महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘युधिष्ठिर! यदि पहले बकासुरने भीमसेनको छोड़ दिया, तो आज मैं तुम्हारे देखते-देखते इसे खा जाऊँगा ।। ३६ ।। एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम् । सम्भक्ष्य जरयिष्यामि यथागस्त्यो महासुरम् ।। ३७ ।। ‘जैसे महर्षि अगस्त्यने वातापि नामक महान् राक्षसको खाकर पचा लिया, उसी प्रकार मैं भी इस महाबली भीमको मारकर खा जाऊँगा और पचा लूँगा’ ।। ३७ ।। एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सत्यसंधो युधिष्ठिरः । नैतदस्तीति संक्रोधो भर्त्सयामास राक्षसम् ।। ३८ ।। उसके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ युधिष्ठिरने कुपित हो उस राक्षसको फटकारते हुए कहा—‘ऐसा कभी नहीं हो सकता’ ।। ३८ ।। ततो भीमो महाबाहुरारुज्य तरसा द्रुमम् । दशव्याममथोद्विद्धं निष्पत्रमकरोत् तदा ।। ३९ ।। तदनन्तर महाबाहु भीमसेनने बड़े वेगसे हिलाकर एक दस व्याम* लम्बे वृक्षको उखाड़ लिया और उसके पत्ते झाड़ दिये ।। ३९ ।। चकार सज्यं गाण्डीवं वज्रनिष्पेषगौरवम् । निमेषान्तरमात्रेण तथैव विजयोऽर्जुनः ।। ४० ।। इधर विजयी अर्जुनने भी पलक मारते-मारते अपने उस गाण्डीव धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी, जिसे वज्रको भी पीस डालनेका गौरव प्राप्त था ।। ४० ।। निवार्य भीमो जिष्णुं तं तद् रक्षो मेघनिःस्वनम् । अभिद्रुत्याब्रवीद् वाक्यं तिष्ठ तिष्ठेति भारत ।। ४१ ।। भारत! भीमसेनने अर्जुनको रोक दिया और मेघके समान गर्जना करनेवाले उस राक्षसपर आक्रमण करते हुए कहा—‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ।। ४१ ।। इत्युक्त्वैनमतिक्रुद्धः कक्ष्यामुत्पीड्य पाण्डवः । निष्पिष्य पाणिना पाणिं संदष्टौष्ठपुटो बली ।। ४२ ।। तमभ्यधावद् वेगेन भीमो वृक्षायुधस्तदा । यमदण्डप्रतीकाशं ततस्तं तस्य मूर्धनि ।। ४३ ।। पातयामास वेगेन कुलिशं मघवानिव । असम्भ्रान्तं तु तद् रक्षः समरे प्रत्यदृश्यत ।। ४४ ।। ऐसा कहकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् पाण्डुनन्दन भीमने वस्त्रसे अच्छी तरह अपनी कमर कस ली और हाथ-से-हाथ रगड़कर दाँतोंसे ओंठ चबाते हुए वृक्षको ही आयुध बनाकर बड़े वेगसे उसकी तरफ दौड़े और जैसे इन्द्र वज्रका प्रहार करते हैं, उसी प्रकार यमदण्डके समान उस भयंकर वृक्षको राक्षसके मस्तकपर उन्होंने बड़े जोरसे दे मारा। तो भी वह निशाचर युद्धमें अविचलभावसे खड़ा दिखायी दिया ।। ४२—४४ ।।