भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1105

जो कर्मोंके विभागको नहीं जानता, समयको नहीं पहचानता और कार्योंके वैशिष्ट्यको नहीं समझता है, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य इहलोक तथा परलोकमें भी नष्ट ही होता है॥ ७॥

वृथाऽऽचारसमारम्भः प्रेत्य चेह विनश्यति।
साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम्॥ ८॥
साहसके कार्योंमें लगे हुए ठग एवं दुरात्मा पुरुषोंके उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान इस लोक और परलोकमें भी व्यर्थ नष्टप्राय ही है॥ ८॥

सर्वसामर्थ्यलिप्सूनां पापो भवति निश्चयः।
अधर्मज्ञोऽवलिप्तश्च बालबुद्धिरमर्षणः॥ ९॥
निर्भयो भीमसेनोऽयं तं शाधि पुरुषर्षभ।
सब प्रकारकी (सांसारिक) सामर्थ्यके इच्छुक मनुष्योंका निश्चय पापपूर्ण होता है। पुरुषरत्न युधिष्ठिर! ये भीमसेन धर्मको नहीं जानते, इन्हें अपने बलका बड़ा अभिमान है, इनकी बुद्धि अभी बालकोंकी-सी है तथा ये अत्यन्त क्रोधी और निर्भय हैं, अतः तुम इन्हें उपदेश देकर काबूमें रखो॥ ९ १/२॥

आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेः प्राप्य भूयस्त्वमाश्रमम्॥ १०॥
तामिस्रं प्रथमं पक्षं वीतशोकभयो वस।
नरेश्वर! अब पुनः तुम यहाँसे राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाकर कृष्णपक्षभर शोक और भयसे रहित होकर रहो॥ १० १/२॥

अलकाः सह गन्धर्वैर्यक्षाश्च सह किन्नरैः॥ ११॥
मन्नियुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिनः।
रक्षिष्यन्ति महाबाहो सहितं द्विजसत्तमैः॥ १२॥
महाबाहु नरश्रेष्ठ! वहाँ अलकानिवासी यक्ष तथा इस पर्वतपर रहनेवाले सभी प्राणी मेरी आज्ञाके अनुसार गन्धर्वों और किन्नरोंके साथ सदा इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसहित तुम्हारी रक्षा करेंगे॥ ११-१२॥

साहसादनुसम्प्राप्तः प्रतिबुध्यः वृकोदरः।
वार्यतां साध्वयं राजंस्त्वया धर्मभृतां वर॥ १३॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! भीमसेन यहाँ दुःसाहस-पूर्वक आये हैं, यह बात समझाकर इन्हें अच्छी तरह मना कर दो (जिससे ये पुनः कोई अपराध न कर बैठें)॥ १३॥

अतः परं च वो राजन् द्रक्ष्यन्ति वनगोचराः।
उपस्थास्यन्ति वो राजन् रक्षिष्यन्ते च वः सदा॥ १४॥
राजन्! अबसे इस वनमें रहनेवाले सब यक्ष तुमलोगोंकी देख-भाल करेंगे, तुम्हारी सेवामें उपस्थित होंगे और सदा तुम सब लोगोंके संरक्षणमें तत्पर रहेंगे॥ १४॥

तथैव चान्नपानानि स्वादूनि च बहूनि च।