महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तवापि सुमहत् तेजो महद् बाहुबलं च ते । अविषह्यमनाधृष्यं शक्रतुल्यपराक्रम ॥ २३ ॥ 'आर्यपुत्र! तुम्हारा पराक्रम भी इन्द्रके ही समान है। तुम्हारा तेज और बाहुबल भी महान् है। वह दूसरोंके लिये दुःसह एवं दुर्धर्ष है ॥ २३ ॥ त्वद्बाहुबलवेगेन त्रासिताः सर्वराक्षसाः । हित्वा शैलं प्रपद्यन्तां भीमसेन दिशो दश ॥ २४ ॥ 'भीमसेन! मैं चाहती हूँ कि तुम्हारे बाहुबलके वेगसे थर्राकर सम्पूर्ण राक्षस इस पर्वतको छोड़ दें और दसों दिशाओंकी शरण लें ॥ २४ ॥ ततः शैलोत्तमस्याग्रं चित्रमाल्यधरं शिवम् । व्यपेतभयसम्मोहाः पश्यन्तु सुहृदस्तव ॥ २५ ॥ एवं प्रणिहितं भीम चिरात् प्रभृति मे मनः । द्रष्टुमिच्छामि शैलाग्रं त्वद्बाहुबलपालिता ॥ २६ ॥ 'तत्पश्चात् विचित्र मालाधारी एवं शिवस्वरूप इस उत्तम शैल-शिखरको तुम्हारे सब सुहृद् भय और मोहसे रहित होकर देखें। भीम! दीर्घकालसे मैं अपने मनमें यही सोच ही रही हूँ। मैं तुम्हारे बाहुबलसे सुरक्षित हो इस शैल-शिखरका दर्शन करना चाहती हूँ' ॥ २५-२६ ॥ ततः क्षिप्तमिवात्मानं द्रौपद्या स परंतपः । नामृष्यत महाबाहुः प्रहारमिव सद्गवः ॥ २७ ॥ द्रौपदीकी यह बात सुनकर परंतप महाबाहु भीमसेनने इसे अपने ऊपर आक्षेप हुआ—सा समझा। जैसे अच्छा बैल अपने ऊपर चाबुककी मार नहीं सह सकता, उसी प्रकार यह आक्षेप उनसे नहीं सहा गया ॥ सिंहर्षभगतिः श्रीमानुदारः कनकप्रभः । मनस्वी बलवान् दृप्तो मानी शूरश्च पाण्डवः ॥ २८ ॥ उनकी चाल श्रेष्ठ सिंहके समान थी। वे सुन्दर, उदार और कनकके समान कान्तिमान् थे। पाण्डुनन्दन भीम मनस्वी, बलवान्, अभिमानी, मानी और शूरवीर थे ॥ २८ ॥ लोहिताक्षः पृथ्व्यंसो मत्तवारणविक्रमः । सिंहदंष्ट्रो बृहत्स्कन्धः शालपोत इवोद्गतः ॥ २९ ॥ उनकी आँखें लाल थीं। दोनों कंधे हृष्ट-पुष्ट थे। उनका पराक्रम मतवाले गजराजके समान था। दाँत सिंहकी दाढ़ोंकी समानता करते थे। कंधे विशाल थे। वे शालवृक्षकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे ॥ २९ ॥ महात्मा चारुसर्वाङ्गः कम्बुग्रीवो महाभुजः । रुक्मपृष्ठं धनुः खड्गं तूर्णांश्चापि परामृशत् ॥ ३० ॥
उनका हृदय महान् था, सभी अंग मनोहर जान पड़ते थे, ग्रीवा शंखके समान थी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। वे सुवर्णकी पीठवाले धनुष, खड्ग तथा तरकसपर बार-बार हाथ फेरते थे ।। ३० ।।
स केसरीव चोत्सिक्तः प्रभिन्न इव वारणः ।
व्यपेतभयसम्मोहः शैलमभ्यपतद् बली ॥ ३१ ॥
बलवान् भीमसेन मदोन्मत्त सिंह और मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति भय और मोहसे रहित हो उस पर्वतपर चढ़ने लगे ।। ३१ ।।
तं मृगेन्द्रमिवायान्तं प्रभिन्नमिव वारणम् ।
ददृशुः सर्वभूतानि बाणकार्मुकधारिणम् ॥ ३२ ॥
मदवर्षी कुंजर और मृगराजकी भाँति आते हुए धनुष-बाणधारी भीमसेनको उस समय सब भूतोंने देखा ।। ३२ ।।
द्रौपद्या वर्धयन् हर्षं गदामादाय पाण्डवः ।
व्यपेतभयसम्मोहः शैलराजं समाश्रितः ॥ ३३ ॥
पाण्डुनन्दन भीम गदा हाथमें लेकर द्रौपदीका हर्ष बढ़ाते हुए भय और घबराहट छोड़कर उस पर्वतराजपर चढ़ गये ।। ३३ ।।
न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः ।
कदाचिज्जुषते पार्थमात्मजं मातरिश्वनः ॥ ३४ ॥
वायु-पुत्र कुन्तीकुमार भीमसेनको कभी ग्लानि, कातरता, व्याकुलता और मत्सरता आदि भाव नहीं छूते थे ।। ३४ ।।
तदेकायनमासाद्य विषमं भीमदर्शनम् ।
बहुतालोच्छ्रयं शृङ्गम ारुरोह महाबलः ॥ ३५ ॥
वह पर्वत ऊँची-नीची भूमियोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर था। उसकी ऊँचाई कई ताड़ोंके बराबर थी और उसपर चढ़नेके लिये एक ही मार्ग था, तो भी महाबली भीमसेन उसके शिखरपर चढ़ गये ।। ३५ ।।
सकिन्नरमहानागमुनिगन्धर्वराक्षसान् ।
हर्षयन् पर्वतस्याग्रमारुह्य स महाबलः ॥ ३६ ॥
पर्वतके शिखरपर आरूढ़ हो महाबली भीम किन्नर, महानाग, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षसोंका हर्ष बढ़ाने लगे ।। ३६ ।।
ततो वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः ।
काञ्चनैः स्फाटिकैश्चैव वेश्मभिः समलंकृतम् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने कुबेरका निवासस्थान देखा, जो सुवर्ण और स्फटिकमणिके बने हुए भवनोंसे विभूषित था ।। ३७ ।।
प्राकारेण परिक्षिप्तं सौवर्णेन समन्ततः ।
सर्वरत्नद्युतिमता सर्वोद्यानवता तथा ॥ ३८ ॥
शैलादभ्युच्छ्रयवता चयाट्टालकशोभिना ।
द्वारतोरणनिर्यूहध्वजसंवाहशोभिना ॥ ३९ ॥
उसके चारों ओर सोनेकी चहारदीवारी बनी थी। उसमें सब प्रकारके रत्न जड़े होनेसे उनकी प्रभा फैलती रहती थी। चहारदीवारीके सब ओर सुन्दर बगीचे थे। उस चहारदीवारीकी ऊँचाई पर्वतसे भी अधिक थी। बहुतसे भवनों और अट्टालिकाओंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। द्वार, तोरण (गोपुर), बुर्ज और ध्वजसमुदाय उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ३८-३९ ॥
विलासिनीभिरत्यर्थं नृत्यन्तीभिः समन्ततः ।
वायुना धूयमानाभिः पताकाभिरलंकृतम् ॥ ४० ॥
उस भवनमें सब ओर कितनी ही विलासिनी अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और हवासे फहराती हुई पताकाएँ उस भवनका अलंकार बनी हुई थीं ॥ ४० ॥
धनुष्कोटिमवष्टभ्य वक्रभावेन बाहुना ।
पश्यमानः स खेदेन द्रविणाधिपतेः पुरम् ॥ ४१ ॥
अपनी तिरछी की हुई बाहुसे धनुषकी नोकको स्थिर करके भीमसेन उस धनाध्यक्ष कुबेरके नगरको बड़े खेदके साथ देख रहे थे ॥ ४१ ॥
मोदयन् सर्वभूतानि गन्धमादनसम्भवः ।
सर्वगन्धवहस्तत्र मारुतः सुसुखो ववौ ॥ ४२ ॥
गन्धमादनसे उठी हुई वायु सम्पूर्ण सुगन्धकी राशि लेकर समस्त प्राणियोंको आनन्दित करती हुई सुखद मन्द गतिसे बह रही थी ॥ ४२ ॥
चित्रा विविधवर्णाभाश्चित्रमञ्जरिधारिणः ।
अचिन्त्या विविधास्तत्र द्रुमाः परमशोभिनः ॥ ४३ ॥
रत्नजालपरिक्षिप्तं चित्रमाल्यविभूषितम् ।
राक्षसाधिपतेः स्थानं ददृशे भरतर्षभः ॥ ४४ ॥
वहाँके अत्यन्त शोभाशाली विविध वृक्ष नाना प्रकारकी कान्तिसे प्रकाशित हो रहे थे। उनकी मञ्जरियाँ विचित्र दिखायी देती थीं। वे सब-के-सब अद्भुत और अकथनीय जान पड़ते थे। भरतश्रेष्ठ भीमने राक्षसराज कुबेरके उस स्थानको रत्नोंके समुदायसे सुशोभित तथा विचित्र मालाओंसे विभूषित देखा ॥ ४३-४४ ॥
गदाखड्गधनुष्पाणिः समभित्यक्तजीवितः ।
भीमसेनो महाबाहुस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४५ ॥
ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम् ।
ज्याघोषतलशब्दं च कृत्वा भूतान्यमोहयत् ॥ ४६ ॥
उनके हाथमें गदा, खड्ग और धनुष शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने जीवनका मोह सर्वथा छोड़ दिया था। वे माहबाहु भीमसेन वहाँ पर्वतकी भाँति अविचल-भावसे कुछ देर खड़े रहे। तत्पश्चात् उन्होंने बड़े जोरसे शंख बजाया, जिसकी आवाज शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। फिर धनुषकी टंकार करके समस्त प्राणियोंको मोहित कर दिया ।। ४५-४६ ।। ततः प्रहृष्टरोमाणस्तं शब्दमभिदुद्रुवुः । यक्षराक्षसगन्धर्वाः पाण्डवस्य समीपतः ।। ४७ ।। तब यक्ष, राक्षस और गन्धर्व रोमाञ्चित होकर उस शब्दको लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके समीप दौड़े आये ।। ४७ ।। गदापरिघनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः । प्रगृहीता व्यरोचन्त यक्षराक्षसबाहूभिः ।। ४८ ।। उस समय गदा, परिघ, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे आदि अस्त्र-शस्त्र उन यक्षों तथा राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़ी चमक पैदा कर रहे थे ।। ४८ ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं तेषां तस्य च भारत । तैः प्रयुक्तान् महामायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ।। ४९ ।। भल्लैर्भीमः प्रचिच्छेद भीमवेगत रैस्ततः । अन्तरिक्षगतानां च भूमिष्ठानां च गर्जताम् ।। ५० ।। शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महाबलः । सा लोहितमहावृष्टिरभ्यवर्षन्महाबलम् ।। ५१ ।। गदापरिघपाणीनां रक्षसां कायसम्भवाः । कायेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः ।। ५२ ।। भारत! तदनन्तर उन यक्षों और गन्धर्वोंका भीमसेनके साथ युद्ध प्रारम्भ हो गया। वे यक्ष और राक्षस बड़े मायावी थे। उनके चलाये हुए शूल, शक्ति और फरसोंको भीमसेनने भयानक वेगशाली भल्ल नामक बाणोंद्वारा काट गिराया। वे राक्षस आकाशमें उड़कर तथा भूतलपर खड़े होकर जोर-जोरसे गर्जना कर रहे थे। महाबली भीमने बाणोंकी झड़ी लगाकर उनके शरीरोंको अच्छी प्रकार छेद डाला। गदा और परिघ हाथमें लिये हुए राक्षसोंके शरीरसे महाबली भीमपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी तथा चारों ओर राक्षसोंके शरीरसे रक्तकी कितनी ही धाराएँ बह चलीं ।। ४९-५२ ।। भीमबाहुबलोत्सृष्टैरायुधैर्यक्षरक्षसाम् । विनिकृत्तानि दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ।। ५३ ।। भीमके बाहुबलसे छूटे हुए अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा यक्षों तथा राक्षसोंके शरीर और सिर कटे दिखायी दे रहे थे ।। प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रियदर्शनम् ।
ददृशुः सर्वभूतानि सूर्यमभ्रगणैरिव ॥ ५४ ॥ जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार प्रियदर्शन पाण्डुपुत्र भीमको राक्षस ढक लेते हैं, यह सब प्राणियोंने प्रत्यक्ष देखा ॥ ५४ ॥
स रश्मिभिरिवादित्यः शरैररिनिघातिभिः । सर्वान्वाच्छन्महाबाहुर्बलवान् सत्यविक्रमः ॥ ५५ ॥ तब सत्यपराक्रमी बलवान् महाबाहु भीमसेनने अपने शत्रुनाशक बाणोंद्वारा समस्त शत्रुओंको उसी प्रकार ढक लिया, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे संसारको ढक लेते हैं ॥ ५५ ॥
अभितर्जयमानाश्च रुवन्तश्च महारवान् । न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ॥ ५६ ॥ सब ओरसे गर्जन-तर्जन करते हुए तथा बड़ी भयानक आवाजसे चिग्घाड़ते हुए सब राक्षसोंने भीमसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं देखी ॥ ५६ ॥
यक्षा विकृतसर्वाङ्गा भीमसेनभयार्दिताः । भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहायुधाः ॥ ५७ ॥ जिनके सारे अंग विकृत एवं विकराल थे, वे यक्ष भीमसेनके भयसे पीड़ित हो अपने बड़े-बड़े आयुधोंको इधर-उधर फेंककर भयंकर आर्तनाद करने लगे ॥ ५७ ॥
उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वधान् । दक्षिणां दिशमाजग्मुस्त्रसिता दृढधन्वना ॥ ५८ ॥ सुदृढ़ धनुषवाले भीमसेनसे आतंकित हो वे यक्ष-राक्षस आदि योद्धा गदा, शूल, खड्ग, शक्ति तथा परशु आदि अस्त्रोंको वहीं छोड़कर दक्षिणदिशाकी ओर भाग गये ॥ ५८ ॥
तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः । सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ॥ ५९ ॥ वहाँ कुबेरके सखा राक्षसप्रवर मणिमान् भी मौजूद थे। उनके हाथोंमें त्रिशूल और गदा शोभा पा रही थी उनकी छाती चौड़ी और बाँहें विशाल थीं ॥ ५९ ॥
अदर्शयदधीकारं पौरुषं च महाबलः । स तान् दृष्ट्वा परावृत्तान् स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ६० ॥ उन महाबली वीरने वहाँ अपने अधिकार और पौरुष दोनोंको प्रकट किया। उस समय अपने सैनिकोंको रणसे विमुख होते देख वे मुसकराते हुए उनसे बोले— ॥ ६० ॥
एकेन बहवः सङ्ख्ये मानुषेण पराजिताः । प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ॥ ६१ ॥ 'अरे! तुम बहुत बड़ी संख्यामें होकर भी आज एक मनुष्यद्वारा युद्धमें पराजित हो गये।' कुबेरभवनमें धनाध्यक्षके पास जाकर क्या कहोगे?' ॥ ६१ ॥
एवमाभाष्य तान् सर्वानभ्यवर्तत राक्षसः ।
शक्तिशूलगदापाणिरभ्यधावत् स पाण्डवम् ॥ ६२ ॥
ऐसा कहकर राक्षस मणिमान्ने उन सबको लौटाया और हाथोंमें शक्ति, शूल तथा गदा लेकर भीमसेनपर धावा किया ॥ ६२ ॥
तमापतन्तं वेगेन प्रभिन्नमिव वारणम् ।
वत्सदन्तैस्त्रिभिः पार्श्वे भीमसेनः समार्दयत् ॥ ६३ ॥
मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति मणिमान्को बड़े वेगसे आता देख भीमसेनने वत्सदन्त नामक तीन बाणोंद्वारा उनकी पसलीमें प्रहार किया ॥ ६३ ॥
मणिमानपि संक्रुद्धः प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
प्राहिणोद् भीमसेनाय परिगृह्य महाबलः ॥ ६४ ॥
यह देख महाबली मणिमान् भी रोषसे आगबबूला हो उठे और बहुत बड़ी गदा लेकर उन्होंने भीमसेनपर चलायी ॥ ६४ ॥
विद्युद्रूपां महाघोरामाकाशे महतीं गदाम् ।
शरैर्बहुभिरभ्याच्छर्द भीमसेनः शिलाशितैः ॥ ६५ ॥
वह विशाल एवं महा भयंकर गदा आकाशमें विद्युत्की भाँति चमक उठी। यह देख भीमसेनने पत्थर पर रगड़कर तेज किये हुए बहुत-से बाणोंद्वारा उसपर आघात किया ॥ ६५ ॥
प्रत्यहन्यन्त ते सर्वे गदामासाद्य सायकाः ।
न वेगं धारयामासुर्गदावेगस्य वेगिताः ॥ ६६ ॥
परंतु वे सभी बाण मणिमान्की गदासे टकराकर नष्ट हो गये। यद्यपि वे बड़े वेगसे छूटे थे, तथापि गदा चलानेके अभ्यासी मणिमान्की गदाके वेगको न सह सके ॥ ६६ ॥
गदायुद्धसमाचारं बुद्ध्यमानः स वीर्यवान् ।
व्यंसयामास तं तस्य प्रहारं भीमविक्रमः ॥ ६७ ॥
भयंकर पराक्रमी महाबली भीमसेन गदायुद्धकी कलको जानते थे। अतः उन्होंने शत्रुके उस प्रहारको व्यर्थ कर दिया ॥ ६७ ॥
ततः शक्तिं महाघोरां रुक्मदण्डामयस्मयीम् ।
तस्मिन्नेवान्तरे धीमान् प्रजहाराथ राक्षसः ॥ ६८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् राक्षसने उसी समय स्वर्णमय दण्डसे विभूषित एवं लोहेकी बनी हुई बड़ी भयानक शक्तिका प्रहार किया ॥ ६८ ॥
सा भुजं भीमनिर्ह्रादा भित्त्वा भीमस्य दक्षिणम् ।
साग्निज्वाला महारौद्रा पपात सहसा भुवि ॥ ६९ ॥
वह अग्निकी ज्वालाके समान अत्यन्त भयंकर शक्ति भयानक गड़गड़ाहटके साथ भीमकी दाहिनी भुजाको छेदकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ६९ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासः शक्त्यामितपराक्रमः ।
गदां जग्राह कौन्तेयः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ७० ॥
रुक्मपट्टपिनद्धां तां शत्रूणां भयवर्धिनीम् ।
प्रगृह्याथ नदन् भीमः शैक्यां सर्व्वायसीं गदाम् ॥ ७१ ॥
तरसा चाभिदुद्राव मणिमन्तं महाबलम् ।
शक्तिकी गहरी चोट लगनेसे महान् धनुर्धर एवं अत्यन्त पराक्रमी कुन्तीकुमार भीमके नेत्र क्रोधसे व्याकुल हो उठे और उन्होंने एक ऐसी गदा हाथमें ली जो शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली थी। उसके ऊपर सोनेके पत्र जड़े थे। वह सारी-की-सारी लोहेकी बनी हुई और शत्रुओंको नष्ट करनेमें समर्थ थी। उसे लेकर भीमसेन विकट गर्जना करते हुए बड़े वेगसे महाबली मणिमान्की ओर दौड़े ॥ ७०-७१ १/२ ॥
दीप्यमानं महाशूलं प्रगृह्य मणिमानपि ॥ ७२ ॥
प्राहिणोद् भीमसेनाय वेगेन महता नदन् ।
उधर मणिमान्ने भी सिंहनाद करते हुए एक चमचमाता हुआ महान् त्रिशूल हाथमें लिया और बड़े वेगसे भीमसेनपर चलाया ॥ ७२ १/२ ॥
भङ्क्त्वा शूलं गदाग्रेण गदायुद्धविशारदः ॥ ७३ ॥
अभिदुद्राव तं हन्तुं गरुत्मानिव पन्नगम् ।
परंतु गदा-युद्धमें कुशल भीमने गदाके अग्रभागसे उस त्रिशूलके टुकड़े-टुकड़े करके मणिमान्को मारनेके लिये उसी प्रकार धावा किया, जैसे किसी सर्पके प्राण लेनेके लिये गरुड उसपर टूट पड़ते हैं ॥ ७३ १/२ ॥
सोऽन्तरिक्षमवप्लुत्य विधूय सहसा गदाम् ॥ ७४ ॥
प्रचिक्षेप महाबाहुर्विर्नद्य रणमूर्धनि ।
सेन्द्राशनिरिवेन्द्रेण विसृष्टा वातरंहसा ॥ ७५ ॥
महाबाहु भीमने युद्धके मुहानेपर गर्जना करते हुए सहसा आकाशमें उछलकर गदा घुमायी और उसे वायुके समान वेगसे मणिमान्पर दे मारा, मानो देवराज इन्द्रने किसी दैत्यपर वज्रका प्रहार किया हो ॥ ७४-७५ ॥
हत्वा रक्षः क्षितिं प्राप्य कृत्येव निपपात ह ।
तं राक्षसं भीमबलं भीमसेनेन पातितम् ॥ ७६ ॥
ददृशुः सर्वभूतानि सिंहेनेव गवां पतिम् ।
तं प्रेक्ष्य निहतं भूमौ हतशेषा निशाचराः ।
भीममार्तस्वरं कृत्वा जग्मुः प्राचीं दिशं प्रति ॥ ७७ ॥
वह गदा उस राक्षसके प्राण लेकर भूमिपर मूर्तिमती कृत्याके समान गिर पड़ी। भीमसेनके द्वारा मारे गये उस भयानक शक्तिशाली राक्षसको सब प्राणियोंने प्रत्यक्ष देखा, मानो सिंहने किसी साँड़को मार गिराया हो। उसे मरकर पृथ्वीपर गिरा देख मरनेसे बचे हुए निशाचर भयंकर आर्तनाद करते हुए पूर्व दिशाकी ओर भाग चले ॥ ७६-७७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि मणिमद्वधे षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें मणिमान्-वधसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥
कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट
एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा बहुविधैः शब्दैर्नाद्यमानां गिरेर्गुहाम् ।
अजातशत्रुः कौन्तेयो माद्रीपुत्रावुभावपि ॥ १ ॥
धौम्यः कृष्णा च विप्राश्च सर्वे च सुहृदस्तथा ।
भीमसेनमपश्यन्तः सर्वे विमनसोऽभवन् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय उस पर्वतकी गुफा नाना प्रकारके शब्दोंसे प्रतिध्वनित हो रही थी। वह प्रतिध्वनि सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर, दोनों माद्री-पुत्र नकुल-सहदेव, पुरोहित धौम्य, द्रौपदी और समस्त ब्राह्मण तथा सुहृद्—ये सभी भीमसेनको न देखनेके कारण बहुत उदास हो गये ॥ १-२ ॥
द्रौपदीमार्ष्टिषेणाय सम्प्रधार्य महारथाः ।
सहिताः सायुधाः शूराः शैलमारुरुहुस्तदा ॥ ३ ॥
तब वे महारथी शूर-वीर द्रौपदीको आर्ष्टिषेणकी देख-रेखमें सौंपकर हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये एक साथ पर्वतपर चढ़ गये ॥ ३ ॥
ततः सम्प्राप्य शैलाग्रं वीक्षमाणा महारथाः ।
ददृशुस्ते महेष्वासा भीमसेनमरिंदमाः ॥ ४ ॥
तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे महाधनुर्धर एवं महारथी वीर उस पर्वतके शिखरपर पहुँचकर जब इधर-उधर दृष्टिपात करने लगे, तब उन्हें भीमसेन दिखायी दिये ॥ ४ ॥
स्फुरतश्च महाकायान् गतसत्त्वांश्च राक्षसान् ।
महाबलान् महासत्त्वान् भीमसेनेन पातितान् ॥ ५ ॥
साथ ही उन्होंने भीमसेनके द्वारा मार गिराये हुए महान् शक्तिशाली तथा परम उत्साही विशालकाय राक्षस भी देखे, जिनमेंसे कुछ छटपटा रहे थे और कुछ मरे पड़े थे ॥ ५ ॥
शुशुभे स महाबाहुर्गदाखड्गधनुर्धरः ।
निहत्य समरे सर्वान् दानवान् मघवानिव ॥ ६ ॥
उस समय गदा, खड्ग और धनुष धारण किये महाबाहु भीमसेन समरभूमिमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार करके खड़े हुए देवराज इन्द्रके समान शोभा पा रहे थे ॥ ६ ॥
ततस्ते भ्रातरं दृष्ट्वा परिष्वज्य महारथाः ।
तत्रोपविविशुः पार्थाः प्राप्ता गतिमनुत्तमाम् ॥ ७ ॥
तब वे उत्तम आश्रयको प्राप्त हुए महारथी पाण्डव भाई भीमसेनको हृदयसे लगाकर उनके पास ही बैठ गये ॥ ७ ॥
तैश्चतुर्भिर्महेष्वासैर्गिरिशृङ्गमशोभत ।
लोकपालैर्महाभागैर्दिवं देववरैरिव ॥ ८ ॥
जैसे महान् भाग्यशाली देवश्रेष्ठ इन्द्र आदि लोकपालोंके द्वारा स्वर्गलोककी शोभा होती है, उसी प्रकार उन चार महाधनुर्धर बन्धुओंसे उस समय वह पर्वत-शिखर सुशोभित हो रहा था ॥ ८ ॥
कुबेरसदनं दृष्ट्वा राक्षसांश्च निपातितान् ।
भ्राता भ्रातरमासीनमब्रवीत् पृथिवीपतिः ॥ ९ ॥
राजा युधिष्ठिरने कुबेरका भवन देखकर और मारे गये राक्षसोंकी ओर दृष्टिपात करके अपने पास बैठे हुए भाई भीमसेनसे कहा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
साहसाद् यदि वा मोहाद् भीम पापमिदं कृतम् ।
नैतत् ते सदृशं वीर मुनेरिव मृषा वधः ॥ १० ॥
**युधिष्ठिर बोले—**वीर भीमसेन! तुमने दुःसाहसवश अथवा मोहके कारण जो यह पापकर्म किया है, वह मुनिवृत्तिसे रहनेवाले तुम्हारे अनुरूप नहीं है। राक्षसोंका यह संहार व्यर्थ ही किया गया है ॥ १० ॥
राजद्विष्टं न कर्तव्यमिति धर्मविदो विदुः ।
त्रिदशानामिदं द्विष्टं भीमसेन त्वया कृतम् ॥ ११ ॥
भीमसेन! धर्मज्ञ पुरुष यह जानते और मानते हैं कि राजद्रोहका कार्य नहीं करना चाहिये; परन्तु तुमने तो न केवल राजद्रोहका अपितु देवताओंके भी द्रोहका कार्य किया है ॥ ११ ॥
अर्थधर्मावनादृत्य यः पापे कुरुते मनः ।
कर्मणां पार्थ पापानां स फलं विन्दते ध्रुवम् ।
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ १२ ॥
पार्थ! जो अर्थ और धर्मका अनादर करके पापमें मन लगाता है उसे पापकर्मोंका फल अवश्य प्राप्त होता है। यदि तुम वही कार्य करना चाहते हो जो मुझे प्रिय लगे तो आजसे फिर कभी ऐसा काम तुम्हें नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्राता भ्रातरमच्युतम् ।
अर्थतत्त्वविभागज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥
विरराम महातेजास्तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मात्मा भाई महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अर्थतत्त्वके विभागको ठीक-ठीक जाननेवाले थे। वे धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई भीमसेनसे उपर्युक्त बातें कहकर चुप हो गये और उसी विषयपर बार-बार विचार करने लगे ॥ १३ १/२ ॥
ततस्ते हतशिष्टा ये भीमसेनेन राक्षसाः ॥ १४ ॥
सहिताः प्रत्यपद्यन्त कुबेरसदनं प्रति ।
उधर भीमसेनकी मारसे बचे हुए राक्षस एक साथ हो कुबेरके भवनमें गये ॥ १४ १/२ ॥
ते जवेन महावेगाः प्राप्य वैश्रवणालयम् ॥ १५ ॥
भीममार्तस्वरं चक्रुर्भीमसेनभयार्दिताः ।
न्यस्तशस्त्रायुधाः क्लान्ताः शोणिताक्ततनुच्छदाः ॥ १६ ॥
वे महान् वेगशाली तो थे ही, तीव्र गतिसे धनाध्यक्षके महलमें पहुँचकर भयंकर आर्तनाद करने लगे। भीमसेनका भय उस समय भी उन्हें पीड़ा दे रहा था। वे अपने अस्त्र-शस्त्र छोड़ चुके थे एवं थके हुए थे। उनके कवच खूनसे लथपथ हो गये थे ॥ १५-१६ ॥
प्रकीर्णमूर्धजा राजन् यक्षाधिपतिमब्रुवन् ।
गदापरिघनिस्त्रिंशतोमरप्रासयोधिनः ॥ १७ ॥
राक्षसा निहताः सर्वे तव देव पुरःसराः ।
राजन्! अपने सिरके बाल बिखेरे हुए वे राक्षस यक्षराज कुबेरसे इस प्रकार बोले—‘देव! आपके भी सभी राक्षस, जो युद्धमें सदा आगे रहते और गदा, परिघ, खड्ग, तोमर तथा प्रास आदिके युद्धमें कुशल थे, मार डाले गये ॥ १७ १/२ ॥
प्रमृद्य तरसा शैलं मानुषेण धनेश्वर ॥ १८ ॥
एकेन सहिताः सङ्ख्ये रणे क्रोधवशा गणाः ।
‘धनेश्वर! एक मनुष्यने बलपूर्वक इस पर्वतको रौंद डाला है और युद्धमें क्रोधवश नामक राक्षसगणोंको मार भगाया है ॥ १८ १/२ ॥
प्रवरा राक्षसेन्द्राणां यक्षाणां च नराधिप ॥ १९ ॥
शेरते निहता देव गतसत्त्वाः परासवः ।
लब्धशेषा वयं मुक्ता मणिमांस्ते सखा हतः ॥ २० ॥
'नरेश्वर! राक्षसों और यक्षोंमें जो प्रमुख वीर थे, वे आज उत्साहशून्य तथा निष्प्राण होकर रणभूमिमें सो रहे हैं। हमलोग उसके कृपा-प्रसादसे छूट गये हैं; परंतु आपके सखा राक्षस मणिमान् मार डाले गये हैं ॥ १९-२० ॥ मानुषेण कृतं कर्म विधत्स्व यदनन्तरम् । स तच्छ्रुत्वा तु संक्रुद्धः सर्वयक्षगणाधिपः ॥ २१ ॥ कोपसंरक्तनयनः कथमित्यब्रवीद् वचः । 'यह सब कार्य एक मनुष्यने किया है। इसके बाद जो करना उचित हो, वह कीजिये।' राक्षसोंकी यह बात सुनकर समस्त यक्षगणोंके स्वामी कुबेर कुपित हो उठे, क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे सहसा बोल उठे। 'यह कैसे सम्भव हुआ?' ॥ २१ १/२ ॥ द्वितीयमपराध्यन्तं भीमं श्रुत्वा धनेश्वरः ॥ २२ ॥ चुक्रोध यक्षाधिपतिर्युज्यतामिति चाब्रवीत् । भीमने यह दूसरा अपराध किया है, यह सुनकर धनाध्यक्ष यक्षराजके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने तुरंत आज्ञा दी, 'रथ जोतकर ले आओ' ॥ २२ १/२ ॥ अथाभ्रघनसंकाशं गिरिशृङ्गमिवोच्छ्रितम् ॥ २३ ॥ रथं संयोजयामासुर्गन्धर्वैर्हेममालिभिः । तस्य सर्वगुणोपेता विमलाक्षा हयोत्तमाः ॥ २४ ॥ तेजोबलगुणोपेता नानारत्नविभूषिताः । शोभमाना रथे युक्तास्तरिष्यन्त इवाशुगाः ॥ २५ ॥ फिर तो सेवकोंने सुनहरे बादलोंकी घटाके सदृश विशाल पर्वतशिखरके समान ऊँचा रथ जोतकर तैयार किया। उसमें सुवर्णमालाओंसे विभूषित गन्धर्वदेशीय घोड़े जुते हुए थे। वे सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अश्व तेजस्वी, बलवान् और अश्वोचित गुणोंसे युक्त थे। उनकी आँखें निर्मल थीं और उन्हें नाना प्रकारके रत्नमय आभूषण पहनाये गये थे। रथमें जुते हुए वे शोभाशाली अश्व शीघ्रगामी थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो वे अभी सब कुछ लाँघ जायँगे ॥ २३—२५ ॥ ह्रेषयामासुरन्योन्यं ह्रेषितैर्विजयावहैः । स तमास्थाय भगवान् राजराजो महारथम् ॥ २६ ॥ प्रययौ देवगन्धर्वैः स्तूयमानो महाद्युतिः । उन अश्वोंके हिनहिनानेकी आवाज विजयकी सूचना देनेवाली थी। उनमेंसे प्रत्येक अश्व स्वयं हिनहिनाकर दूसरेको भी इसके लिये प्रेरणा देता था। उस विशाल रथपर आरूढ़ हो महातेजस्वी राजाधिराज भगवान् कुबेर देवताओं और गन्धर्वोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए चले ॥ २६ १/२ ॥ तं प्रयान्तं महात्मानं सर्वे यक्षा धनाधिपम् ॥ २७ ॥ धनाध्यक्ष महामना कुबेरके प्रस्थान करनेपर समस्त यक्ष भी उनके साथ चले ॥ २७ ॥
रक्ताक्षा हेमसंकाशा महाकाया महाबलाः । सायुधा बद्धनिस्त्रिंशा यक्षा दशशतावराः ॥ २८ ॥ उन सबके नेत्र लाल थे। शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सभी महाकाय और महाबली थे। वे सब तलवार बाँधे अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे। उनकी संख्या एक हजारसे कम नहीं थी ॥ २८ ॥
ते जवेन महावेगाः प्लवमाना विहायसा । गन्धमादनमाजग्मुः प्रकर्षन्त इवाम्बरम् ॥ २९ ॥ वे महान् वेगशाली यक्ष आकाशमें उड़ते हुए गन्धमादन पर्वतपर आये, मानो समूचे आकाशमण्डल-को खींचे ले रहे हों ॥ २९ ॥
तत् केसरिमहाजालं धनाधिपतिपालितम् । कुबेरं च महात्मानं यक्षरक्षोगणावृतम् ॥ ३० ॥ ददृशुर्हृष्टरोमाणः पाण्डवाः प्रियदर्शनम् । कुबेरस्तु महासत्त्वान् पाण्डोः पुत्रान् महारथान् ॥ ३१ ॥ आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशान् दृष्ट्वा प्रीतोऽभवत् तदा । देवकार्यं चिकीर्षन् स हृदयेन तुतोष ह ॥ ३२ ॥ धनाध्यक्ष कुबेरके द्वारा पालित घोड़ोंके उस महा समुदायको तथा यक्ष-राक्षसोंसे घिरे हुए प्रियदर्शन महामना कुबेरको भी पाण्डवोंने देखा। देखकर उनके अंगोंमें रोमाञ्च हो आया। इधर कुबेर भी धनुष और तलवार लिये शक्तिशाली महारथी पाण्डुपुत्रोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। कुबेर देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहते थे, इसलिये मन-ही-मन पाण्डवोंसे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३०—३२ ॥
ते पक्षिण इवापेतुर्गिरिशृङ्गं महाजवाः । तस्थुस्तेषां समभ्याशे धनेश्वरपुरःसराः ॥ ३३ ॥ वे कुबेर आदि तीव्र वेगशाली यक्ष-राक्षस पक्षीकी तरह उड़कर गन्धमादन पर्वतके शिखरपर आये और पाण्डवोंके समीप खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
ततस्तं हृष्टमनसं पाण्डवान् प्रति भारत । समीक्ष्य यक्षगन्धर्वा निर्विकारमवस्थिताः ॥ ३४ ॥ जनमेजय! पाण्डवोंके प्रति कुबेरका मन प्रसन्न देखकर यक्ष और गन्धर्व निर्विकारभावसे खड़े रहे ॥ ३४ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानः प्रणम्य धनदं प्रभुम् । नकुलः सहदेवश्च धर्मपुत्रश्च धर्मवित् ॥ ३५ ॥ अपराद्धमिवात्मानं मन्यमाना महारथाः । तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे परिवार्य धनेश्वरम् ॥ ३६ ॥
धर्मज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव—ये महारथी महामना पाण्डव भगवान् कुबेरको प्रणाम करके अपनेको अपराधी-सा मानते हुए उन्हें सब ओरसे घेरकर हाथ जोड़े खड़े रहे ॥ ३५-३६ ॥
स ह्वासनवरं श्रीमत् पुष्पकं विश्वकर्मणा ।
विहितं चित्रपर्यन्तमातिष्ठत धनाधिपः ॥ ३७ ॥
धनाध्यक्ष कुबेर विश्वकर्माके बनाये हुए सुन्दर एवं श्रेष्ठ विमान पुष्पकपर विराजमान थे। वह विमान विचित्र निर्माणकौशलकी पराकाष्ठा था ॥ ३७ ॥
तमासीनं महाकायाः शङ्कुकर्णा महाजवाः ।
उपोपविविशुर्यक्षा राक्षसाश्च सहस्रशः ॥ ३८ ॥
शतशश्चापि गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ।
परिवार्योपतिष्ठन्त यथा देवाः शतक्रतुम् ॥ ३९ ॥
विमानपर बैठे हुए कुबेरके पास कील-जैसी कानवाले तीव्र वेगशाली विशालकाय सहस्रों यक्ष-राक्षस भी बैठे थे। जैसे देवता इन्द्रको घेरकर खड़े होते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों गन्धर्व और अप्सराओंके गण कुबेरको सब ओरसे घेरकर खड़े थे ॥ ३८-३९ ॥
काञ्चनीं शिरसा बिभ्रद् भीमसेनः स्रजं शुभाम् ।
पाशखड्गधनुष्पाणिरुदैक्षत धनाधिपम् ॥ ४० ॥
अपने मस्तकपर सुवर्णकी सुन्दर माला धारण किये और हाथोंमें खड्ग, पाश तथा धनुष लिये भीमसेन धनाध्यक्ष कुबेरकी ओर देख रहे थे ॥ ४० ॥
भीमसेनस्य न ग्लानिर्विक्षतस्यापि राक्षसैः ।
आसीत् तस्यामवस्थायां कुबेरमपि पश्यतः ॥ ४१ ॥
भीमसेनको राक्षसोंने बहुत घायल कर दिया था। उस अवस्थामें भी कुबेरको देखकर उनके मनमें तनिक भी ग्लानि नहीं होती थी ॥ ४१ ॥
आददानं शितान् बाणान् योद्धुकाममवस्थितम् ।
दृष्ट्वा भीमं धर्मसुतमब्रवीन्नरवाहनः ॥ ४२ ॥
भीमसेन हाथोंमें तीखे बाण लिये उस समय भी युद्धके लिये तैयार खड़े थे। यह देख नरवाहन कुबेरने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ४२ ॥
विदुस्त्वां सर्वभूतानि पार्थ भूतहिते रतम् ।
निर्भयश्चापि शैलाग्रे वस त्वं भ्रातृभिः सह ॥ ४३ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुम सदा सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हो, यह बात सब प्राणी जानते हैं। अतः तुम अपने भाइयोंके साथ इस शैल-शिखरपर निर्भय होकर रहो ॥ ४३ ॥
न च मन्युस्त्वया कार्यों भीमसेनस्य पाण्डव ।
कालेनैते हताः पूर्वं निमित्तमनुजस्तव ॥ ४४ ॥
'पाण्डुनन्दन! तुम्हें भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये। ये यक्ष और राक्षस कालके द्वारा पहले ही मारे गये थे। तुम्हारे भाई तो इसमें निमित्तमात्र हुए हैं ।। ४४ ।।
व्रीडा चात्र न कर्तव्या साहसं यदिदं कृतम् ।
दृष्टश्चापि सुरैः पूर्वं विनाशो यक्षरक्षसाम् ।। ४५ ।।
'भीमसेनने जो यह दुःसाहसका कार्य किया है, इसके लिये तुम्हें लज्जित नहीं होना चाहिये; क्योंकि यक्ष तथा राक्षसोंका यह विनाश देवताओंको पहले ही प्रत्यक्ष हो चुका था ।। ४५ ।।
न भीमसेने कोपो मे प्रीतोऽस्मि भरतर्षभ ।
कर्मणाः भीमसेनस्य मम तुष्टिरभूत् पुरा ।। ४६ ।।
'भरतश्रेष्ठ! भीमसेनपर मेरा क्रोध नहीं है। मैं इनपर प्रसन्न हूँ। भीमसेनके कार्यसे मुझे पहले भी प्रसन्नता प्राप्त हो चुकी है' ।। ४६ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानं भीमसेनमभाषत ।
नैतन्मनसि मे तात वर्तते कुरुसत्तम ।। ४७ ।।
यदिदं साहसं भीम कृष्णार्थे कृतवानसि ।
मामनादृत्य देवांश्च विनाशं यक्षरक्षसाम् ।। ४८ ।।
स्वबाहुबलमाश्रित्य तेनाहं प्रीतिमांस्त्वयि ।
शापादद्य विनिर्मुक्तो घोरादस्मि वृकोदर ।। ४९ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर कुबेरने भीमसेनसे कहा—'तात! कुरुश्रेष्ठ भीम! तुमने द्रौपदीके लिये जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इसके लिये मेरे मनमें कोई विचार नहीं है। तुमने मेरी तथा देवताओंकी अवहेलना करके अपने बाहुबलके भरोसे यक्षों तथा राक्षसोंका विनाश किया है, इससे तुमपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। वृकोदर! आज मैं एक भयंकर शापसे छूट गया हूँ ।। ४७—४९ ।।
अहं पूर्वमगस्त्येन क्रुद्धेन परमर्षिणा ।
शप्तोऽपराधे कस्मिंश्चित् तस्यैषा निष्कृतिः कृता ।। ५० ।।
दृष्टो हि मम संक्लेशः पुरा पाण्डवनन्दन ।
न तवात्रापराधोऽस्ति कथंचिदपि पाण्डव ।। ५१ ।।
'पूर्वकालकी बात है, महर्षि अगस्त्यने किसी अपराधपर कुपित हो मुझे शाप दे दिया था; उसका तुम्हारे द्वारा निराकरण हुआ। पाण्डव-नन्दन! मुझे पूर्वकालसे ही यह दुःख देखना बदा था। इसमें तुम्हारा किसी तरह भी कोई अपराध नहीं है' ।। ५०-५१ ।।
युधिष्ठिर उवाच
कथं शप्तोऽसि भगवन्नगस्त्येन महात्मना ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव तवैतच्छापकारणम् ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! महात्मा अगस्त्यने आपको कैसे शाप दे दिया? देव! आपको शाप मिलनेका क्या कारण है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ५२ ॥
इदं चाश्चर्यभूतं मे यत् क्रोधात् तस्य धीमतः ।
तदैव त्वं न निर्दग्धः सबलः सपदानुगः ॥ ५३ ॥
मुझे इस बातके लिये बड़ा आश्चर्य होता है कि उन बुद्धिमान् महर्षिके क्रोधसे आप उसी समय अपने सेवकों और सैनिकोंसहित जलकर भस्म क्यों नहीं हो गये? ॥ ५३ ॥
धनेश्वर उवाच
देवतानामभून्मन्त्रः कुशवत्यां नरेश्वर ।
वृतस्तत्राहमगमं महापद्मशतैस्त्रिभिः ॥ ५४ ॥
कुबेर बोले— नरेश्वर! प्राचीन कालमें कुशवतीमें देवताओंकी मन्त्रणा-सभा बैठी थी। उसमें मुझे भी बुलाया गया था। मैं तीन सौ महापद्म यक्षोंके साथ वहाँ गया ॥ ५४ ॥
यक्षाणां घोररूपाणां विविधा战धारिणाम् ।
अध्वन्यहमथापश्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ ५५ ॥
उग्रं तपस्तप्यमानं यमुनातीरमाश्रितम् ।
नानापक्षिगणाकीर्णं पुष्पितद्रुमशोभितम् ॥ ५६ ॥
वे भयानक यक्ष नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे। रास्तेमें मुझे मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी दिखायी दिये, जो यमुनाके तटपर कठोर तपस्या कर रहे थे। वह प्रदेश भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे व्याप्त और विकसित वृक्षावलियोंसे सुशोभित था ॥ ५५-५६ ॥
तमूर्ध्वबाहुं दृष्ट्वैव सूर्यस्याभिमुखे स्थितम् ।
तेजोराशिं दीप्यमानं हुताशनमिवैधितम् ॥ ५७ ॥
महर्षि अगस्त्य अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाये सूर्यकी ओर मुँह करके खड़े थे। वे तेजोराशि महात्मा प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ५७ ॥
राक्षसाधिपतिः श्रीमान् मणिमान्नाम मे सखा ।
मौर्ख्यादज्ञानभावाच्च दर्पान्मोहाच्च पार्थिव ॥ ५८ ॥
न्यष्ठीवदाकाशगतो महर्षेस्तस्य मूर्धनि ।
स कोपान्मामुवाचेदं दिशः सर्वा दहन्निव ॥ ५९ ॥
राजन्! उन्हें देखकर ही मेरे एक मित्र राक्षसराज श्रीमणिमान्ने मूर्खता, अज्ञान, अभिमान एवं मोहके कारण आकाशसे उन महर्षिके मस्तकपर थूक दिया। तब वे क्रोधसे मानो सारी दिशाओंको दग्ध करते हुए मुझसे इस प्रकार बोले— ॥ ५८–५९ ॥
मामवज्ञाय दुष्टात्मा यस्मादेष सखा तव ।
धर्षणां कृतवानेतां पश्यतस्ते धनेश्वर ॥ ६० ॥
तस्मात् सहैभिः सैन्यैस्ते वधं प्राप्स्यति मानुषात् ।
त्वं चाप्येभिर्हतैः सैन्यैः क्लेशं प्राप्स्यह दुर्मतिः ।
तमेव मानुषं दृष्ट्वा किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसे ॥ ६१ ॥
‘धनेश्वर! तुम्हारे इस दुष्टात्मा सखाने मेरी अवहेलना करके तुम्हारे देखते-देखते जो मेरा इस प्रकार तिरस्कार किया है, उसके फलस्वरूप इन समस्त सैनिकोंके साथ यह एक मनुष्यके हाथसे मारा जायगा। तुम्हारी बुद्धि खोटी हो गयी है, अतः इन सब सैनिकोंके मारे जानेपर उनके लिये दुःख उठानेके पश्चात् तुम फिर उसी मनुष्यका दर्शन करके मेरे शाप एवं पापसे छुटकारा पा सकोगे ॥
सैन्यानां तु तवैतेषां पुत्रपौत्रबलान्वितम् ।
न शापं प्राप्स्यते घोरं तत् तवाज्ञां करिष्यति ॥ ६२ ॥
‘इन सैनिकोंमेंसे जो तुम्हारी आज्ञाका पालन करेगा, वह पुत्र, पौत्र तथा सेनापर लागू होनेवाले इस भयंकर शापके प्रभावसे अलग रहेगा’ ॥ ६२ ॥
एष शापो मया प्राप्तः प्राक् तस्मादृषिसत्तमात् ।
स भीमेन महाराज भ्रात्रा तव विमोक्षितः ॥ ६३ ॥
महाराज युधिष्ठिर! पूर्व कालमें उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे यही शाप मुझे प्राप्त हुआ था, जिससे तुम्हारे भाई भीमसेनने छुटकारा दिलाया है ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरदर्शने
एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरदर्शनविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥
१६२-
द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान
धनद उवाच
युधिष्ठिर धृतिर्दाक्ष्यं देशकालपराक्रमाः ।
लोकतन्त्रविधानानामेष पञ्चविधो विधिः ॥ १ ॥
कुबेर बोले—युधिष्ठिर! धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम—ये पाँच लौकिक कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं ॥ १ ॥
धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत ।
पराक्रमविधानज्ञा नरा कृतयुगेऽभवन् ॥ २ ॥
भारत! सत्ययुगमें सब मनुष्य धैर्यवान्, अपने-अपने कार्यमें कुशल तथा पराक्रमविधिके ज्ञाता थे ॥ २ ॥
धृतिमान् देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित् ।
क्षत्रियः क्षत्रियश्रेष्ठ प्रशास्ति पृथिवीं चिरम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियश्रेष्ठ! जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश-कालको समझनेवाला तथा सम्पूर्ण धर्मोंके विधानका ज्ञाता है, वह दीर्घकालतक इस पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ ३ ॥
य एवं वर्तते पार्थ पुरुषः सर्वकर्मसु ।
स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम् ॥ ४ ॥
देशकालान्तरप्रेप्सुः कृत्वा शक्रः पराक्रमम् ।
सम्प्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभिः सह ॥ ५ ॥
वीर पार्थ! जो पुरुष इसी प्रकार सब कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, वह लोकमें सुयश और परलोकमें उत्तम गति पाता है। देश-कालके अन्तरपर दृष्टि रखनेवाले वृत्रासुर-विनाशक इन्द्रने वसुओंसहित पराक्रम करके स्वर्गका राज्य प्राप्त किया है ॥ ४-५ ॥
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते ।
पापात्मा पापबुद्धिर्यः पापमेवानुवर्तते ॥ ६ ॥
जो केवल क्रोधके वशीभूत हो अपने पतनको नहीं देखता है, वह पापबुद्धि पापात्मा पुरुष पापका ही अनुसरण करता है ॥ ६ ॥
कर्मणामविभागज्ञः प्रेत्य चेह विनश्यति ।
अकालज्ञः सुदुर्मेधाः कार्याणामविशेषवित् ॥ ७ ॥
जो कर्मोंके विभागको नहीं जानता, समयको नहीं पहचानता और कार्योंके वैशिष्ट्यको नहीं समझता है, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य इहलोक तथा परलोकमें भी नष्ट ही होता है॥ ७॥
वृथाऽऽचारसमारम्भः प्रेत्य चेह विनश्यति।
साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम्॥ ८॥
साहसके कार्योंमें लगे हुए ठग एवं दुरात्मा पुरुषोंके उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान इस लोक और परलोकमें भी व्यर्थ नष्टप्राय ही है॥ ८॥
सर्वसामर्थ्यलिप्सूनां पापो भवति निश्चयः।
अधर्मज्ञोऽवलिप्तश्च बालबुद्धिरमर्षणः॥ ९॥
निर्भयो भीमसेनोऽयं तं शाधि पुरुषर्षभ।
सब प्रकारकी (सांसारिक) सामर्थ्यके इच्छुक मनुष्योंका निश्चय पापपूर्ण होता है। पुरुषरत्न युधिष्ठिर! ये भीमसेन धर्मको नहीं जानते, इन्हें अपने बलका बड़ा अभिमान है, इनकी बुद्धि अभी बालकोंकी-सी है तथा ये अत्यन्त क्रोधी और निर्भय हैं, अतः तुम इन्हें उपदेश देकर काबूमें रखो॥ ९ १/२॥
आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेः प्राप्य भूयस्त्वमाश्रमम्॥ १०॥
तामिस्रं प्रथमं पक्षं वीतशोकभयो वस।
नरेश्वर! अब पुनः तुम यहाँसे राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाकर कृष्णपक्षभर शोक और भयसे रहित होकर रहो॥ १० १/२॥
अलकाः सह गन्धर्वैर्यक्षाश्च सह किन्नरैः॥ ११॥
मन्नियुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिनः।
रक्षिष्यन्ति महाबाहो सहितं द्विजसत्तमैः॥ १२॥
महाबाहु नरश्रेष्ठ! वहाँ अलकानिवासी यक्ष तथा इस पर्वतपर रहनेवाले सभी प्राणी मेरी आज्ञाके अनुसार गन्धर्वों और किन्नरोंके साथ सदा इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसहित तुम्हारी रक्षा करेंगे॥ ११-१२॥
साहसादनुसम्प्राप्तः प्रतिबुध्यः वृकोदरः।
वार्यतां साध्वयं राजंस्त्वया धर्मभृतां वर॥ १३॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! भीमसेन यहाँ दुःसाहस-पूर्वक आये हैं, यह बात समझाकर इन्हें अच्छी तरह मना कर दो (जिससे ये पुनः कोई अपराध न कर बैठें)॥ १३॥
अतः परं च वो राजन् द्रक्ष्यन्ति वनगोचराः।
उपस्थास्यन्ति वो राजन् रक्षिष्यन्ते च वः सदा॥ १४॥
राजन्! अबसे इस वनमें रहनेवाले सब यक्ष तुमलोगोंकी देख-भाल करेंगे, तुम्हारी सेवामें उपस्थित होंगे और सदा तुम सब लोगोंके संरक्षणमें तत्पर रहेंगे॥ १४॥
तथैव चान्नपानानि स्वादूनि च बहूनि च।