तथा उनके द्वारा मारे गये बड़े-बड़े नेत्रोंवाले यक्षोंको भी देखा—जिनके शरीर, नेत्र, भुजाएँ और जाँघें छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, गर्दन कुचल दी गयी थी, महात्मा भीम उस सरोवरके तटपर खड़े थे ।। २४-२५ ।। सक्रोधं स्तब्धनयनं संदष्टदशनच्छदम् । उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरेष्ववस्थितम् ।। २६ ।। उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ था। उनकी आँखें स्तब्ध हो रही थीं। वे दोनों हाथोंसे गदा उठाये और दाँतोंसे ओठ दबाये नदीके तटपर खड़े थे ।। २६ ।। प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् । तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुनः पुनः ।। २७ ।। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो प्रजाके संहारकालमें दण्ड हाथमें लिये यमराज खड़े हों। भीमसेनको उस अवस्थामें देखकर धर्मराजने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ।। २७ ।। उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय किमिदं कृतम् । साहसं बत भद्रं ते देवानामथ चाप्रियम् ।। २८ ।। और मधुर वाणीमें कहा—'कुन्तीनन्दन! यह तुमने क्या कर डाला? तुम्हारा कल्याण हो। खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह कार्य साहसपूर्ण है और देवताओंके लिये अप्रिय है ।। २८ ।। पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् । अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च ।। २९ ।। तस्यामेव नलिन्यां तु विजहुरमरोपमाः । एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधाः ।। ३० ।। प्रादुरासन् महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः । ते दृष्ट्वा धर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम् ।। ३१ ।। नकुलं सहदेवं च तथान्यान् ब्राह्मणर्षभान् ।