भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1077, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1077

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**इस प्रकार वे शूरवीर पाण्डव हर्षपूर्ण हृदयसे अपने परम उत्तम लक्ष्य स्थानको पहुँच गये ॥ १०१ ॥ नातृप्यन् पर्वतेन्द्रस्य दर्शनेन परन्तपाः । उपेतमथ माल्यैश्च फलवद्भिश्च पादपैः ॥ १०२ ॥ आष्टिषेणस्य राजर्षेराश्रमं ददृशुस्तदा । गिरिराज गन्धमादनका दर्शन करनेसे उन्हें तृप्ति नहीं होती थी। तदनन्तर परंतप पाण्डवोंने पुष्पमालाओं तथा फलवान् वृक्षोंसे सम्पन्न राजर्षि आष्टिषेणका आश्रम देखा ॥ १०२ १/२ ॥ ततस्ते तिग्मतपसं कृशं धमनिसंततम् । पारगं सर्वधर्माणामार्ष्टिषेणमुपागमन् ॥ १०३ ॥ फिर वे कठोर तपस्वी दुर्बलकाय तथा नस-नाड़ियोंसे ही व्याप्त राजर्षि आष्टिषेणके समीप गये, जो सम्पूर्ण धर्मोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते आरण्यके पर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि गन्धमादनप्रवेशे अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५८ ॥


* सिन्धुवार शब्दका अर्थ आचार्य नीलकण्ठने कमल माना है। आधुनिक कोषकारोंने ‘सिन्धुवार'को शेफालिका या निर्गुण्डीका पर्याय माना है। उसके फूल मंजरीके आकारमें केसरिया रंगके होते हैं, अतः तोमरसे उनकी उपमा ठीक बैठती है। इसीलिये यहाँ शेफालिका अर्थ लिया गया।

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