महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1087, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनका हृदय महान् था, सभी अंग मनोहर जान पड़ते थे, ग्रीवा शंखके समान थी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। वे सुवर्णकी पीठवाले धनुष, खड्ग तथा तरकसपर बार-बार हाथ फेरते थे ।। ३० ।।
स केसरीव चोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः ।
व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ॥ ३१ ॥
बलवान् भीमसेन मदोन्मत्त सिंह और मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति भय और मोहसे रहित हो उस पर्वतपर चढ़ने लगे ।। ३१ ।।
तं मृगेन्द्रमिवायान्तं प्रभिन्नमिव वारणम् ।
ददृशुः सर्वभूतानि बाणकार्मुकधारिणम् ॥ ३२ ॥
मदवर्षी कुंजर और मृगराजकी भाँति आते हुए धनुष-बाणधारी भीमसेनको उस समय सब भूतोंने देखा ।। ३२ ।।
द्रौपद्या वर्धयन् हर्षं गदामादाय पाण्डवः ।
व्यपेतभयसम्मोहः शैलराजं समाश्रितः ॥ ३३ ॥
पाण्डुनन्दन भीम गदा हाथमें लेकर द्रौपदीका हर्ष बढ़ाते हुए भय और घबराहट छोड़कर उस पर्वतराजपर चढ़ गये ।। ३३ ।।
न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः ।
कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ॥ ३४ ॥
वायु-पुत्र कुन्तीकुमार भीमसेनको कभी ग्लानि, कातरता, व्याकुलता और मत्सरता आदि भाव नहीं छूते थे ।। ३४ ।।
तदेकायनमासाद्य विषमं भीमदर्शनम् ।
बहुतालोच्छ्रयं शृङ्गम ारुरोह महाबलः ॥ ३५ ॥
वह पर्वत ऊँची-नीची भूमियोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर था। उसकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर थी और उसपर चढ़नेके लिये एक ही मार्ग था, तो भी महाबली भीमसेन उसके शिखरपर चढ़ गये ।। ३५ ।।
सकिन्नरमहानागमुनिगन्धर्वराक्षसान् ।
हर्षयन् पर्वतस्याग्रमारुह्य स महाबलः ॥ ३६ ॥
पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो महाबली भीम किन्नर, महानाग, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगे ।। ३६ ।।
ततो वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः ।
काञ्चनैः स्फाटिकैश्चैव वेश्मभिः समलंकृतम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने कुबेरका निवासस्थान देखा, जो सुवर्ण और स्फटिकमणिके बने हुए भवनोंसे विभूषित था ।। ३७ ।।
प्राकारेण परिक्षिप्तं सौवर्णेन समन्ततः ।