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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

एवमेव वृथाचारो वृथावृद्धो वृथामतिः ॥ २३ ॥ ‘खोटी बुद्धिवाले राक्षस! तू हमारा अन्न खाकर हमें ही हर ले जानेकी इच्छा कैसे करता है? इस प्रकार तो अबतक तूने ब्राह्मणरूपसे जो आचार दिखाया था, वह सब व्यर्थ ही था। तेरा बढ़ना या वृद्ध होना भी व्यर्थ ही है। तेरी बुद्धि भी व्यर्थ है॥ २३॥ वृथामरणमर्हश्च वृथाद्य न भविष्यसि । अथ चेद् दुष्टबुद्धिस्त्वं सर्वैर्धर्मैर्विवर्जितः ॥ २४ ॥ प्रदाय शस्त्राण्यस्माकं युद्धेन द्रौपदीं हर । अथ चेत् त्वमविज्ञानादिदं कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥ अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् । एतामद्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम् ॥ २६ ॥ विषमेतत् समालोड्य कुम्भेन प्राशितं त्वया । ततो युधिष्ठिरस्तस्य गुरुकः समपद्यत ॥ २७ ॥ ‘ऐसी दशामें तू व्यर्थ मृत्युका ही अधिकारी है और आज व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण नष्ट हो जायँगे। यदि तेरी बुद्धि दुष्टतापर ही उतर आयी है और तू सम्पूर्ण धर्मोंको भी छोड़ बैठा है, तो हमें हमारे अस्त्र देकर युद्ध कर तथा उसमें विजयी होनेपर द्रौपदीको ले जा। यदि तू अज्ञानवश यह विश्वासघात या अपहरण कर्म करेगा, तो संसारमें तुझे केवल अधर्म और अकीर्ति ही प्राप्त होगी। निशाचर! आज तूने इस मानवजातिकी स्त्रीका स्पर्श करके जो पाप किया है, यह भयंकर विष है, जिसे तूने घड़ेमें घोलकर पी लिया है।’ इतना कहकर युधिष्ठिर उसके लिये बहुत भारी हो गये ॥ २४—२७ ॥ स तु भाराभिभूतात्मा न तथा शीघ्रगोऽभवत् । अथाब्रवीद् द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः ॥ २८ ॥ भारसे उसका शरीर दबने लगा, इसलिये अब वह पहलेकी तरह शीघ्रतापूर्वक न चल सका। तब युधिष्ठिरने नकुल और द्रौपदीसे कहा— ॥ २८ ॥ मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद् गतिरस्य मया हृता । नातिदूरे महाबाहुर्भविता पवनात्मजः ॥ २९ ॥ ‘तुमलोग इस मूढ़ राक्षससे डरना मत। मैंने इसकी गति कुण्ठित कर दी है। वायुपुत्र महाबाहु भीमसेन यहाँसे अधिक दूर नहीं होंगे ॥ २९ ॥ अस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते न भविष्यति राक्षसः । सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतनम् ॥ ३० ॥ उवाच वचनं राजन् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । राजन् किंनाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोऽधिकम् ॥ ३१ ॥ यद् युद्धेऽभिमुखः प्राणांस्त्यजेच्छत्रुं जयेत वा । एष चास्मान् वयं चैनं युद्ध्यमानाः परंतप ॥ ३२ ॥

सूदयेम महाबाहो देशकालो ह्ययं नृप । क्षत्रधर्मस्य सम्प्राप्तः कालः सत्यपराक्रमः ॥ ३३ ॥ 'इस आगामी मुहूर्तके आते ही इस राक्षसके प्राण नहीं रहेंगे।' इधर सहदेवने उस मूढ़ राक्षसकी ओर देखते हुए कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! क्षत्रियके लिये इससे अधिक सत्कर्म क्या होगा कि वह युद्धमें शत्रु का सामना करते हुए प्राणोंका त्याग कर दे अथवा शत्रुको ही जीत ले। राजन्! इस प्रकार यह हमें अथवा हम इसे युद्ध करते हुए मार डालें। परंतप महाबाहु नरेश! यह क्षत्रिय धर्मके अनुकूल देश-काल प्राप्त हुआ है। यह समय यथार्थ पराक्रम प्रकट करनेके लिये है ॥ ३०—३३ ॥ जयन्तो हन्यमाना वा प्राप्तुमर्हाम सद्गतिम् । राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमियाद् यदि ॥ ३४ ॥ नाहं ब्रूयां पुनर्जातु क्षत्रियोऽस्मीति भारत । भो भो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोऽस्मि पाण्डवः ॥ ३५ ॥ हत्वा वा मां नयस्वैनां हतो वाद्येह स्वप्स्यसि । तदा ब्रुवति माद्रेये भीमसेनो यदृच्छया ॥ ३६ ॥ प्रत्यदृश्यद् गदाहस्तः सवज्र इव वासवः । सोऽपश्यद् भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् ॥ ३७ ॥ 'भारत! हम विजयी हों या मारे जायँ, सभी दशाओंमें उत्तम गति प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस राक्षसके जीते-जी सूर्य डूब गये, तो मैं फिर कभी अपनेको क्षत्रिय नहीं कहूँगा। अरे ओ निशाचर! खड़ा रह, मैं पाण्डुकुमार सहदेव हूँ, या तो तू मुझे मारकर द्रौपदीको ले जा या स्वयं मेरे हाथों मारा जाकर आज यहीं सदाके लिये सो जा।' माद्रीनन्दन सहदेव जब ऐसी बात कह रहे थे, उसी समय अकस्मात् गदा हाथमें लिये भीमसेन दिखायी दिये, मानो वज्रधारी इन्द्र आ पहुँचे हों। उन्होंने वहाँ (राक्षसके अधिकारमें पड़े हुए) अपने दोनों भाइयों तथा यशस्विनी द्रौपदीको देखा ॥ ३४—३७ ॥ क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा । मार्गाच्च राक्षसं मूढं कालोपहतचेतसम् ॥ ३८ ॥ भ्रमन्तं तत्र तत्रैव देवेन विनिवारितम् । भ्रातॄंस्तान् ह्रियतो दृष्ट्वा द्रौपदीं च महाबलः ॥ ३९ ॥ क्रोधमाहारयद् भीमो राक्षसं चेदमब्रवीत् । विज्ञातोऽसि मया पूर्वं पाप शस्त्रपरीक्षणे ॥ ४० ॥ उस समय सहदेव धरतीपर खड़े होकर राक्षसपर आक्षेप कर रहे थे और वह मूढ़ राक्षस मार्गसे भ्रष्ट होकर वहीं चक्कर काट रहा था। कालसे उसकी बुद्धि मारी गयी थी। दैवने ही उसे वहाँ रोक रखा था। भाइयों और द्रौपदीका अपहरण होता देख महाबली

भीमसेन कुपित हो उठे और जटासुरसे बोले—'ओ पापी! पहले जब तू शस्त्रोंकी परीक्षा कर रहा था, तभी मैंने तुझे पहचान लिया था॥ ३८—४०॥ आस्था तु त्वयि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा। ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रियम्॥ ४१॥ 'तुझपर मेरा विश्वास नहीं रह गया था, तो भी तू ब्राह्मणके रूपमें अपने असली स्वरूपको छिपाये हुए था और हमलोगोंसे कोई अप्रिय बात नहीं कहता था। इसीलिये मैंने तुम्हें तत्काल नहीं मार डाला॥ ४१॥ प्रियेषु रममाणं त्वां न चैवाप्रियकारिणम्। अतिथिं ब्रह्मरूपं च कथं हन्यामनागसम्॥ ४२॥ राक्षसं जानमानोऽपि यो हन्यान्नरकं व्रजेत्। अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते॥ ४३॥ 'तू हमारे प्रिय कार्योंमें मन लगाता था। जो हमें प्रिय न लगे, ऐसा काम नहीं करता था। ब्राह्मण अतिथिके रूपमें आया था और कभी कोई अपराध नहीं किया था। ऐसी दशामें मैं तुझे कैसे मारता? जो राक्षसको राक्षस जानते हुए भी बिना किसी अपराधके उसका वध करता है, वह नरकमें जाता है। अभी तेरा समय पूरा नहीं हुआ था, इसलिये भी आजसे पहले तेरा वध नहीं किया जा सकता था॥ ४२-४३॥ नूनमद्यासि सम्पक्वो यथा ते मतिरीदृशी। दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा॥ ४४॥ 'आज निश्चय ही तेरी आयु पूरी हो चुकी है, तभी तो अद्भुत कर्म करनेवाले कालने तुझे इस प्रकार द्रौपदीके अपहरणकी बुद्धि दी है॥ ४४॥ बडिशोऽयं त्वया ग्रस्तः कालसूत्रेण लम्बितः। मत्स्योऽम्भसीव स्यूतास्यः कथमद्य भविष्यसि॥ ४५॥ 'कालरूपी डोरेसे लटकाया हुआ बंसीका काँटा तूने निगल लिया है। तेरा मुँह जलकी मछलीके समान उस काँटेमें गुँथ गया है, अतः अब तू कैसे जीवन धारण करेगा? ॥ ४५॥ यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते। न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं बकहिडिम्बयोः॥ ४६॥ 'जिस देशकी ओर तू प्रस्थित हुआ है और जहाँ तेरा मन पहलेसे ही जा पहुँचा है, वहाँ अब तू न जा सकेगा। तुझे तो बक और हिडिम्बके मार्गपर जाना है,॥ ४६॥ एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः। भीत उत्सृज्य तान् सर्वान् युद्धाय समुपस्थितः॥ ४७॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर वह राक्षस भयभीत हो उन सबको छोड़कर कालकी प्रेरणासे युद्धके लिये उद्यत हो गया॥ ४७॥ अब्रवीच्च पुनर्भीमं रोषात् प्रस्फुरिताधरः।

न मे मूढा दिशः पाप त्वदर्थं मे विलम्बितम् ॥ ४८ ॥ उस समय रोषसे उसके ओठ फड़क रहे थे। उसने भीमसेनको उत्तर देते हुए कहा—'ओ पापी! मुझे दिग्भ्रम नहीं हुआ था। मैंने तेरे ही लिये विलम्ब किया था ॥ ४८ ॥

श्रुता मे राक्षसा ये ये त्वया विनिहता रणे । तेषामद्य करिष्यामि तवास्रेणोदकक्रियाम् ॥ ४९ ॥ 'तूने जिन-जिन राक्षसोंको युद्धमें मारा है, उन सबके नाम मैंने सुने हैं। आज तेरे रक्तसे ही मैं उनका तर्पण करूँगा, ॥ ४९ ॥

एवमुक्तस्ततो भीमः सृक्किणी परिसंलिहन् । स्मयमान इव क्रोधात् साक्षात् कालान्तकोपमः ॥ ५० ॥ (ब्रुवन् वै तिष्ठ तिष्ठेति क्रोधसंरक्तलोचनः ।) बाहुसंरम्भमेवैक्षन्नभिदुद्राव राक्षसम् । राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् ॥ ५१ ॥ मुहुर्मुहुर्व्याददानः सृक्किणी परिसंलिहन् । अभिदुद्राव संरब्धो बलिर्वज्रधरं यथा ॥ ५२ ॥ राक्षसके ऐसा कहनेपर भीमसेन अपने मुखके दोनों कोने चाटते हुए कुछ मुसकराते-से प्रतीत हुए फिर क्रोधसे साक्षात् काल और यमराजके समान जान पड़ने लगे। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं 'खड़ा रह,' खड़ा रह कहते हुए ताल ठोंककर राक्षसकी ओर दृष्टि गड़ाये उसपर टूट पड़े। राक्षस भी उस समय भीमसेनको युद्धके लिये उपस्थित देख बार-बार मुँह फैलाकर मुँहके दोनों कोने चाटने लगा और जैसे बलिराजा वज्रधारी इन्द्रपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार कुपित हो उसने भीमसेनपर धावा किया ॥ ५०—५२ ॥

(भीमसेनोऽप्यवष्टब्धो नियुद्धायाभवत् स्थितः । राक्षसोऽपि च विस्रब्धो बाहुयुद्धमकाङ्क्षत ॥ वर्तमाने तदा ताभ्यां बाहुयुद्धे सुदारुणे । माद्रीपुत्रावतिक्रुद्धावुभावप्यभ्यधावताम् ॥ ५३ ॥ भीमसेन भी स्थिर होकर उससे युद्धके लिये खड़े हो गये और वह राक्षस भी निश्चिन्त हो उनके साथ बाहुयुद्धकी इच्छा करने लगा। उस समय उन दोनोंमें बड़ा भयंकर बाहुयुद्ध होने लगा। यह देख माद्रीपुत्र नकुल और सहदेव अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसकी ओर दौड़े ॥ ५३ ॥

न्यवारयत् तौ प्रहसन् कुन्तीपुत्रो वृकोदरः । शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाब्रवीत् ॥ ५४ ॥ परंतु कुन्तीकुमार भीमसेनने हँसकर उन दोनोंको रोक दिया और कहा—'मैं अकेला ही इस राक्षसके लिये पर्याप्त हूँ। तुमलोग चुप-चाप देखते रहो' ॥ ५४ ॥

आत्मना भ्रातृभिश्चैव धर्मेण सुकृतेन च ।

इष्टेन च शपे राजन् सूदयिष्यामि राक्षसम् ॥ ५५ ॥
फिर वे युधिष्ठिरसे बोले—'महाराज! मैं अपनी, सब भाइयोंकी, धर्मकी, पुण्य कर्मोंकी तथा यज्ञकी शपथ खाकर कहता हूँ, इस राक्षसको अवश्य मार डालूँगा ॥ ५५ ॥
इत्येवमुक्त्वा तौ वीरौ स्पर्धमानौ परस्परम् ।
बाहुभ्यां समसज्जेतामुभौ रक्षोवृकोदरौ ॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर वे दोनों वीर राक्षस और भीम एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए बाँहोंसे बाँहें मिलाकर गुथ गये ॥ ५६ ॥
तयोरासीत् सम्प्रहारः क्रुद्धयोर्भीमरक्षसोः ।
अमृष्यमाणयोः सङ्ख्ये देवदानवयोरिव ॥ ५७ ॥
भीमसेन तथा राक्षस दोनोंमें देवताओं और दानवोंके समान युद्ध होने लगा। दोनों ही रोष और अमर्षमें भरकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे ॥ ५७ ॥
आरुज्यारुज्य तौ वृक्षानन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
जीमूताविव गर्जन्तौ निनदन्तौ महाबलौ ॥ ५८ ॥
दोनोंका बल महान् था। वे गर्जते हुए दो मेघोंकी भाँति सिंहनाद करके वृक्षोंको तोड़-तोड़कर परस्पर चोट करते थे ॥ ५८ ॥
बभञ्जतुर्महावृक्षानूरुभिर्बलिनां वरौ ।
अन्योन्येनाभिसंरब्धौ परस्परवधैषिणौ ॥ ५९ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अपनी जाँघोंके धक्केसे बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ डालते थे और परस्पर कुपित हो एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखते थे ॥ ५९ ॥
तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ।
बालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोः पुरा स्त्रीकाङ्क्षिणोर्यथा ॥ ६० ॥
जैसे पूर्वकालमें स्त्रीकी इच्छावाले दो भाई बालि और सुग्रीवमें भयंकर संग्राम हुआ था, उसी प्रकार भीमसेन और राक्षसमें होने लगा। उन दोनोंका वह वृक्षयुद्ध उस वनके वृक्षसमूहोंके लिये महान् विनाशकारी सिद्ध हुआ ॥ ६० ॥
आविध्याविध्य तौ वृक्षान् मुहूर्तमितरेतरम् ।
ताडयामासतुरुभौ विनदन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ६१ ॥
वे दोनों बड़े-बड़े वृक्षोंको हिला-हिलाकर बार-बार विकट गर्जना करते हुए दो घड़ीतक एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे ॥ ६१ ॥
तस्मिन् देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः ।
पुञ्जीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सया ॥ ६२ ॥
ततः शिलाः समादाय मुहूर्तमिव भारत ।
महाभैरिव शैलेन्द्रौ युयुधाते महाबलौ ॥ ६३ ॥
शिलाभिरुग्ररूपाभिर्बृहतीभिः परस्परम् ।

वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ॥ ६४ ॥ भारत! जब उस प्रदेशके सारे वृक्ष गिरा दिये गये, तब एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे उन महाबली वीरोंने वहाँ ढेर-की-ढेर पड़ी हुई सैकड़ों शिलाएँ लेकर दो घड़ीतक इस प्रकार युद्ध किया, मानो दो पर्वतराज बड़े-बड़े मेघखण्डोंद्वारा परस्पर युद्ध कर रहे हों। वहाँकी शिलाएँ विशाल और अत्यन्त भयंकर थीं। वे देखनेमें महान् वेगशाली वज्रोंके समान जान पड़ती थीं। अमर्षमें भरे हुए वे दोनों योद्धा उन्हीं शिलाओंद्वारा एक-दूसरेको मारने लगे ॥ ६२—६४ ॥

अभिद्रुत्य च भूयस्तावन्योन्यं बलदर्पितौ । भुजाभ्यां परिगृह्याथ चकषाते गजाविव ॥ ६५ ॥ तत्पश्चात् अपने-अपने बलके घमण्डमें भरे हुए वे दोनों वीर एक दूसरेकी ओर झपटकर पुनः अपनी भुजाओंसे कसते हुए विपक्षीको उसी प्रकार खींचने लगे, जैसे दो गजराज परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको खींच रहे हों ॥ ६५ ॥

मुष्टिभिश्च महाघोरैरन्योन्यमभिजघ्नतुः । ततः कटकटाशब्दो बभूव सुमहात्मनोः ॥ ६६ ॥ अपने अत्यन्त भयानक मुक्कोंद्वारा वे परस्पर चोट करने लगे। तब उन दोनों महाकाय वीरोंमें जोर-जोरसे कटकटानेकी आवाज होने लगी ॥ ६६ ॥

ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् । वेगेनाभ्यहनद् भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ॥ ६७ ॥ तदनन्तर भीमसेनने पाँच सिरवाले सर्पकी भाँति अपने पाँच अंगुलियोंसे युक्त हाथकी मुट्ठी बाँधकर उसे राक्षसकी गर्दनपर बड़े वेगसे दे मारा ॥ ६७ ॥

ततः श्रान्तं तु तद् रक्षो भीमसेनभुजाहतम् । सुपरिश्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ॥ ६८ ॥ भीमसेनकी भुजाओंके आघातसे वह राक्षस थक गया था। तदनन्तर उसे अधिक थका हुआ देख भीमसेन आगे बढ़ते गये ॥ ६८ ॥

तत एनं महाबाहुर्बाहुभ्याममरोपमः । समुत्क्षिप्य बलाद् भीमो विनिष्पिष्य महीतले ॥ ६९ ॥ तत्पश्चात् देवताओंके समान तेजस्वी महाबाहु भीमसेनने उस राक्षसको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक उठा लिया और उसे पृथ्वीपर पटककर पीस डाला ॥ ६९ ॥

तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णयामास पाण्डवः । अरत्निना चाभिहत्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमने उसके सारे अंगोंको दबाकर चूर-चूर कर दिया और थप्पड़ मारकर उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ ७० ॥

संदष्टौष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृक्षादिव च्युतम् ।

जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनबलाद्धृतम् ॥ ७१ ॥ भीमसेनके बलसे कटकर अलग हुआ जटासुरका वह सिर वृक्षसे टूटकर गिरे हुए फलके समान जान पड़ता था। उसका ओठ दाँतोंसे दबा हुआ था और आँखें बहुत फैली हुई थीं ॥ ७१ ॥

पपात रुधिरादिग्धं संदष्टदशनच्छदम् ।
तं निहत्य महेष्वासो युधिष्ठिरमुपागमत् ।
स्तूयमानो द्विजाग्र्यैस्तु मरुद्भिरिव वासवः ॥ ७२ ॥
दाँतोंसे दबे हुए ओठवाला वह मस्तक खूनसे लथपथ होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार जटासुरको मारकर महान् धनुर्धर भीमसेन युधिष्ठिरके पास आये। उस समय श्रेष्ठ द्विज उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, मानो मरुद्गण देवराज इन्द्रके गुण गा रहे हों ॥ ७२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि जटासुरवधपर्वणि सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत वनपर्वके अन्तर्गत जटासुरवधपर्वमें एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
॥ समाप्तं जटासुरवधपर्व ॥

(यक्षयुद्धपर्व)

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(यक्षयुद्धपर्व)

अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

नर-नारायण-आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना

वैशम्पायन उवाच

निहते राक्षसे तस्मिन् पुनर्नारायणाश्रमम् ।
अभ्येत्य राजा कौन्तेयो निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—उस राक्षसके मारे जानेपर कुन्तीकुमार शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर पुनः नर-नारायण-आश्रममें आकर रहने लगे ॥ १ ॥

स समानीय तान् सर्वान् भ्रातॄनित्यब्रवीद् वचः ।
द्रौपद्या सहितान् काले संस्मरन् भ्रातरं जयम् ॥ २ ॥
एक दिन उन्होंने द्रौपदीसहित सब भाइयोंको एकत्र करके अपने प्रियबन्धु अर्जुनका स्मरण करते हुए कहा— ॥ २ ॥

समाश्चतस्रोऽभिगताः शिवेन चरतां वने ।
कृतोद्देशः स बीभत्सुः पञ्चमीमभितः समाम् ॥ ३ ॥
'हमलोगोंको कुशलपूर्वक वनमें विचरते हुए चार वर्ष हो गये। अर्जुनने यह संकेत किया था कि मैं पाँचवें वर्षमें लौट आऊँगा ॥ ३ ॥

प्राप्य पर्वतराजानं श्वेतं शिखरिणां वरम् ।
पुष्पितैर्द्रुमषण्डैश्च मत्तकोकिलषट्पदैः ॥ ४ ॥
मयूरैश्चातकैश्चापि नित्योत्सवविभूषितम् ।
व्याघ्रैर्वराहैर्महिषैर्गवयैर्हरिणैस्तथा ॥ ५ ॥
श्वापदैर्व्यालरूपैश्च रुरुभिश्च निषेवितम् ।
फुल्लैः सहस्रपत्रैश्च शतपत्रैस्तथोत्पलैः ॥ ६ ॥
प्रफुल्लैः कमलैश्चैव तथा नीलोत्पलैरपि ।
महापुण्यं पवित्रं च सुरासुरनिषेवितम् ॥ ७ ॥
'पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज कैलासपर आकर अर्जुनसे मिलनेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षामें हमने यहाँ डेरा डाला है। (क्योंकि वहीं मिलनेका उनकी ओरसे संकेत प्राप्त हुआ था।) वह श्वेत कैलास-शिखर पुष्पित वृक्षावलियोंसे सुशोभित है। वहाँ मतवाले कोकिलोंकी काकली,

भ्रमरोंके गुंजारव तथा मोर और पपीहोंकी मीठी वाणीसे नित्य उत्सव-सा होता रहता है, जो उस पर्वतकी शोभाको बढ़ा देता है। वहाँ व्याघ्र, वराह, महिष, गवय, हरिण, हिंसक जन्तु, सर्प तथा रुरुमृग निवास करते हैं। खिले हुए सहस्रदल, शतदल, उत्पल, प्रफुल्ल कमल तथा नीलोत्पल आदिसे उस पर्वतकी रमणीयता और भी बढ़ गयी है। वह परम पुण्यमय और पवित्र है। देवता और असुर दोनों ही उसका सेवन करते हैं ।। ४—७ ।।

तत्रापि च कृतोद्देशः समागमदिदृक्षुभिः । कृतश्च समयस्तेन पार्थेनामिततेजसा ।। ८ ।। पञ्चवर्षाणि वत्स्यामि विद्यार्थीति पुरा मयि ।

'अमिततेजस्वी अर्जुनने वहाँ भी अपना आगमन देखनेके लिये उत्सुक हुए हमलोगोंके साथ संकेतपूर्वक यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं अस्त्रविद्याका अध्ययन करनेके लिये पाँच वर्षोंतक देवलोकमें निवास करूँगा ।।

अत्र गाण्डीवधन्वानमवाप्तास्त्रमरिन्दमम् ।। ९ ।। देवलोकादिमं लोकं द्रक्ष्यामः पुनरागतम् । इत्युक्त्वा ब्राह्मणान् सर्वानामन्त्रयत पाण्डवः ।। १० ।।

'शत्रुओंका दमन करनेवाले गाण्डीवधारी अर्जुन अस्त्रविद्या प्राप्त करके पुनः देवलोकसे इस मनुष्यलोकमें आनेवाले हैं। हमलोग शीघ्र ही उनसे मिलेंगे' ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको आमन्त्रित किया ।। ९-१० ।।

कारणं चैव तत् तेषामाचचक्षे तपस्विनाम् । तानुग्रतपसः प्रीतान् कृत्वा पार्थाः प्रदक्षिणाम् ।। ११ ।।

और उन तपस्वियोंके सामने उन्हें बुला भेजनेका कारण बताया। उन कठोर तपस्वियोंको प्रसन्न करके कुन्तीकुमारोंने उनकी परिक्रमा की ।। ११ ।।

ब्राह्मणास्तेऽन्वमोदन्त शिवेन कुशलेन च । सुखोदर्कमिमं क्लेशमचिराद् भरतर्षभ ।। १२ ।।

तब उन ब्राह्मणोंने कुशल-मंगलके साथ उन सबके अभीष्ट मनोरथकी पूर्तिको अनुमोदन किया और कहा—'भरतश्रेष्ठ! आजका यह क्लेश शीघ्र ही सुखद भविष्यके रूपमें परिणत हो जायगा ।। १२ ।।

क्षत्रधर्मेण धर्मज्ञ तीर्त्वा गां पालयिष्यसि । तत् तु राजा वचस्तेषां प्रतिगृह्य तपस्विनाम् ।। १३ ।। प्रतस्थे सह विप्रैस्तैर्भ्रातृभिश्च परन्तपः । राक्षसैरनुयातो वै लोमशेनाभिरक्षितः ।। १४ ।।

'धर्मज्ञ! तुम क्षत्रियधर्मके अनुसार इस संकटसे पार होकर सारी पृथ्वीका पालन करोगे।' राजा युधिष्ठिरने उन तपस्वी ब्राह्मणोंका यह आशीर्वाद शिरोधार्य किया और वे परंतप नरेश उन ब्राह्मणों तथा भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए। घटोत्कच आदि राक्षस

भी उनकी सेवाके लिये पीछे-पीछे चले। राजा युधिष्ठिर महर्षि लोमशके द्वारा सर्वथा सुरक्षित थे ॥ १३-१४ ॥ क्वचित् पद्भ्यां ततोऽगच्छद् राक्षसैरुह्यते क्वचित् । तत्र तत्र महातेजा भ्रातृभिः सह सुव्रतः ॥ १५ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे महातेजस्वी भूपाल कहीं तो भाइयोंसहित पैदल चलते और कहीं राक्षसलोग उन्हें पीठपर बैठाकर ले जाते थे। इस प्रकार वे अनेक स्थानोंमें गये ॥ १५ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । सिंहव्याघ्रगजाकीर्णामुदीचीं प्रययौ दिशम् ॥ १६ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिर अनेक क्लेशोंका चिन्तन करते हुए सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरी हुई उत्तर-दिशाकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥ अवेक्षमाणः कैलासं मैनाकं चैव पर्वतम् । गन्धमादनपादांश्च श्वेतं चापि शिलोच्चयम् ॥ १७ ॥ उपर्युपरि शैलस्य बह्वीश्च सरितः शिवाः । पृष्ठं हिमवतः पुण्यं ययौ सप्तदशेऽहनि ॥ १८ ॥ कैलास, मैनाकपर्वत, गन्धमादनकी घाटियों और श्वेत (हिमालय) पर्वतका दर्शन करते हुए उन्होंने पर्वतमालाओंके ऊपर-ऊपर बहुत-सी कल्याणमयी सरिताएँ देखीं तथा सत्रहवें दिन वे हिमालयके एक पावन पृष्ठभागपर जा पहुँचे ॥ १७-१८ ॥ ददृशुः पाण्डवा राजन् गन्धमादनमन्तिकात् । पृष्ठे हिमवतः पुण्ये नानाद्रुमलतावृते ॥ १९ ॥ सलिलावर्तसंजातैः पुष्पितैश्च महीरुहैः । समावृतं पुण्यतममाश्रमं वृषपर्वाणः ॥ २० ॥ तमुपागम्य राजर्षिं धर्मात्मानमरिन्दमाः । पाण्डवा वृषपर्वाणमवन्दन्त गतक्लमाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ पाण्डवोंने गन्धमादन पर्वतका निकटसे दर्शन किया। हिमालयका वह पावन पृष्ठभाग नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे आवृत्त था। वहाँ जलके आवर्तोंसे सींचकर उत्पन्न हुए फूलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ वृषपर्वाका परम पवित्र आश्रम था। शत्रुदमन पाण्डवोंने उन धर्मात्मा राजर्षि वृषपर्वाके पास जाकर क्लेशरहित हो उन्हें प्रणाम किया ॥ १९—२१ ॥ अभ्यनन्दत् स राजर्षिः पुत्रवद् भरतर्षभान् । पूजिताश्चावसंस्तत्र सप्तरात्रमरिन्दमाः ॥ २२ ॥ उन राजर्षिने भरतकुलभूषण पाण्डवोंका पुत्रके समान अभिनन्दन किया और उनसे सम्मानित होकर वे शत्रुदमन पाण्डव वहाँ सात रात ठहरे रहे ॥ २२ ॥

अष्टमेऽहनि सम्प्राप्ते तमृषिं लोकविश्रुतम् । आमन्त्र्य वृषपर्वाणं प्रस्थानं प्रत्यरोचयन् ।। २३ ।। आठवें दिन उन विश्वविख्यात राजर्षि वृषपर्वाकी आज्ञा ले उन्होंने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया ।। २३ ।।

एकैकशश्च तान् विप्रान् निवेद्य वृषपर्वणि । न्यासभूतान् यथाकालं बन्धूनिव सुसत्कृतान् ।। २४ ।। पारिबर्हं च तं शेषं परिदाय महात्मने । ततस्ते यज्ञपात्राणि रत्नान्याभरणानि च ।। २५ ।। न्यदधुः पाण्डवा राजन्नाश्रमे वृषपर्वणः । अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंको उन्होंने एक-एक करके वृषपर्वाके यहाँ धरोहरकी भाँति सौंपा। उन सबका पाण्डवोंने समय-समयपर सगे बन्धुकी भाँति सत्कार किया था। ब्राह्मणोंको सौंपनेके पश्चात् पाण्डवोंने अपनी शेष सामग्री भी उन्हीं महामनाको दे दी। तदनन्तर पाण्डुपुत्रोंने वृषपर्वाके ही आश्रममें अपने यज्ञपात्र तथा रत्नमय आभूषण भी रख दिये ।। २४-२५ १/२ ।।

अतीतानागते विद्वान् कुशलः सर्वधर्मवित् ।। २६ ।। अन्वशासत् स धर्मज्ञः पुत्रवद् भरतर्षभान् ।

तेऽनुज्ञाता महात्मानः प्रययुर्दिशमुत्तराम् ॥ २७ ॥ वृषपर्वा भूत और भविष्यके ज्ञाता, कार्यकुशल और सम्पूर्ण धर्मोंके मर्मज्ञ थे। उन धर्मज्ञ नरेशने भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंको पुत्रकी भाँति उपदेश दिया। उनकी आज्ञा पाकर महामना पाण्डव उत्तरदिशाकी ओर चले ॥ २६-२७ ॥ तान् प्रस्थितानभ्यगच्छद् वृषपर्वा महीपतिः । उपन्यस्य महातेजा विप्रेभ्यः पाण्डवांस्तदा ॥ २८ ॥ अनुसंसार्य कौन्तेयानाशीर्भिरभिनन्द्य च । वृषपर्वा निववृते पन्थानमुपदिश्य च ॥ २९ ॥ उस समय उनके प्रस्थान करनेपर महातेजस्वी राजर्षि वृषपर्वाने पाण्डवोंको (उस देशके जानकार अन्य) ब्राह्मणोंके सुपुर्द कर दिया और कुछ दूर पीछे-पीछे जाकर उन कुन्तीकुमारोंको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। तत्पश्चात् उन्हें रास्ता बताकर वृषपर्वा लौट आये ॥ २८-२९ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं कौन्तेयः सत्यविक्रमः । पदातिर्भ्रातृभिः सार्धं प्रातिष्ठत युधिष्ठिरः ॥ ३० ॥ फिर सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ पैदल ही (वृषपर्वाके बताये हुए मार्गपर) चले, जो अनेक जातिके मृगोंके झुंडोंसे भरा हुआ था ॥ ३० ॥ नानाद्रुमनिरोधेषु वसन्तः शैलसानुषु । पर्वतं विविशुः श्वेतं चतुर्थेऽहनि पाण्डवाः ॥ ३१ ॥ महाभ्रघनसंकाशं सलिलोपहितं शुभम् । मणिकाञ्चनरूप्यस्य शिलानां च समुच्चयम् ॥ ३२ ॥ (रूपं हिमवतः प्रस्थं बहुकन्दरनिर्झरम् । शिलाविभङ्गविकटं लतापादपसंकुलम् ॥) ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा । अनुसस्र्युर्यथोद्देशं पश्यन्तो विविधान्नगान् ॥ ३३ ॥ वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्झरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गम तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे ॥ ३१—३३ ॥ उपर्युपरि शैलस्य गुहाः परमदुर्गमाः । सुदुर्गामांस्ते सुबहून् सुखेनैवाभिचक्रमुः ॥ ३४ ॥

धौम्यः कृष्णा च पार्थाश्च लोमशश्च महर्षिः ।
अगच्छन् सहितास्तत्र न कश्चिदवहीयते ॥ ३५ ॥
उस पर्वतके ऊपर बहुत-सी अत्यन्त दुर्गम गुफाएँ थीं और अनेक दुर्गम्य प्रदेश थे। पाण्डव उन सबको सुखपूर्वक लाँघकर आगे बढ़ गये। पुरोहित धौम्य, द्रौपदी, चारों पाण्डव तथा महर्षि लोमश—ये सब लोग एक साथ चल रहे थे। कोई पीछे नहीं छूटता था ॥

ते मृगद्विजसंघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम् ।
शाखामृगगणैश्चैव सेवितं सुमनोरमम् ॥ ३६ ॥
पुण्यं पद्मसरोयुक्तं सपल्वलमहावनम् ।
उपतस्थुर्महाभागा माल्यवन्तं महागिरिम् ॥ ३७ ॥
आगे बढ़ते हुए वे महाभाग पाण्डव पुण्यमय माल्यवान् नामक महान् पर्वतपर जा पहुँचे, जो अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अत्यन्त मनोरम था। वहाँ मृगोंके झुंड विचरते और भाँति-भाँतिके पक्षी कलरव कर रहे थे। बहुत-से वानर भी उस पर्वतका सेवन करते थे। उसके शिखरपर कमलमण्डित सरोवर, छोटे-छोटे जलकुण्ड और विशाल वन थे ॥ ३६-३७ ॥

ततः किम्पुरुषावासं सिद्धचारणसेवितम् ।
ददृशुर्हृष्टरोमाणः पर्वतं गन्धमादनम् ॥ ३८ ॥
वहाँसे उन्हें गन्धमादन पर्वत दिखायी दिया, जो किम्पुरुषोंका निवासस्थान है। सिद्ध और चारण उसका सेवन करते हैं। उसे देखकर पाण्डवोंका रोम-रोम हर्षसे खिल उठा ॥ ३८ ॥

विद्याधरानुचरितं किन्नरीभिस्तथैव च ।
गजसङ्घमावासं सिंहव्याघ्रगणायुतम् ॥ ३९ ॥
उस पर्वतपर विद्याधर विहार करते थे। किन्नरियाँ क्रीड़ा करती थीं। झुंड-के-झुंड हाथी, सिंह और व्याघ्र निवास करते थे ॥ ३९ ॥

शरभोन्नादसंघुष्टं नानामृगनिषेवितम् ।
ते गन्धमादनवनं तन्नन्दनवनोपमम् ॥ ४० ॥
मुदिताः पाण्डुतनया मनोहृदयनन्दनम् ।
विविशुः क्रमशो वीराः शरण्यं शुभकाननम् ॥ ४१ ॥
शरभोंके सिंहनादसे वह पर्वत गूँजता रहता था। नाना प्रकारके मृग वहाँ निवास करते थे। गन्धमादन पर्वतका वह वन नन्दनवनके समान मन और हृदयको आनन्द देनेवाला था। वे वीर पाण्डुकुमार बड़े प्रसन्न होकर क्रमशः उस सुन्दर काननमें प्रविष्ट हुए, जो सबको शरण देनेवाला था ॥ ४०-४१ ॥

द्रौपदीसहिता वीरास्तैश्च विप्रैर्महात्मभिः ।
शृण्वन्तः प्रीतिजननान् वल्गूंन् मदकलाञ्छुभान् ॥ ४२ ॥

श्रोत्ररम्यान् सुमधुराञ्छब्दान् खगमुखेरितान् ।
सर्वर्तुफलभाराढ्यान् सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान् ॥ ४३ ॥
पश्यन्तः पादपांश्चापि फलभारावनामितान् ।
आम्रानाम्रातकान् भव्यान् नारिकेलान् सतिन्दुकान् ॥ ४४ ॥
मुञ्जातकांस्तथाञ्जीरान् दाडिमान् बीजपूरकान् ।
पनसाँल्लकुचान् मोचान् खर्जूरानम्लवेतसान् ॥ ४५ ॥
पारावतांस्तथा क्षौद्रान् नीपांश्चापि मनोरमान् ।
बिल्वान् कपित्थाञ्जम्बूश्च काश्मरीर्बदरीस्तथा ॥ ४६ ॥
प्लक्षानुदुम्बरबटानश्वत्थान् क्षीरिकांस्तथा ।
भल्लातकानामलकीर्हरीतकबिभीतकान् ॥ ४७ ॥
इङ्गुदान् करमर्दांश्च तिन्दुकांश्च महाफलान् ।
एतानन्यांश्च विविधान् गन्धमादनसानुषु ॥ ४८ ॥
फलैरमृतकल्पैस्तानाचितान् स्वादुभिस्तरून् ।
तथैव चम्पकाशोकान् केतकान् बकुलांस्तथा ॥ ४९ ॥
पुन्नागान् सप्तपर्णांश्च कर्णिकारान् सकेतकान् ।
पाटलान् कुटजान् रम्यान् मन्दारेन्दीवरांस्तथा ॥ ५० ॥
पारिजातान् कोविदारान् देवदारुद्रुमांस्तथा ।
शालांस्तालांस्तमालांश्च पिप्पलान् हिङ्गुकांस्तथा ॥ ५१ ॥
शाल्मलीः किंशुकाशोकाञ्छिंशपाः सरलांस्तथा ।

उनके साथ द्रौपदी तथा पूर्वोक्त महामना ब्राह्मण भी थे। वे सब लोग विहंगोंके मुखसे निकले हुए अत्यन्त मधुर सुन्दर, श्रवण-सुखद मादक एवं मोदजनक शुभ शब्द सुनते हुए तथा सभी ऋतुओंके पुष्पों और फलोंसे सुशोभित एवं उनके भारसे झुके वृक्षोंको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। आम, आमड़ा, भव्य नारियल, तेंदू, मुंजातक, अंजीर, अनार, नीबू, कटहल, लकुच (बड़हर), मोच (केला), खजूर, अम्लवेंत, पारावत, क्षौद्र, सुन्दर कदम्ब, बेल, कैथ, जामुन, गम्भारी, बेर, पाकड़, गूलर, बरगद, पीपल, पिंड खजूर, भिलावा, आँवला, हर्रें, बहेड़ा, इंगुद, करौंदा तथा बड़े-बड़े फलवाले तिंदुक—ये और दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष गन्धमादनके शिखरोंपर लहलहा रहे थे, जो अमृतके समान स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए थे। (इन सबको देखते हुए पाण्डवलोग आगे बढ़ने लगे।) इसी प्रकार चम्पा, अशोक, केतकी, बकुल (मौलशिरी), पुन्नाग (सुल्ताना चंपा), सप्तपर्ण (छितवन), कनेर, केवड़ा, पाटल (पाड़रि या गुलाब), कुटज, सुन्दर मन्दार, इन्दीवर (नीलकमल), पारिजात, कोविदार, देवदारु, शाल, ताल, तमाल, पिप्पल, हिंगुक (हींगका वृक्ष), सेमल, पलाश, अशोक, शीशम तथा सरल आदि वृक्षोंको देखते हुए पाण्डवलोग अग्रसर हो रहे थे ॥ ४२—५२ ॥

चकोरैः शतपत्रैश्च भृङ्गराजैस्तथा शुकैः ॥ ५२ ॥ कोकिलैः कलविङ्कैश्च हारितैर्जीवजीवकैः । प्रियकैश्चातकैश्चैव तथान्यैर्विविधैः खगैः ॥ ५३ ॥ श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश्चात्यधिष्ठितान् । सरांसि च मनोज्ञानि समन्ताज्जलचारिभिः ॥ ५४ ॥ कुमुदैः पुण्डरीकैश्च तथा कोकनदोत्पलैः । कह्लारैः कमलैश्चैव आचितानि समन्ततः ॥ ५५ ॥ कादम्बैश्चक्रवाकैश्च कुररैर्जलकुक्कुटैः । कारण्डवैः प्लवैर्हंसैर्बकैर्मद्गुभिरेव च ॥ ५६ ॥ एतैश्चान्यैश्च कीर्णानि समन्ताज्जलचारिभिः । हृष्टैस्तथा तामरसरसासवमदालसैः ॥ ५७ ॥ इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया-चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मद्गु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे ॥ ५२—५७ ॥ पद्मोदरच्युतरजःकिंजल्कारुणरञ्जितैः । मञ्जुस्वरैर्मधुकरैर्विरुतान् कमलाकरान् ॥ ५८ ॥ कमलोंसे भरे हुए तालाबोंमें मीठे स्वरसे बोलनेवाले भ्रमरोंके शब्द गूँज रहे थे। वे भ्रमर कमलके भीतरसे निकली हुई रज तथा केसरोंसे लाल रंगमें रँगे-से जान पड़ते थे ॥ ५८ ॥ अपश्यंस्ते नरव्याघ्रा गन्धमादनसानुषु । तथैव पद्मषण्डैश्च मण्डितांश्च समन्ततः ॥ ५९ ॥ इस प्रकार वे नरश्रेष्ठ गन्धमादनके शिखरोंपर पद्मषण्डमण्डित तालाबोंको सब ओर देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ५९ ॥ शिखण्डिनीभिः सहिताँल्लतामण्डलकेषु च । मेघतूर्यरवोद्दाममदनाकुलितान् भृशम् ॥ ६० ॥ कृत्वैव केकामधुरं संगीतं मधुरस्वरम् । चित्रान् कलापान् विस्तीर्य सविलासान् मदालसान् ॥ ६१ ॥ मयूरान् ददृशुर्हृष्टान् नृत्यतो वनलालसान् । कांश्चित् प्रियाभिःसहितान् रममाणान् कलापिनः ॥ ६२ ॥ वल्लीलतासंकटेषु कुटजेषु स्थितांस्तथा ।

कांश्चिच्च कुटजानां तु विटपेषूत्कटानिव ॥ ६३ ॥

कलापरुचिराटोपनिचितान् मुकुटानिव ।

विवरेषु तरूणां च रुचिरान् ददृशुश्च ते ॥ ६४ ॥

वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी

मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर

केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें

फैलाकर विलास्युक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे

थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुञ्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी

मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा

अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर

मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा ॥ ६०-६४ ॥

सिन्धुवारांस्तथोदारान् मन्मथस्येव तोमरान् ।

सुवर्णवर्णकुसुमान् गिरीणां शिखरेषु च ॥ ६५ ॥

पर्वतोंके शिखरोंपर अधिकाधिक संख्यामें सुनहरे कुसुमोंसे सुशोभित सुन्दर

शेफालिकाके* 'पौधे दिखायी देते थे, जो कामदेवके तोमर नामक बाण-से प्रतीत होते

थे ॥ ६५ ॥

कर्णिकारान् विकसितान् कर्णपूरानिवोत्तमान् ।

तथापश्यन् कुरबकान् वनराजिषु पुष्पितान् ॥ ६६ ॥

कामवश्यौत्सुक्यकतन् कामस्येव शरोत्करान् ।

तथैव वनराजीनामुदारान् रचितानिव ॥ ६७ ॥

विराजमानांस्तेऽपश्यंस्तिलकांस्तिलकानिव ।

तथानङ्गशराकारान् सहकारान् मनोरमान् ॥ ६८ ॥

अपश्यन् भ्रमरारावान् मञ्जरीभिर्विराजितान् ।

हिरण्यसदृशैः पुष्पैर्दावाग्निसदृशैरपि ॥ ६९ ॥

लोहितैरञ्जनाभैश्च वैदूर्यसदृशैरपि ।

अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिताः शैलसानुषु ॥ ७० ॥

खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन-

श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको

उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें

तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान

शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो

कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौरोंकी भीड़ गूँजती

रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर

पुष्प खिले थे। कुछ वृक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ६६–७०॥ तथा शालांस्तमालांश्च पाटलान् बकुलानपि । माला इव समासक्ताः शैलानां शिखरेषु च ॥ ७१ ॥ इसी तरह शाल, तमाल, पाटल और बकुल आदि वृक्ष उन शैलशिखरोंपर धारण की हुई मालाकी भाँति शोभा पा रहे थे॥ ७१॥ विमलस्फटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः । कलहंसैरुपेतार्नि सारसाभिरुतानि च ॥ ७२ ॥ सरांसि बहुशः पार्थाः पश्यन्तः शैलसानुषु । पद्मोत्पलविमिश्राणि सुखशीतजलानि च ॥ ७३ ॥ पाण्डवोंने पर्वतीय शिखरोंपर बहुत-से ऐसे सरोवर देखे, जो निर्मल स्फटिकमणिके समान सुशोभित थे। उनमें सफेद पाँखोंवाले पक्षी कलहंस आदि विचरते तथा सारस कलरव करते थे। कमल और उत्पल-पुष्पोंसे संयुक्त उन सरोवरोंमें सुखद एवं शीतल जल भरा था॥ ७२-७३॥ एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणाः समन्ततः । गन्धवन्त्यथ माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ७४ ॥ सरांसि च मनोज्ञानि वृक्षांश्चातिमनोरमान् । विविशुः पाण्डवाः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ७५ ॥ इस प्रकार वे वीर पाण्डव चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, सरस फल, मनोहर सरोवर और मनोरम वृक्षावलियोंको क्रमशः देखते हुए गन्धमादन पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ पहुँचनेपर उन सबकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं॥ ७४-७५॥ कमलोत्पलकह्लारपुण्डरीकसुगन्धिना । सेव्यमाना वने तस्मिन् सुखस्पर्शेन वायुना ॥ ७६ ॥ उस समय कमल, उत्पल, कह्लार और पुण्डरीककी सुन्दर गन्ध लिये मन्द मधुर वायु उस वनमें मानो उन्हें व्यजन डुलाती थी॥ ७६॥ ततो युधिष्ठिरो भीममाहेदं प्रीतिमद् वचः । अहो श्रीमदिदं भीम गन्धमादनकाननम् ॥ ७७ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने भीमसेनसे प्रसन्नतापूर्ण यह बात कही—'भीम! यह गन्धमादन-कानन कितना सुन्दर और कैसा अद्भुत है?॥ ७७॥ वने ह्यस्मिन् मनोरम्ये दिव्याः काननजा द्रुमाः । लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥ ७८ ॥

‘इस मनोरम वनके वृक्ष और नाना प्रकारकी लताएँ दिव्य हैं। इन सबमें पत्र, पुष्प और फलोंकी बहुतायत है ।। ७८ ।। भान्त्येते पुष्पविकचाः पुंस्कोकिलकुलाकुलाः । नात्र कण्टकिनः केचिन्न च विद्यन्त्यपुष्पिताः ।। ७९ ।। ‘ये सभी वृक्ष फूलोंसे लदे हैं। कोकिल-कुलसे अलंकृत हैं। इस वनमें कोई भी वृक्ष ऐसे नहीं हैं, जिनमें काँटे हों और जो खिले न हों ।। ७९ ।। स्निग्धपत्रफला वृक्षा गन्धमादनसानुषु । भ्रमरारावमधुरा नलिनीः फुल्लपङ्कजाः ।। ८० ।। गन्धमादनके शिखरोंपर जितने वृक्ष हैं, उन सबके पत्र और फल चिकने हैं। सभी भ्रमरोंके मधुर गुंजारवसे मनोहर जान पड़ते हैं। यहाँके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं ।। ८० ।। विलोद्यमानाः पश्येमाः करिभिः सकरेणुभिः । पश्येमां नलिनीं चान्यां कमलोत्पलमालिनीम् ।। ८१ ।। स्रग्धरां विग्रहवतीं साक्षाच्छ्रियमिवापराम् । नानाकुसुमगन्धाढ्यास्तस्येमाः काननोत्तमे ।। ८२ ।। उपगीयमाना भ्रमरै राजन्ते वनराजयः । पश्य भीम शुभान् देशान् देवाक्रीडान् समन्ततः ।। ८३ ।। ‘देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है। यह कमलमालाधारिणी साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है। गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी-छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है ।। ८१—८३ ।। अमानुषगतिं प्राप्ताः संसिद्धाः स्म वृकोदर । लताभिः पुष्पिताग्राभिः पुष्पिताः पादपोत्तमाः ।। ८४ ।। संश्लिष्टाः पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु । ‘वृकोदर! हमलोग ऐसे स्थानपर आ गये हैं, जो मानवोंके लिये अगम्य है। जान पड़ता है हम सिद्ध हो गये हैं। कुन्तीनन्दन! गन्धमादनके शिखरोंपर ये फूलोंसे भरे हुए उत्तम वृक्ष इन पुष्पित लताओंसे अलंकृत होकर कैसी शोभा पा रहे हैं? ।। ८४ ½ ।। शिखण्डिनीभिश्चरतां सहितानां शिखण्डिनाम् ।। ८५ ।। नदतां शृणु निर्घोषं भीम पर्वतसानुषु । ‘भीम! इन पर्वतशिखरोंपर मोरिनियोंके साथ विचरते बोलते हुए मोरोंका यह मधुर केकारव तो सुनो ।। ८५ ½ ।।

चकोराः शतपत्रांश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ८६ ॥ पत्रिणः पुष्पितानेतान् संपतन्ति महाद्रुमान् । ‘ये चकोर, शतपत्र, मदोन्मत्त कोकिल और सारिका आदि पक्षी इन पुष्पमण्डित विशाल वृक्षोंकी ओर कैसे उड़े जा रहे हैं? ॥ ८६१/२ ॥ रक्तपीतारुणाः पार्थ पादपाग्रगताः खगाः ॥ ८७ ॥ परस्परमुदीक्षन्ते बहवो जीवजीवकाः । ‘पार्थ! वृक्षोंकी ऊँची शिखाओंपर बैठे हुए लाल, गुलाबी और पीले रंगके चकोर पक्षी एक-दूसरेकी ओर देख रहे हैं ॥ ८७१/२ ॥ हरितारुणवर्णानां शाद्वलानां समीपतः ॥ ८८ ॥ सारसाः प्रतिदृश्यन्ते शैलप्रस्रवणेष्वपि । उधर हरी और लाल घासोंके समीप पर्वतीय झरनोंके पास सारस दिखायी देते हैं ॥ ८८१/२ ॥ वदन्ति मधुरा वाचः सर्वभूतमनोरमाः ॥ ८९ ॥ भृङ्गराजोपचक्रांश्च लोहपृष्ठाः पतत्त्रिणः । ‘भृंगराज, उपचक्र (चक्रवाक) और लोहपृष्ठ (कंक) नामक पक्षी ऐसी मीठी बोली बोलते हैं, जो समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेती है ॥ ८९१/२ ॥ चतुर्विषाणाः पद्माभाः कुञ्जराः सकरेणवः ॥ ९० ॥ एते वैदूर्यवर्णाभं क्षोभयन्ति महत् सरः । ‘इधर देखो, ये कमलके समान कान्तिवाले गजराज, जिनके चार दाँत शोभा पा रहे हैं, हथिनियोंके साथ आकर वैदूर्यमणिके समान सुशोभित इस महान् सरोवरको मथे डालते हैं ॥ ९०१/२ ॥ बहुतालसमुत्सेधाः शैलशृङ्गपरिच्युताः ॥ ९१ ॥ नानाप्रस्रवणेभ्यश्च वारिधाराः पतन्ति च । ‘अनेक झरनोंसे जलकी धाराएँ गिर रही हैं। जिनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर है और ये पर्वतके सर्वोच्च शिखरसे नीचे गिरती हैं ॥ ९११/२ ॥ भास्कराभाः प्रभाभिश्च शारदाभ्रघनोपमाः ॥ ९२ ॥ शोभयन्ति महाशैलं नानारजतधातवः । क्वचिदञ्जनवर्णाभाः क्वचित् काञ्चनसन्निभाः ॥ ९३ ॥ ‘नाना प्रकारके रजतमय धातु इस महान् पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमेंसे कुछ तो अपनी प्रभाओंसे भगवान् भास्करके समान प्रकाशित होते हैं और कुछ शरद्-ऋतुके श्वेत बादलोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। कहीं काजलके समान काले और सुवर्णके समान पीले रंगके धातु दीख पड़ते हैं ॥ ९२-९३ ॥

धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिङ्गुलकस्य च । मनःशिलागुहाश्चैव सन्ध्याभ्रनिकरोपमाः ॥ ९४ ॥ ‘कहीं हरितालसम्बन्धी धातु हैं और कहीं हिंगुलसम्बन्धी। कहीं मैनसिलकी गुफाएँ हैं, जो संध्याकालीन लाल बादलोंके समान जान पड़ती हैं ॥ ९४ ॥ शशलोहितवर्णाभाः क्वचिद्गैरिकधातवः । सितासिताभ्रप्रतिमा बालसूर्यसमप्रभाः ॥ ९५ ॥ ‘कहीं गेरु नामक धातु हैं, जिनकी कान्ति लाल खरगोशके समान दिखायी देती है। कोई धातु श्वेत बादलोंके समान हैं, तो कोई काले मेघोंके समान। कोई प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके हैं ॥ ९५ ॥ एते बहुविधाः शैलं शोभयन्ति महाप्रभाः । गन्धर्वाः सह कान्ताभिर्यथोक्तं वृषपर्वणा ॥ ९६ ॥ दृश्यन्ते शैलशृङ्गेषु पार्थ किम्पुरुषैः सह । ‘ये नाना प्रकारकी परम कान्तिमान् धातु समूचे शैलकी शोभा बढ़ाती हैं। पार्थ! जिस प्रकार वृषपर्वाने कहा था उसी प्रकार इन पर्वतीय शिखरोंपर अपनी प्रेयसी अप्सराओं तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धर्व दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ९६ १/२ ॥ गीतानां समतालानां तथा साम्नां च निःस्वनः ॥ ९७ ॥ श्रूयते बहुधा भीम सर्वभूतमनोहरः । महागङ्गामुदीक्षस्व पुण्यां देवनदीं शुभाम् ॥ ९८ ॥ ‘भीमसेन! यहाँ सम तालसे गाते हुए गीतों तथा साममन्त्रोंका विविध स्वर सुनायी पड़ता है, जो सम्पूर्ण भूतोंके चित्तको आकर्षित करनेवाला है। यह परम पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी महागंगा हैं, इनका दर्शन करो ॥ कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिन्नरसेविताम् । धातुभिश्च सरिद्भिश्च किन्नरैर्मृगपक्षिभिः ॥ ९९ ॥ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च काननैश्च मनोरमैः । व्यालैश्च विविधाकारैः शतशीर्षैः समन्ततः ॥ १०० ॥ उपेतं पश्य कौन्तेय शैलराजमरिन्दम । ‘यहाँ हंसोंके समुदाय निवास करते हैं तथा ऋषि एवं किन्नरगण सदा इन (गंगाजी)-का सेवन करते हैं। शत्रुदमन भीम! भाँति-भाँतिके धातुओं, नदियों, किन्नरों, मृगों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मनोरम काननों तथा सौ मस्तकवाले भाँति-भाँतिके सर्पोंसे सम्पन्न इस पर्वतराजका दर्शन करो’ ॥ ९९-१०० १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते प्रीतमनसः शूराः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ १०१ ॥