महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिक्षेप चोल्मुकं दीप्तमशनिं ज्वलितामिव । तदुदस्तमलातं तु भीमः प्रहरतां वरः ॥ ४५ ॥ पदा सव्येन चिक्षेप तद् रक्षः पुनराव्रजत् । किर्मीरश्चापि सहसा वृक्षमुत्पाट्य पाण्डवम् ॥ ४६ ॥ दण्डपाणिरिव क्रुद्धः समरे प्रत्यधावत । तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् ॥ ४७ ॥ वालिसुग्रीवयोर्भ्रात्रोर्यथा स्त्रीकाङ्क्षिणोः पुरा । तत्पश्चात् उसने भी प्रज्वलित वज्रके समान जलता हुआ काठ भीमके ऊपर फेंका, परंतु योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमने उस जलते काठको अपने बाँयें पैरसे मारकर इस तरह फेंका कि वह पुनः उस राक्षसपर ही जा गिरा। फिर तो किर्मीरने भी सहसा एक वृक्ष उखाड़ लिया और क्रोधमें भरे हुए दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस युद्धमें पाण्डुकुमार भीमपर आक्रमण किया। जैसे पूर्वकालमें स्त्रीकी अभिलाषा रखनेवाले वाली और सुग्रीव दोनों भाइयोंमें भारी युद्ध हुआ था, उसी प्रकार उन दोनोंका वह वृक्षयुद्ध वनके वृक्षोंका विनाशक था ॥ ४५—४७ १/२ ॥
शीर्षयोः पतिता वृक्षा बिभिदुर्नैकधा तयोः ॥ ४८ ॥ यथैवोत्पलपत्राणि मत्तयोर्द्विपयोस्तथा । जैसे दो मतवाले गजराजोंके मस्तकपर पड़े हुए कमलपत्र क्षणभरमें छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाते हैं, वैसे ही उन दोनोंके मस्तकपर पड़े हुए वृक्षोंके अनेक टुकड़े हो जाते थे ॥ ४८ १/२ ॥
मुञ्जवज्जर्जरीभूता बहवस्तत्र पादपाः ॥ ४९ ॥ चीराणीव व्युदस्तानि रेजुस्तत्र महावने । तद् वृक्षयुद्धमभवन्मुहूर्तं भरतर्षभ । राक्षसानां च मुख्यस्य नराणामुत्तमस्य च ॥ ५० ॥ वहाँ उस महान् वनमें बहुत-से वृक्ष मूँजकी भाँति जर्जर हो गये थे। वे फटे चीथड़ोंकी तरह इधर-उधर फैले हुए सुशोभित होते थे। भरतश्रेष्ठ! राक्षसराज किर्मीर और मनुष्योंमें श्रेष्ठ भीमसेनका वह वृक्षयुद्ध दो घड़ीतक चलता रहा ॥ ४९-५० ॥
ततः शिलां समुत्क्षिप्य भीमस्य युधि तिष्ठतः । प्राहिणोद् राक्षसः क्रुद्धो भीमश्च न चचाल ह ॥ ५१ ॥ तदनन्तर राक्षसने कुपित हो एक पत्थरकी चट्टान लेकर युद्धमें खड़े हुए भीमसेनपर चलायी। भीम उसके प्रहारसे जडवत् हो गये ॥ ५१ ॥
तं शिलाताडनजडं पर्यधावत राक्षसः । बाहुविक्षिप्तकिरणः स्वर्भानुरिव भास्करम् ॥ ५२ ॥