महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1086, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतवापि सुमहत् तेजो महद् बाहुबलं च ते । अविषह्यमनाधृष्यं शक्रतुल्यपराक्रम ॥ २३ ॥ 'आर्यपुत्र! तुम्हारा पराक्रम भी इन्द्रके ही समान है। तुम्हारा तेज और बाहुबल भी महान् है। वह दूसरोंके लिये दुःसह एवं दुर्धर्ष है ॥ २३ ॥ त्वद्बाहुबलवेगेन त्रासिताः सर्वराक्षसाः । हित्वा शैलं प्रपद्यन्तां भीमसेन दिशो दश ॥ २४ ॥ 'भीमसेन! मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे बाहुबलके वेगसे थर्राकर सम्पूर्ण राक्षस इस पर्वतको छोड़ दें और दसों दिशाओंकी शरण लें ॥ २४ ॥ ततः शैलोत्तमस्याग्रं चित्रमाल्यधरं शिवम् । व्यपेतभयसम्मोहाः पश्यन्तु सुहृदस्तव ॥ २५ ॥ एवं प्रणिहितं भीम चिरात् प्रभृति मे मनः । द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्बाहुबलपालिता ॥ २६ ॥ 'तत्पश्चात् विचित्र मालाधारी एवं शिवस्वरूप इस उत्तम शैल-शिखरको तुम्हारे सब सुहृद् भय और मोहसे रहित होकर देखें। भीम! दीर्घकालसे मैं अपने मनमें यही सोच ही रही हूँ। मैं तुम्हारे बाहुबलसे सुरक्षित हो इस शैल-शिखरका दर्शन करना चाहती हूँ' ॥ २५-२६ ॥ ततः क्षिप्तमिवात्मानं द्रौपद्या स परंतपः । नामृष्यत महाबाहुः प्रहारमिव सद्गवः ॥ २७ ॥ द्रौपदीकी यह बात सुनकर परंतप महाबाहु भीमसेनने इसे अपने ऊपर आक्षेप हुआ—सा समझा। जैसे अच्छा बैल अपने ऊपर चाबुककी मार नहीं सह सकता, उसी प्रकार यह आक्षेप उनसे नहीं सहा गया ॥ सिंहर्षभगतिः श्रीमानुदारः कनकप्रभः । मनस्वी बलवान् दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ॥ २८ ॥ उनकी चाल श्रेष्ठ सिंहके समान थी। वे सुन्दर, उदार और कनकके समान कान्तिमान् थे। पाण्डुनन्दन भीम मनस्वी, बलवान्, अभिमानी, मानी और शूरवीर थे ॥ २८ ॥ लोहिताक्षः पृथ्व्यंसो मत्तवारणविक्रमः । सिंहदंष्ट्रो बृहत्स्कन्धः शालपोत इवोद्गतः ॥ २९ ॥ उनकी आँखें लाल थीं। दोनों कंधे हृष्ट-पुष्ट थे। उनका पराक्रम मतवाले गजराजके समान था। दाँत सिंहकी दाढ़ोंकी समानता करते थे। कंधे विशाल थे। वे शालवृक्षकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे ॥ २९ ॥ महात्मा चारुसर्वाङ्गः कम्बुग्रीवो महाभुजः । रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूर्णांश्चापि परामृशत् ॥ ३० ॥