भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1057

एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामतिः ॥ २३ ॥ ‘खोटी बुद्धिवाले राक्षस! तू हमारा अन्न खाकर हमें ही हर ले जानेकी इच्छा कैसे करता है? इस प्रकार तो अबतक तूने ब्राह्मणरूपसे जो आचार दिखाया था, वह सब व्यर्थ ही था। तेरा बढ़ना या वृद्ध होना भी व्यर्थ ही है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है॥ २३॥ वृथामरणमर्हश्च वृथाद्य न भविष्यसि । अथ चेद् दुष्टबुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः ॥ २४ ॥ प्रदाय शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर । अथ चेत् त्वमविज्ञानादिदं कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥ अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् । एतामद्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम् ॥ २६ ॥ विषमेतत् समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वया । ततो युधिष्ठिरस्तस्य गुरुकः समपद्यत ॥ २७ ॥ ‘ऐसी दशामें तू व्यर्थ मृत्युका ही अधिकारी है और आज व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण नष्ट हो जायँगे। यदि तेरी बुद्धि दुष्टतापर ही उतर आयी है और तू सम्पूर्ण धर्मोंको भी छोड़ बैठा है, तो हमें हमारे अस्त्र देकर युद्ध कर तथा उसमें विजयी होनेपर द्रौपदीको ले जा। यदि तू अज्ञानवश यह विश्वासघात या अपहरण कर्म करेगा, तो संसारमें तुझे केवल अधर्म और अकीर्ति ही प्राप्त होगी। निशाचर! आज तूने इस मानवजातिकी स्त्रीका स्पर्श करके जो पाप किया है, यह भयंकर विष है, जिसे तूने घड़ेमें घोलकर पी लिया है।’ इतना कहकर युधिष्ठिर उसके लिये बहुत भारी हो गये ॥ २४—२७ ॥ स तु भाराभिभूतात्मा न तथा शीघ्रगोऽभवत् । अथाब्रवीद् द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः ॥ २८ ॥ भारसे उसका शरीर दबने लगा, इसलिये अब वह पहलेकी तरह शीघ्रतापूर्वक न चल सका। तब युधिष्ठिरने नकुल और द्रौपदीसे कहा— ॥ २८ ॥ मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद् गतिरस्य मया हृता । नातिदूरे महाबाहुर्भविता पवनात्मजः ॥ २९ ॥ ‘तुमलोग इस मूढ़ राक्षससे डरना मत। मैंने इसकी गति कुण्ठित कर दी है। वायुपुत्र महाबाहु भीमसेन यहाँसे अधिक दूर नहीं होंगे ॥ २९ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते न भविष्यति राक्षसः । सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतनम् ॥ ३० ॥ उवाच वचनं राजन् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । राजन् किंनाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोऽधिकम् ॥ ३१ ॥ यद् युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रुं जयेत वा । एष चास्मान् वयं चैनं युद्ध्यमानाः परंतप ॥ ३२ ॥