भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1080

भगवन्नार्य माहैतद् यथावद् धर्मनिश्चयम् । यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते विधिवन्मया ॥ १५ ॥ युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आर्यचरण! आपने मुझे यह धर्मका निचोड़ बताया है। मैं अपनी शक्तिके अनुसार यथोचित रीतिसे विधिपूर्वक इसका पालन करता हूँ ॥ १५ ॥

आर्ष्टिषेण उवाच

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च प्लवमाना विहायसा । जुषन्ते पर्वतश्रेष्ठमृषयः पर्वसंधिषु ॥ १६ ॥ आर्ष्टिषेण बोले— पार्थ! पर्वोंकी संधिवेलामें (पूर्णिमा तथा प्रतिपदाकी संधिमें) बहुत-से ऋषिगण आकाशमार्गसे उड़ते हुए आते हैं और इस श्रेष्ठ पर्वतका सेवन करते हैं। उनमेंसे कितने तो केवल जल पीकर जीवन-निर्वाह करते हैं और कितने केवल वायु पीकर रहते हैं ॥ १६ ॥

कामिनः सह कान्ताभिः परस्परमनुव्रताः । दृश्यन्ते शैलशृङ्गस्था यथा किम्पुरुषा नृप ॥ १७ ॥ राजन्! कितने ही किम्पुरुष-जातिके कामी अपनी कामिनियोंके साथ परस्पर अनुरक्तभावसे यहाँ क्रीडाके लिये आते हैं और पर्वतके शिखरोंपर घूमते दिखायी देते हैं ॥ १७ ॥

अरजांसि च वासांसि वसानाः कौशिकानि च । दृश्यन्ते बहवः पार्थ गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ १८ ॥ कुन्तीकुमार! गन्धर्वों और अप्सराओंके बहुत-से गण यहाँ देखनेमें आते हैं, उनमेंसे कितने ही स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और कितने ही रेशमी वस्त्रोंसे सुशोभित होते हैं ॥ १८ ॥

विद्याधरगणाश्चैव स्रग्विणः प्रियदर्शनाः । महोरगगणांश्चैव सुपर्णांश्चोरगादयः ॥ १९ ॥ विद्याधरोंके गण भी सुन्दर फूलोंके हार पहने अत्यन्त मनोहर दिखायी देते हैं। इनके सिवा बड़े-बड़े नागगण, सुपर्णजातीय पक्षी तथा सर्प आदि भी दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १९ ॥

अस्य चोपरि शैलस्य श्रूयते पर्वसंधिषु । भेरीपणवशङ्खानां मृदङ्गानां च निःस्वनः ॥ २० ॥ पर्वोंकी संधि-वेलामें इस पर्वतके ऊपर भेरी, पणव, शंख और मृदंगोंकी ध्वनि सुनायी देती है ॥ २० ॥

इहस्थैरेव तत् सर्वं श्रोतव्यं भरतर्षभाः । न कार्या वः कथंचित् स्यात् तत्राभिगमने मतिः ॥ २१ ॥