भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1106, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1106

आहरिष्यन्ति मत्प्रेष्याः सदा वः पुरुषर्षभाः ॥ १५ ॥
पुरुषरत्न पाण्डवो! इसी प्रकार हमारे सेवक तुम्हारे लिये वहाँ सदा स्वादिष्ट अन्न-पान प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत करते रहेंगे ॥ १५ ॥
यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वायोर्वृकोदरः ।
धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निजः सुतः ॥ १६ ॥
आत्मज्ञावात्मसम्पन्नौ यमौ चोभौ यथाश्विनोः ।
रक्ष्यास्तद्वन्ममापीह यूयं सर्वे युधिष्ठिर ॥ १७ ॥
तात युधिष्ठिर! जैसे अर्जुन देवराज इन्द्रके, भीमसेन वायुदेवके और तुम धर्मराजके योगबलसे उत्पन्न किये हुए निजी पुत्र होनेके कारण उनके द्वारा रक्षणीय हो तथा ये दोनों आत्मबलसम्पन्न नकुल-सहदेव जैसे दोनों अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न होनेके कारण उनके पालनीय हैं, उसी प्रकार यहाँ मेरे लिये भी तुम सब लोग रक्षणीय हो ॥ १६-१७ ॥
अर्थतत्त्वविधानज्ञः सर्वधर्मविधानवित् ।
भीमसेनादवरजः फाल्गुनः कुशली दिवि ॥ १८ ॥
अर्थतत्त्वकी विधिके ज्ञाता और सम्पूर्ण धर्मोंके विधानमें कुशल अर्जुन, जो भीमसेनसे छोटे हैं, इस समय कुशलतापूर्वक स्वर्गलोकमें विराज रहे हैं ॥ १८ ॥
याः काश्चन मता लोके स्वर्ग्याः परमसम्पदः ।
जन्मप्रभृति ताः सर्वाः स्थितास्तात धनंजये ॥ १९ ॥
तात! संसारमें जो कोई भी स्वर्गीय श्रेष्ठ सम्पत्तियाँ मानी गयी हैं, वे सब अर्जुनमें जन्मकालसे ही स्थित हैं ॥ १९ ॥
दमो दानं बलं बुद्धिर्हीर्धृतिस्तेज उत्तमम् ।
एतान्यपि महासत्त्वे स्थितान्यमिततेजसि ॥ २० ॥
अमित तेजस्वी और महान् सत्त्वशाली अर्जुनमें दम (इन्द्रिय-संयम), दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज—ये सभी सद्गुण विद्यमान हैं ॥ २० ॥
न मोहात् कुरुते जिष्णुः कर्म पाण्डव गर्हितम् ।
न पार्थस्य मृषोक्तानि कथयन्ति नरा नृषु ॥ २१ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हारे भाई अर्जुन कभी मोहवश निन्दित कर्म नहीं करते। मनुष्य आपसमें कभी अर्जुनके मिथ्याभाषणकी चर्चा नहीं करते हैं ॥ २१ ॥
स देवपितृगन्धर्वैः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ।
मानितः कुरुतेऽस्त्राणि शक्रसद्मनि भारत ॥ २२ ॥
भारत! कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले अर्जुन इन्द्रभवनमें देवताओं, पितरों तथा गन्धर्वोंसे सम्मानित हो अस्त्रविद्याका अभ्यास करते हैं ॥ २२ ॥
योऽसौ सर्वान् महीपालान् धर्मेण वशमानयत् ।
स शान्तनुर्महातेजाः पितुस्तव पितामहः ॥ २३ ॥