महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे शिलाके आघातसे जडवत् हो रहे थे। उस अवस्थामें वह राक्षस भीमसेनकी ओर उसी तरह दौड़ा जैसे राहु अपनी भुजाओंसे सूर्यकी किरणोंका निवारण करते हुए उनपर आक्रमण करता है॥ ५२॥ तावन्त्योन्यं समाश्लिष्य प्रकर्षन्तौ परस्परम्। उभावपि चकाशेते प्रवृद्धौ वृषभाविव॥ ५३॥ वे दोनों वीर परस्पर भिड़ गये और दोनों दोनोंको खींचने लगे। दो हृष्ट-पुष्ट साँड़ोंकी भाँति परस्पर भिड़े हुए उन दोनों योद्धाओंकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ५३॥ तयोरासीत् सुतुमुलः सम्प्रहारः सुदारुणः। नखदंष्ट्रायुधवतोर्व्याघ्रयोरिव दृप्तयोः॥ ५४॥ नख और दाढ़ोंसे ही आयुधका काम लेनेवाले दो उन्मत्त व्याघ्रोंकी भाँति उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्ध छिड़ा हुआ था॥ ५४॥ दुर्योधननिकाराच्च बाहुवीर्याच्च दर्पितः। कृष्णानयनदृष्टश्च व्यवर्धत वृकोदरः॥ ५५॥ दुर्योधनके द्वारा प्राप्त हुए तिरस्कारसे तथा अपने बाहुबलसे भीमसेनका शौर्य एवं अभिमान जाग उठा था। इधर द्रौपदी भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे उनकी ओर देख रही थी; अतः वे उस युद्धमें उत्तरोत्तर उत्साहित हो रहे थे॥ ५५॥ अभिषद्य च बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णादमर्षितः। मातङ्गमिव मातङ्गः प्रभिन्नकरटामुखम्॥ ५६॥ उन्होंने अमर्षमें भरकर सहसा आक्रमण करके दोनों भुजाओंसे उस राक्षसको उसी तरह पकड़ लिया, जैसे मतवाला गजराज गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले दूसरे हाथीसे भिड़ जाता है॥ ५६॥ स चाप्येनं ततो रक्षः प्रतिजग्राह वीर्यवान्। तमाक्षिपद् भीमसेनो बलेन बलिनां वरः॥ ५७॥ उस बलवान् राक्षसने भी भीमसेनको दोनों भुजाओंसे पकड़ लिया; तब बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उसे बलपूर्वक दूर फेंक दिया॥ ५७॥ तयोर्भुजविनिष्पेषामुभयोर्बलिनोस्तदा। शब्दः समभवद् घोरो वेणुस्फोटसमो युधि॥ ५८॥ अथैनमाक्षिप्य बलाद् गृह्य मध्ये वृकोदरः। धूनयामास वेगेन वायुश्चण्ड इव द्रुमम्॥ ५९॥ युद्धमें उन दोनों बलवानोंकी भुजाओंकी रगड़से बाँसके फटनेके समान भयंकर शब्द हो रहा था। जैसे प्रचण्ड वायु अपने वेगसे वृक्षको झकझोर देती है, उसी प्रकार भीमसेनने बलपूर्वक उछलकर उसकी कमर पकड़ ली और उस राक्षसको बड़े वेगसे घुमाना आरम्भ किया॥ ५८-५९॥