भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1089

उनके हाथमें गदा, खड्ग और धनुष शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने जीवनका मोह सर्वथा छोड़ दिया था। वे माहबाहु भीमसेन वहाँ पर्वतकी भाँति अविचल-भावसे कुछ देर खड़े रहे। तत्पश्चात् उन्होंने बड़े जोरसे शंख बजाया, जिसकी आवाज शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। फिर धनुषकी टंकार करके समस्त प्राणियोंको मोहित कर दिया ।। ४५-४६ ।। ततः प्रहृष्टरोमाणस्तं शब्दमभिदुद्रुवुः । यक्षराक्षसगन्धर्वाः पाण्डवस्य समीपतः ।। ४७ ।। तब यक्ष, राक्षस और गन्धर्व रोमाञ्चित होकर उस शब्दको लक्ष्य करके पाण्डुनन्दन भीमसेनके समीप दौड़े आये ।। ४७ ।। गदापरिघनिस्त्रिंशशूलशक्तिपरश्वधाः । प्रगृहीता व्यरोचन्त यक्षराक्षसबाहूभिः ।। ४८ ।। उस समय गदा, परिघ, खड्ग, शूल, शक्ति और फरसे आदि अस्त्र-शस्त्र उन यक्षों तथा राक्षसोंके हाथोंमें आकर बड़ी चमक पैदा कर रहे थे ।। ४८ ।। ततः प्रवृत्ते युद्धं तेषां तस्य च भारत । तैः प्रयुक्तान् महामायैः शूलशक्तिपरश्वधान् ।। ४९ ।। भल्लैर्भीमः प्रचिच्छेद भीमवेगत रैस्ततः । अन्तरिक्षगतानां च भूमिष्ठानां च गर्जताम् ।। ५० ।। शरैर्विव्याध गात्राणि राक्षसानां महाबलः । सा लोहितमहावृष्टिरभ्यवर्षन्महाबलम् ।। ५१ ।। गदापरिघपाणीनां रक्षसां कायसम्भवाः । कायेभ्यः प्रच्युता धारा राक्षसानां समन्ततः ।। ५२ ।। भारत! तदनन्तर उन यक्षों और गन्धर्वोंका भीमसेनके साथ युद्ध प्रारम्भ हो गया। वे यक्ष और राक्षस बड़े मायावी थे। उनके चलाये हुए शूल, शक्ति और फरसोंको भीमसेनने भयानक वेगशाली भल्ल नामक बाणोंद्वारा काट गिराया। वे राक्षस आकाशमें उड़कर तथा भूतलपर खड़े होकर जोर-जोरसे गर्जना कर रहे थे। महाबली भीमने बाणोंकी झड़ी लगाकर उनके शरीरोंको अच्छी प्रकार छेद डाला। गदा और परिघ हाथमें लिये हुए राक्षसोंके शरीरसे महाबली भीमपर खूनकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी तथा चारों ओर राक्षसोंके शरीरसे रक्तकी कितनी ही धाराएँ बह चलीं ।। ४९-५२ ।। भीमबाहुबलोत्सृष्टैरायुधैर्यक्षरक्षसाम् । विनिकृत्तानि दृश्यन्ते शरीराणि शिरांसि च ।। ५३ ।। भीमके बाहुबलसे छूटे हुए अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा यक्षों तथा राक्षसोंके शरीर और सिर कटे दिखायी दे रहे थे ।। प्रच्छाद्यमानं रक्षोभिः पाण्डवं प्रियदर्शनम् ।