महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1104, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान
धनद उवाच
युधिष्ठिर धृतिर्दाक्ष्यं देशकालपराक्रमाः ।
लोकतन्त्रविधानानामेष पञ्चविधो विधिः ॥ १ ॥
कुबेर बोले—युधिष्ठिर! धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम—ये पाँच लौकिक कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं ॥ १ ॥
धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत ।
पराक्रमविधानज्ञा नरा कृतयुगेऽभवन् ॥ २ ॥
भारत! सत्ययुगमें सब मनुष्य धैर्यवान्, अपने-अपने कार्यमें कुशल तथा पराक्रमविधिके ज्ञाता थे ॥ २ ॥
धृतिमान् देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित् ।
क्षत्रियः क्षत्रियश्रेष्ठ प्रशास्ति पृथिवीं चिरम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियश्रेष्ठ! जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश-कालको समझनेवाला तथा सम्पूर्ण धर्मोंके विधानका ज्ञाता है, वह दीर्घकालतक इस पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ ३ ॥
य एवं वर्तते पार्थ पुरुषः सर्वकर्मसु ।
स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम् ॥ ४ ॥
देशकालान्तरप्रेप्सुः कृत्वा शक्रः पराक्रमम् ।
सम्प्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभिः सह ॥ ५ ॥
वीर पार्थ! जो पुरुष इसी प्रकार सब कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, वह लोकमें सुयश और परलोकमें उत्तम गति पाता है। देश-कालके अन्तरपर दृष्टि रखनेवाले वृत्रासुर-विनाशक इन्द्रने वसुओंसहित पराक्रम करके स्वर्गका राज्य प्राप्त किया है ॥ ४-५ ॥
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते ।
पापात्मा पापबुद्धिर्यः पापमेवानुवर्तते ॥ ६ ॥
जो केवल क्रोधके वशीभूत हो अपने पतनको नहीं देखता है, वह पापबुद्धि पापात्मा पुरुष पापका ही अनुसरण करता है ॥ ६ ॥
कर्मणामविभागज्ञः प्रेत्य चेह विनश्यति ।
अकालज्ञः सुदुर्मेधाः कार्याणामविशेषवित् ॥ ७ ॥