भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1084

वैशम्पायन उवाच

एतदात्महितं श्रुत्वा तस्याप्रतिमतेजसः ।। ७ ।।
शासनं सततं चक्रुस्तथैव भरतर्षभाः ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! अप्रतिम तेजस्वी आर्ष्टिषेणका यह अपने लिये हितकर वचन सुनकर भरतकुल-भूषण पाण्डवोंने सदा उनके आदेशका उसी प्रकार पालन किया ।। ७ ½ ।।

भुञ्जाना मुनिभोज्यानि रसवन्ति फलानि च ।। ८ ।।
मेध्यानि हिमवत्पृष्ठे मधूनि विविधानि च ।
एवं ते न्यवसंस्तत्र पाण्डवा भरतर्षभाः ।। ९ ।।
वे हिमालयके शिखरपर निवास करते हुए मुनियोंके खानेयोग्य सरस फलोंका और नाना प्रकारके पवित्र (बिना हिंसाके प्राप्त) मधुका भी भोजन करते थे। इस प्रकार भरतश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ निवास करते थे ।। ८-९ ।।

तथा निवसतं तेषां पञ्चमं वर्षमभ्यगात् ।
शृण्वतां लोमशोक्तानि वाक्यानि विविधान्युत ।। १० ।।
वहाँ निवास करते हुए उनका पाँचवाँ वर्ष बीत गया। उन दिनों वे लोमशजीकी कही हुई नाना प्रकारकी कथाएँ सुना करते थे ।। १० ।।

कृत्यकाल उपस्थास्य इति चोक्त्वा घटोत्कचः ।
राक्षसैः सह सर्वैश्च पूर्वमेव गतः प्रभो ।। ११ ।।
राजन्! घटोत्कच यह कहकर कि 'मैं आवश्यकताके समय स्वयं उपस्थित हो जाऊँगा' सब राक्षसोंके साथ पहले ही चला गया था ।। ११ ।।

आर्ष्टिषेणाश्रमे तेषां वसतां वै महात्मनाम् ।
अगच्छन् बहवो मासाः पश्यतां महदद्भुतम् ।। १२ ।।
आर्ष्टिषेणके आश्रममें रहकर अत्यन्त अद्भुत दृश्योंका अवलोकन करते हुए महामना पाण्डवोंके अनेक मास व्यतीत हो गये ।। १२ ।।

तैस्तत्र विहरद्भिश्च रममाणैश्च पाण्डवैः ।
प्रीतिमन्तो महाभागा मुनयश्चारणास्तथा ।। १३ ।।
वहाँ रहकर क्रीडा-विहार करते हुए उन पाण्डवोंसे महाभाग मुनि और चारण बहुत प्रसन्न थे ।। १३ ।।

आजग्मुः पाण्डवान् द्रष्टुं शुद्धात्मानो यतव्रताः ।
ते तैः सह कथां चक्रुर्दिव्यां भरतसत्तमाः ।। १४ ।।
उनका अन्तःकरण शुद्ध था और वे संयम-नियमके साथ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले थे। एक दिन वे सभी पाण्डवोंसे मिलनेके लिये आये। भरतशिरोमणि पाण्डवोंने