महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1074, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इस मनोरम वनके वृक्ष और नाना प्रकारकी लताएँ दिव्य हैं। इन सबमें पत्र, पुष्प और फलोंकी बहुतायत है ।। ७८ ।। भान्त्येते पुष्पविकचाः पुंस्कोकिलकुलाकुलाः । नात्र कण्टकिनः केचिन्न च विद्यन्त्यपुष्पिताः ।। ७९ ।। ‘ये सभी वृक्ष फूलोंसे लदे हैं। कोकिल-कुलसे अलंकृत हैं। इस वनमें कोई भी वृक्ष ऐसे नहीं हैं, जिनमें काँटे हों और जो खिले न हों ।। ७९ ।। स्निग्धपत्रफला वृक्षा गन्धमादनसानुषु । भ्रमरारावमधुरा नलिनीः फुल्लपङ्कजाः ।। ८० ।। गन्धमादनके शिखरोंपर जितने वृक्ष हैं, उन सबके पत्र और फल चिकने हैं। सभी भ्रमरोंके मधुर गुंजारवसे मनोहर जान पड़ते हैं। यहाँके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं ।। ८० ।। विलोद्यमानाः पश्येमाः करिभिः सकरेणुभिः । पश्येमां नलिनीं चान्यां कमलोत्पलमालिनीम् ।। ८१ ।। स्रग्धरां विग्रहवतीं साक्षाच्छ्रियमिवापराम् । नानाकुसुमगन्धाढ्यास्तस्येमाः काननोत्तमे ।। ८२ ।। उपगीयमाना भ्रमरै राजन्ते वनराजयः । पश्य भीम शुभान् देशान् देवाक्रीडान् समन्ततः ।। ८३ ।। ‘देखो, हथिनियोंसहित हाथी इन तालाबोंमें घुसकर इन्हें मथे डालते हैं और इस दूसरी पुष्करिणीपर दृष्टिपात करो, जो कमल और उत्पलकी मालाओंसे अलंकृत है। यह कमलमालाधारिणी साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान मानो साकार विग्रह धारण करके प्रकट हुई है। गन्धमादनके इस उत्तम वनमें नाना प्रकारके कुसुमोंकी सुगन्धसे सुवासित ये छोटी-छोटी वनश्रेणियाँ भ्रमरोंके गीतोंसे मुखरित हो कैसी शोभा पा रही हैं? भीमसेन! देखो, यहाँके सुन्दर प्रदेशोंमें चारों ओर देवताओंकी क्रीडास्थली है ।। ८१—८३ ।। अमानुषगतिं प्राप्ताः संसिद्धाः स्म वृकोदर । लताभिः पुष्पिताग्राभिः पुष्पिताः पादपोत्तमाः ।। ८४ ।। संश्लिष्टाः पार्थ शोभन्ते गन्धमादनसानुषु । ‘वृकोदर! हमलोग ऐसे स्थानपर आ गये हैं, जो मानवोंके लिये अगम्य है। जान पड़ता है हम सिद्ध हो गये हैं। कुन्तीनन्दन! गन्धमादनके शिखरोंपर ये फूलोंसे भरे हुए उत्तम वृक्ष इन पुष्पित लताओंसे अलंकृत होकर कैसी शोभा पा रहे हैं? ।। ८४ ½ ।। शिखण्डिनीभिश्चरतां सहितानां शिखण्डिनाम् ।। ८५ ।। नदतां शृणु निर्घोषं भीम पर्वतसानुषु । ‘भीम! इन पर्वतशिखरोंपर मोरिनियोंके साथ विचरते बोलते हुए मोरोंका यह मधुर केकारव तो सुनो ।। ८५ ½ ।।