भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान्‌का वध करना

जनमेजय उवाच

आर्ष्टिषेणाश्रमे तस्मिन् मम पूर्वपितामहाः ।
पाण्डोः पुत्रा महात्मानः सर्वे दिव्यपराक्रमाः ॥ १ ॥
कियन्तं कालमवसन् पर्वते गन्धमादने ।
किं च चक्रुर्महावीर्याः सर्वेऽतिबलपौरुषाः ॥ २ ॥
जनमेजपने पूछा— ब्रह्मन्! गन्धमादन पर्वतपर आर्ष्टिषेणके आश्रममें मेरे समस्त पूर्वपितामह दिव्य पराक्रमी महामना पाण्डव कितने समयतक रहे? वे सभी महान् पराक्रमी और अत्यन्त बल-पौरुषसे सम्पन्न थे। वहाँ रहकर उन्होंने क्या किया? ॥ १-२ ॥

कानि चाभ्यवहार्याणि तत्र तेषां महात्मनाम् ।
वसतां लोकवीराणामासंस्तद् ब्रूहि सत्तम ॥ ३ ॥
साधुशिरोमणे! वहाँ निवास करते समय विश्वविख्यात वीर महामना पाण्डवोंके भोज्य पदार्थ क्या थे? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

विस्तरेण च मे शंस भीमसेनपराक्रमम् ।
यत् यच्चक्रे महाबाहुस्तस्मिन् हैमवते गिरौ ॥ ४ ॥
आप मुझसे भीमसेनका पराक्रम विस्तारपूर्वक बतावें। उन महाबाहुने हिमालय पर्वतके शिखरपर रहते समय कौन-कौन-सा कार्य किया था? ॥ ४ ॥

न खल्वासीत् पुनर्युद्धं तस्य यक्षैर्द्विजोत्तम ।
कच्चित् समागमस्तेषामासीद् वैश्रवणस्य च ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! उनका यक्षोंके साथ फिर कोई युद्ध हुआ था या नहीं। क्या कुबेरके साथ कभी उनकी भेंट हुई थी? ॥ ५ ॥

तत्र ह्यायाति धनद आर्ष्टिषेणो यथाब्रवीत् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ॥ ६ ॥
न हि मे शृण्वतस्तृप्तिरस्ति तेषां विचेष्टितम् ।
क्योंकि आर्ष्टिषेणने जैसा बताया था, उसके अनुसार वहाँ कुबेर अवश्य आते रहे होंगे। तपोधन! मैं यह सब विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ; क्योंकि पाण्डवोंका चरित्र सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं होती ॥ ६ १/२ ॥