भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1075

चकोराः शतपत्रांश्च मत्तकोकिलसारिकाः ॥ ८६ ॥ पत्रिणः पुष्पितानेतान् संपतन्ति महाद्रुमान् । ‘ये चकोर, शतपत्र, मदोन्मत्त कोकिल और सारिका आदि पक्षी इन पुष्पमण्डित विशाल वृक्षोंकी ओर कैसे उड़े जा रहे हैं? ॥ ८६१/२ ॥ रक्तपीतारुणाः पार्थ पादपाग्रगताः खगाः ॥ ८७ ॥ परस्परमुदीक्षन्ते बहवो जीवजीवकाः । ‘पार्थ! वृक्षोंकी ऊँची शिखाओंपर बैठे हुए लाल, गुलाबी और पीले रंगके चकोर पक्षी एक-दूसरेकी ओर देख रहे हैं ॥ ८७१/२ ॥ हरितारुणवर्णानां शाद्वलानां समीपतः ॥ ८८ ॥ सारसाः प्रतिदृश्यन्ते शैलप्रस्रवणेष्वपि । उधर हरी और लाल घासोंके समीप पर्वतीय झरनोंके पास सारस दिखायी देते हैं ॥ ८८१/२ ॥ वदन्ति मधुरा वाचः सर्वभूतमनोरमाः ॥ ८९ ॥ भृङ्गराजोपचक्रांश्च लोहपृष्ठाः पतत्त्रिणः । ‘भृंगराज, उपचक्र (चक्रवाक) और लोहपृष्ठ (कंक) नामक पक्षी ऐसी मीठी बोली बोलते हैं, जो समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेती है ॥ ८९१/२ ॥ चतुर्विषाणाः पद्माभाः कुञ्जराः सकरेणवः ॥ ९० ॥ एते वैदूर्यवर्णाभं क्षोभयन्ति महत् सरः । ‘इधर देखो, ये कमलके समान कान्तिवाले गजराज, जिनके चार दाँत शोभा पा रहे हैं, हथिनियोंके साथ आकर वैदूर्यमणिके समान सुशोभित इस महान् सरोवरको मथे डालते हैं ॥ ९०१/२ ॥ बहुतालसमुत्सेधाः शैलशृङ्गपरिच्युताः ॥ ९१ ॥ नानाप्रस्रवणेभ्यश्च वारिधाराः पतन्ति च । ‘अनेक झरनोंसे जलकी धाराएँ गिर रही हैं। जिनकी ऊँचाई कई ताड़के बराबर है और ये पर्वतके सर्वोच्च शिखरसे नीचे गिरती हैं ॥ ९११/२ ॥ भास्कराभाः प्रभाभिश्च शारदाभ्रघनोपमाः ॥ ९२ ॥ शोभयन्ति महाशैलं नानारजतधातवः । क्वचिदञ्जनवर्णाभाः क्वचित् काञ्चनसन्निभाः ॥ ९३ ॥ ‘नाना प्रकारके रजतमय धातु इस महान् पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमेंसे कुछ तो अपनी प्रभाओंसे भगवान् भास्करके समान प्रकाशित होते हैं और कुछ शरद्-ऋतुके श्वेत बादलोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। कहीं काजलके समान काले और सुवर्णके समान पीले रंगके धातु दीख पड़ते हैं ॥ ९२-९३ ॥