भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1072

कांश्चिच्च कुटजानां तु विटपेषूत्कटानिव ॥ ६३ ॥

कलापरुचिराटोपनिचितान् मुकुटानिव ।

विवरेषु तरूणां च रुचिरान् ददृशुश्च ते ॥ ६४ ॥

वहाँ लता-मण्डपोंमें मोरिनियोंके साथ नाचते हुए मोर दिखायी देते थे। जो मेघोंकी

मृदंगतुल्य गम्भीर गर्जना सुनकर उद्दाम कामसे अत्यन्त उन्मत्त हो रहे थे। वे अपनी मधुर

केकाध्वनिका विस्तार करके मीठे स्वरमें संगीतकी रचना करते थे और अपनी विचित्र पाँखें

फैलाकर विलास्युक्त मदालसभावसे वनविहारके लिये उत्सुक हो प्रसन्नताके साथ नाच रहे

थे। कुछ मोर लतावल्लरियोंसे व्याप्त कुटजवृक्षोंके कुञ्जोंमें स्थित हो अपनी प्यारी

मोरिनियोंके साथ रमण करते थे और कुछ कुटजोंकी डालियोंपर मदमत्त होकर बैठे थे तथा

अपनी सुन्दर पाँखोंके घटाटोपसे युक्त हो मुकुटके समान जान पड़ते थे। कितने ही सुन्दर

मोर वृक्षोंके कोटरोंमें बैठे थे। पाण्डवोंने उन सबको देखा ॥ ६०-६४ ॥

सिन्धुवारांस्तथोदारान् मन्मथस्येव तोमरान् ।

सुवर्णवर्णकुसुमान् गिरीणां शिखरेषु च ॥ ६५ ॥

पर्वतोंके शिखरोंपर अधिकाधिक संख्यामें सुनहरे कुसुमोंसे सुशोभित सुन्दर

शेफालिकाके* 'पौधे दिखायी देते थे, जो कामदेवके तोमर नामक बाण-से प्रतीत होते

थे ॥ ६५ ॥

कर्णिकारान् विकसितान् कर्णपूरानिवोत्तमान् ।

तथापश्यन् कुरबकान् वनराजिषु पुष्पितान् ॥ ६६ ॥

कामवश्यौत्सुक्यकतन् कामस्येव शरोत्करान् ।

तथैव वनराजीनामुदारान् रचितानिव ॥ ६७ ॥

विराजमानांस्तेऽपश्यंस्तिलकांस्तिलकानिव ।

तथानङ्गशराकारान् सहकारान् मनोरमान् ॥ ६८ ॥

अपश्यन् भ्रमरारावान् मञ्जरीभिर्विराजितान् ।

हिरण्यसदृशैः पुष्पैर्दावाग्निसदृशैरपि ॥ ६९ ॥

लोहितैरञ्जनाभैश्च वैदूर्यसदृशैरपि ।

अतीव वृक्षा राजन्ते पुष्पिताः शैलसानुषु ॥ ७० ॥

खिले हुए कनेरके फूल उत्तम कर्णपूरके समान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वन-

श्रेणियोंमें विकसित कुरबक नामक वृक्ष भी उन्होंने देखे, जो कामासक्त पुरुषोंको

उत्कण्ठित करनेवाले कामदेवके बाणसमूहोंके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार उन्हें

तिलकके वृक्ष दृष्टिगोचर हुए, जो वनश्रेणियोंके ललाटमें रचित सुन्दर तिलकके समान

शोभा पा रहे थे। कहीं मनोहर मंजरियोंसे विभूषित मनोरम आम्रवृक्ष दीख पड़ते थे, जो

कामदेवके बाणोंकी-सी आकृति धारण करते थे। उनकी डालियोंपर भौरोंकी भीड़ गूँजती

रहती थी। उन पर्वतोंके शिखरोंपर कितने ही ऐसे वृक्ष थे, जिनमें सुवर्णके समान सुन्दर