महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1107, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रीयते पार्थ पार्थेन दिवि गाण्डीवधन्वना । सम्यक् चासौ महावीर्यः कुलधुर्येण पार्थिवः ॥ २४ ॥ पार्थ! जिन्होंने सब राजाओंको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया था, वे महातेजस्वी, महापराक्रमी तथा सदाचारपरायण महाराज शान्तनु, जो तुम्हारे पिताके पितामह थे, स्वर्गलोकमें कुरुकुलधुरीण गाण्डीवधारी अर्जुनसे बहुत प्रसन्न रहते हैं ॥ २३-२४ ॥ पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् पूजयित्वा महातपाः । सप्त मुख्यान् महामेधानाहरद् यमुनां प्रति ॥ २५ ॥ अधिराजः स राजंस्त्वां शान्तनुः प्रपितामहः । स्वर्गजिच्छक्रलोकस्थः कुशलं परिपृच्छति ॥ २६ ॥ महातपस्वी शान्तनुने देवताओं, पितरों, ऋषियों तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करके यमुना-तटपर सात बड़े-बड़े अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजन्! वे तुम्हारे प्रपितामह राजाधिराज शान्तनु स्वर्गलोकको जीतकर उसीमें निवास करते हैं। उन्होंने मुझसे तुम्हारी कुशल पूछी थी ॥ २५-२६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं धनदेन प्रभाषितम् । पाण्डवाश्च ततस्तेन वभूवुः सम्प्रहर्षिताः ॥ २७ ॥ ततः शक्तिं गदां खड्गं धनुश्च भरतर्षभः । प्राध्वं कृत्वा नमश्चक्रे कुबेराय वृकोदरः ॥ २८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुबेरकी कही हुई ये बातें सुनकर पाण्डवोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर भरतकुल-भूषण भीमसेनने उठायी हुई शक्ति गदा, खड्ग और धनुषको नीचे करके कुबेरको नमस्कार किया ॥ ततोऽब्रवीद् धनाध्यक्षः शरण्यः शरणागतम् । मानहा भव शत्रूणां सुहृदां नन्दिवर्धनः ॥ २९ ॥ तब शरण देनेवाले धनाध्यक्ष कुबेरने अपनी शरणमें आये हुए भीमसेनसे कहा—'पाण्डुनन्दन! तुम शत्रुओंका मान मर्दन और सुहृदोंका आनन्द वर्धन करनेवाले बनो ॥ २९ ॥