महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1079, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘क्या तुमने समस्त गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों और विद्वानोंका सदा समादर किया है? पार्थ! कभी पापकर्मोंमें तो तुम्हारी रुचि नहीं होती? ॥ ७ ॥ सुकृतं प्रतिकर्तुं च कच्चिद्धातुं च दुष्कृतम्। यथान्यायं कुरुश्रेष्ठ जानासि न विकत्थसे ॥ ८ ॥ ‘कुरुश्रेष्ठ! क्या तुम अपने उपकारीको उसके उपकारका यथोचित बदला देना जानते हो? क्या तुम्हें अपना अपकार करनेवाले मनुष्यकी उपेक्षा कर देनेकी कला का ज्ञान है? तुम अपनी बड़ाई तो नहीं करते? ॥ ८ ॥ यथार्हं मानिताः कच्चित् त्वया नन्दन्ति साधवः। वनेष्वपि वसन् कच्चिद् धर्ममेवानुवर्तसे ॥ ९ ॥ ‘क्या तुमसे यथायोग्य सम्मानित होकर साधु पुरुष तुमपर प्रसन्न रहते हैं? क्या तुम वनमें रहते हुए भी सदा धर्मका ही अनुसरण करते हो? ॥ ९ ॥ कच्चिद् धौम्यस्त्वदाचारैर्न पार्थ परितप्यते। दानधर्मतपःशौचैरार्जवेन तितिक्षया ॥ १० ॥ पितृपैतामहं वृत्तं कच्चित् पार्थानुवर्तसे। कच्चिद् राजर्षियातेन पथा गच्छसि पाण्डव ॥ ११ ॥ ‘पार्थ! तुम्हारे आचार-व्यवहारसे पुरोहित धौम्यजीको क्लेश तो नहीं पहुँचता है? कुन्तीनन्दन! क्या तुम दान, धर्म, तप, शौच, सरलता और क्षमा आदिके द्वारा अपने बाप-दादोंके आचार-व्यवहारका अनुसरण करते हो? पाण्डुनन्दन! प्राचीन राजर्षि जिस मार्गसे गये हैं, उसीपर तुम भी चलते हो न? ॥ १०-११ ॥ स्वे स्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुनः। पितरः पितृलोकस्थाः शोचन्ति च हसन्ति च ॥ १२ ॥ किं तस्य दुष्कृतेऽस्माभिः सम्प्राप्तव्यं भविष्यति। किं चास्य सुकृतेऽस्माभिः प्राप्तव्यमिति शोभनम् ॥ १३ ॥ ‘कहते हैं, जब-जब अपने-अपने कुलमें पुत्र अथवा नातीका जन्म होता है, तब-तब पितृलोकमें रहनेवाले पितर शोकमग्न होते हैं और हँसते भी हैं। शोक तो उन्हें यह सोचकर होता है कि ‘क्या हमें इसके पापमें हिस्सा बँटाना पड़ेगा?’ और हँसते इसलिये हैं कि ‘क्या हमें इसके पुण्यका कुछ भाग मिलेगा? यदि ऐसा हो तो बड़ी अच्छी बात है’ ॥ १२-१३ ॥ पिता माता तथैवाग्निर्गुरुरात्मा च पञ्चमः। यस्यैते पूजिताः पार्थ तस्या लोकावुभौ जितौ ॥ १४ ॥ ‘पार्थ! जिसके द्वारा पिता, माता, अग्नि, गुरु और आत्मा—इन पाँचोंका आदर होता है, वह यह लोक और परलोक दोनोंको जीत लेता है’ ॥ १४ ॥
युधिष्ठिर उवाच