भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्तमासाद्य तपसा दग्धकिल्बिषम् ।
अभ्यवादयत प्रीतः शिरसा नाम कीर्तयन् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजर्षि आर्ष्टिषेणने तपस्याद्वारा अपने सारे पाप दग्ध कर दिये थे। राजा युधिष्ठिरने उनके पास जाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपना नाम बताते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया ।। १ ।।

ततः कृष्णा च भीमश्च यमौ च सुतपस्विनौ ।
शिरोभिः प्राप्य राजर्षिं परिवार्योपतस्थिरे ।। २ ।।
तदनन्तर द्रौपदी, भीमसेन और परम तपस्वी नकुल-सहदेव—ये सभी मस्तक झुकाकर उन राजर्षिको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।। २ ।।

तथैव धौम्यो धर्मज्ञः पाण्डवानां पुरोहितः ।
यथान्यायमुपाक्रान्तस्तमृषिं संशितव्रतम् ।। ३ ।।
उसी प्रकार पाण्डवोंके पुरोहित धर्मज्ञ धौम्यजी कठोर व्रतका पालन करनेवाले राजर्षि आर्ष्टिषेणके पास यथोचित शिष्टाचारके साथ उपस्थित हुए ।। ३ ।।

अन्वजानात् स धर्मज्ञो मुनिर्दिव्येन चक्षुषा ।
पाण्डोः पुत्रान् कुरुश्रेष्ठानास्यतामिति चाब्रवीत् ।। ४ ।।
उन धर्मज्ञ मुनि आर्ष्टिषेणने अपनी दिव्यदृष्टिसे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको जान लिया और कहा, 'आप सब लोग बैठें' ।। ४ ।।

कुरूणामृषभं पार्थं पूजयित्वा महातपाः ।
सह भ्रातृभिरासीनं पर्यपृच्छदनामयम् ।। ५ ।।
महातपस्वी आर्ष्टिषेणने भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरका यथोचित आदर-सत्कार किया और जब वे बैठ गये, तब उनसे कुशल-समाचार पूछा— ।। ५ ।।

नानृते कुरुषे भावं कच्चिद् धर्मे प्रवर्तसे ।
मातापित्रोश्च ते वृत्तिः कच्चित् पार्थ न सीदति ।। ६ ।।
'कुन्तीनन्दन! कभी झूठकी ओर तो तुम्हारा मन नहीं जाता? तुम धर्ममें लगे रहते हो न? माता-पिताके प्रति जो तुम्हारी सेवावृत्ति होनी चाहिये, वह है न? उसमें शिथिलता तो नहीं आयी है? ।। ६ ।।

कच्चित् ते गुरवः सर्वे वृद्धा वैद्याश्च पूजिताः ।
कच्चिन्न कुरुषे भावं पार्थ पापेषु कर्मसु ।। ७ ।।