भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1076

धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिङ्गुलकस्य च । मनःशिलागुहाश्चैव सन्ध्याभ्रनिकरोपमाः ॥ ९४ ॥ ‘कहीं हरितालसम्बन्धी धातु हैं और कहीं हिंगुलसम्बन्धी। कहीं मैनसिलकी गुफाएँ हैं, जो संध्याकालीन लाल बादलोंके समान जान पड़ती हैं ॥ ९४ ॥ शशलोहितवर्णाभाः क्वचिद्गैरिकधातवः । सितासिताभ्रप्रतिमा बालसूर्यसमप्रभाः ॥ ९५ ॥ ‘कहीं गेरु नामक धातु हैं, जिनकी कान्ति लाल खरगोशके समान दिखायी देती है। कोई धातु श्वेत बादलोंके समान हैं, तो कोई काले मेघोंके समान। कोई प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके हैं ॥ ९५ ॥ एते बहुविधाः शैलं शोभयन्ति महाप्रभाः । गन्धर्वाः सह कान्ताभिर्यथोक्तं वृषपर्वणा ॥ ९६ ॥ दृश्यन्ते शैलशृङ्गेषु पार्थ किम्पुरुषैः सह । ‘ये नाना प्रकारकी परम कान्तिमान् धातु समूचे शैलकी शोभा बढ़ाती हैं। पार्थ! जिस प्रकार वृषपर्वाने कहा था उसी प्रकार इन पर्वतीय शिखरोंपर अपनी प्रेयसी अप्सराओं तथा किम्पुरुषोंके साथ गन्धर्व दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ९६ १/२ ॥ गीतानां समतालानां तथा साम्नां च निःस्वनः ॥ ९७ ॥ श्रूयते बहुधा भीम सर्वभूतमनोहरः । महागङ्गामुदीक्षस्व पुण्यां देवनदीं शुभाम् ॥ ९८ ॥ ‘भीमसेन! यहाँ सम तालसे गाते हुए गीतों तथा साममन्त्रोंका विविध स्वर सुनायी पड़ता है, जो सम्पूर्ण भूतोंके चित्तको आकर्षित करनेवाला है। यह परम पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी महागंगा हैं, इनका दर्शन करो ॥ कलहंसगणैर्जुष्टामृषिकिन्नरसेविताम् । धातुभिश्च सरिद्भिश्च किन्नरैर्मृगपक्षिभिः ॥ ९९ ॥ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च काननैश्च मनोरमैः । व्यालैश्च विविधाकारैः शतशीर्षैः समन्ततः ॥ १०० ॥ उपेतं पश्य कौन्तेय शैलराजमरिन्दम । ‘यहाँ हंसोंके समुदाय निवास करते हैं तथा ऋषि एवं किन्नरगण सदा इन (गंगाजी)-का सेवन करते हैं। शत्रुदमन भीम! भाँति-भाँतिके धातुओं, नदियों, किन्नरों, मृगों, पक्षियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मनोरम काननों तथा सौ मस्तकवाले भाँति-भाँतिके सर्पोंसे सम्पन्न इस पर्वतराजका दर्शन करो’ ॥ ९९-१०० १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते प्रीतमनसः शूराः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ १०१ ॥