भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1073

पुष्प खिले थे। कुछ वृक्षोंके पुष्प देखनेमें दावानलका भ्रम उत्पन्न करते थे। किन्हीं वृक्षोंके फूल लाल, काले तथा वैदूर्यमणिके सदृश धूमिल थे। इस प्रकार पर्वतीय शिखरोंपर विभिन्न प्रकारके पुष्पोंसे विभूषित वृक्ष बड़ी शोभा पा रहे थे॥ ६६–७०॥ तथा शालांस्तमालांश्च पाटलान् बकुलानपि । माला इव समासक्ताः शैलानां शिखरेषु च ॥ ७१ ॥ इसी तरह शाल, तमाल, पाटल और बकुल आदि वृक्ष उन शैलशिखरोंपर धारण की हुई मालाकी भाँति शोभा पा रहे थे॥ ७१॥ विमलस्फटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः । कलहंसैरुपेतार्नि सारसाभिरुतानि च ॥ ७२ ॥ सरांसि बहुशः पार्थाः पश्यन्तः शैलसानुषु । पद्मोत्पलविमिश्राणि सुखशीतजलानि च ॥ ७३ ॥ पाण्डवोंने पर्वतीय शिखरोंपर बहुत-से ऐसे सरोवर देखे, जो निर्मल स्फटिकमणिके समान सुशोभित थे। उनमें सफेद पाँखोंवाले पक्षी कलहंस आदि विचरते तथा सारस कलरव करते थे। कमल और उत्पल-पुष्पोंसे संयुक्त उन सरोवरोंमें सुखद एवं शीतल जल भरा था॥ ७२-७३॥ एवं क्रमेण ते वीरा वीक्षमाणाः समन्ततः । गन्धवन्त्यथ माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ७४ ॥ सरांसि च मनोज्ञानि वृक्षांश्चातिमनोरमान् । विविशुः पाण्डवाः सर्वे विस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥ ७५ ॥ इस प्रकार वे वीर पाण्डव चारों ओर सुगन्धित पुष्पमालाएँ, सरस फल, मनोहर सरोवर और मनोरम वृक्षावलियोंको क्रमशः देखते हुए गन्धमादन पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुए। वहाँ पहुँचनेपर उन सबकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं॥ ७४-७५॥ कमलोत्पलकह्लारपुण्डरीकसुगन्धिना । सेव्यमाना वने तस्मिन् सुखस्पर्शेन वायुना ॥ ७६ ॥ उस समय कमल, उत्पल, कह्लार और पुण्डरीककी सुन्दर गन्ध लिये मन्द मधुर वायु उस वनमें मानो उन्हें व्यजन डुलाती थी॥ ७६॥ ततो युधिष्ठिरो भीममाहेदं प्रीतिमद् वचः । अहो श्रीमदिदं भीम गन्धमादनकाननम् ॥ ७७ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने भीमसेनसे प्रसन्नतापूर्ण यह बात कही—'भीम! यह गन्धमादन-कानन कितना सुन्दर और कैसा अद्भुत है?॥ ७७॥ वने ह्यस्मिन् मनोरम्ये दिव्याः काननजा द्रुमाः । लताश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलोपगाः ॥ ७८ ॥