भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1090

ददृशुः सर्वभूतानि सूर्यमभ्रगणैरिव ॥ ५४ ॥ जैसे बादल सूर्यको ढक लेते हैं, उसी प्रकार प्रियदर्शन पाण्डुपुत्र भीमको राक्षस ढक लेते हैं, यह सब प्राणियोंने प्रत्यक्ष देखा ॥ ५४ ॥

स रश्मिभिरिवादित्यः शरैररिनिघातिभिः । सर्वान्वाच्छन्महाबाहुर्बलवान् सत्यविक्रमः ॥ ५५ ॥ तब सत्यपराक्रमी बलवान् महाबाहु भीमसेनने अपने शत्रुनाशक बाणोंद्वारा समस्त शत्रुओंको उसी प्रकार ढक लिया, जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे संसारको ढक लेते हैं ॥ ५५ ॥

अभितर्जयमानाश्च रुवन्तश्च महारवान् । न मोहं भीमसेनस्य ददृशुः सर्वराक्षसाः ॥ ५६ ॥ सब ओरसे गर्जन-तर्जन करते हुए तथा बड़ी भयानक आवाजसे चिग्घाड़ते हुए सब राक्षसोंने भीमसेनके चित्तमें तनिक भी घबराहट नहीं देखी ॥ ५६ ॥

यक्षा विकृतसर्वाङ्गा भीमसेनभयार्दिताः । भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहायुधाः ॥ ५७ ॥ जिनके सारे अंग विकृत एवं विकराल थे, वे यक्ष भीमसेनके भयसे पीड़ित हो अपने बड़े-बड़े आयुधोंको इधर-उधर फेंककर भयंकर आर्तनाद करने लगे ॥ ५७ ॥

उत्सृज्य ते गदाशूलानसिशक्तिपरश्वधान् । दक्षिणां दिशमाजग्मुस्त्रसिता दृढधन्वना ॥ ५८ ॥ सुदृढ़ धनुषवाले भीमसेनसे आतंकित हो वे यक्ष-राक्षस आदि योद्धा गदा, शूल, खड्ग, शक्ति तथा परशु आदि अस्त्रोंको वहीं छोड़कर दक्षिणदिशाकी ओर भाग गये ॥ ५८ ॥

तत्र शूलगदापाणिर्व्यूढोरस्को महाभुजः । सखा वैश्रवणस्यासीन्मणिमान्नाम राक्षसः ॥ ५९ ॥ वहाँ कुबेरके सखा राक्षसप्रवर मणिमान् भी मौजूद थे। उनके हाथोंमें त्रिशूल और गदा शोभा पा रही थी उनकी छाती चौड़ी और बाँहें विशाल थीं ॥ ५९ ॥

अदर्शयदधीकारं पौरुषं च महाबलः । स तान् दृष्ट्वा परावृत्तान् स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ६० ॥ उन महाबली वीरने वहाँ अपने अधिकार और पौरुष दोनोंको प्रकट किया। उस समय अपने सैनिकोंको रणसे विमुख होते देख वे मुसकराते हुए उनसे बोले— ॥ ६० ॥

एकेन बहवः सङ्ख्ये मानुषेण पराजिताः । प्राप्य वैश्रवणावासं किं वक्ष्यथ धनेश्वरम् ॥ ६१ ॥ 'अरे! तुम बहुत बड़ी संख्यामें होकर भी आज एक मनुष्यद्वारा युद्धमें पराजित हो गये।' कुबेरभवनमें धनाध्यक्षके पास जाकर क्या कहोगे?' ॥ ६१ ॥

एवमाभाष्य तान् सर्वानभ्यवर्तत राक्षसः ।