महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1081, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम्हें यहीं रहकर वह सब कुछ देखना या सुनना चाहिये। वहाँ पर्वतके ऊपर जानेका विचार तुम्हें किसी प्रकार भी नहीं करना चाहिये ।। २१ ।।
न चाप्यतः परं शक्यं गन्तुं भरतसत्तमः ।
विहारो ह्यत्र देवानाम्अमानुषगतिस्तु सा ।। २२ ।।
भरतश्रेष्ठ! इससे आगे जाना असम्भव है। वहाँ देवताओंकी विहारस्थली है। वहाँ मनुष्योंकी गति नहीं हो सकती ।। २२ ।।
ईषच्चपलकर्माणं मनुष्यमिह भारत ।
द्विषन्ति सर्वभूतानि ताडयन्ति च राक्षसाः ।। २३ ।।
भारत! यहाँ थोड़ी-सी भी चपलता करनेवाले मनुष्यसे सब प्राणी द्वेष करते हैं तथा राक्षसलोग उसपर प्रहार कर बैठते हैं ।। २३ ।।
अस्यातिक्रम्य शिखरं कैलासस्य युधिष्ठिर ।
गतिः परमसिद्धानां देवर्षीणां प्रकाशते ।। २४ ।।
युधिष्ठिर! इस कैलासके शिखरको लाँघ जानेपर परम सिद्ध देवर्षियोंकी गति प्रकाशित होती है ।। २४ ।।
चापलादिह गच्छन्तं पार्थ यानमितः परम् ।
अयःशूलादिभिर्घ्नन्ति राक्षसाः शत्रुसूदन ।। २५ ।।
शत्रुसूदन पार्थ! चपलतावश इससे आगेके मार्गपर जानेवाले मनुष्यको राक्षसगण लोहेके शूल आदिसे मारते हैं ।। २५ ।।
अप्सरोभिः परिवृतः समृद्ध्या नरवाहनः ।
इह वैश्रवणस्तात पर्वसंधिषु दृश्यते ।। २६ ।।
तात! पर्वोंकी संधिके समय यहाँ मनुष्योंपर सवार होनेवाले कुबेर अप्सराओंसे घिरकर अपने अतुल वैभवके साथ दिखायी देते हैं ।। २६ ।।
शिखरस्थं समासीनमधिपं यक्षरक्षसाम् ।
प्रेक्षन्ते सर्वभूतानि भानुमन्तमिवोदितम् ।। २७ ।।
यक्षों तथा राक्षसोंके अधिपति कुबेर जब इस कैलाशशिखरपर विराजमान होते हैं, उस समय उदित हुए सूर्यकी भाँति शोभा पाते हैं। उस अवसरपर सब प्राणी उनका दर्शन करते हैं ।। २७ ।।
देवदानवसिद्धानां तथा वैश्रवणस्य च ।
गिरेः शिखरमुद्यानमिदं भरतसत्तम ।। २८ ।।
भरतश्रेष्ठ! पर्वतका यह शिखर देवताओं, दानवों, सिद्धों तथा कुबेरका क्रीड़ा-कानन है ।। २८ ।।
उपासीनस्य धनदं तुम्बुरोः पर्वसंधिषु ।
गीतसामस्वनस्तात श्रूयते गन्धमादने ।। २९ ।।