भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 1118

विभावसुर्भावयतेऽमितौजाः । तस्योदयं चास्तमनं च वीरा- स्तत्र स्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ॥ ९ ॥ जिन भगवान् सूर्यका आश्रय लेकर अमित तेजस्वी अग्निदेव सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंका पोषण करते हैं, उनके उदय और अस्तकी लीलाको पुरुषसिंह वीर पाण्डव वहाँ रहकर स्पष्ट देखते थे ॥ ९ ॥

रवेस्तमिस्रागमनिर्गमांस्ते तथोदयं चास्तमनं च वीराः । समावृताः प्रेक्ष्य तमोनुदस्य गभस्तिजालैः प्रदिशो दिशश्च ॥ १० ॥ स्वाध्यायवन्तः सततक्रियाश्च धर्मप्रधानाश्च शुचिव्रताश्च । सत्ये स्थितास्तस्य महारथस्य सत्यव्रतस्यागमनप्रतीक्षाः ॥ ११ ॥ वे वीर पाण्डव वहाँसे अन्धकारके आगमन और निर्गमनको अन्धकारविनाशक भगवान् सूर्यके उदय और अस्तकी लीलाको तथा उनके किरणसमूहोंसे व्याप्त हुई सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको देखकर स्वाध्यायमें संलग्न रहते थे। सदा शुभकर्मोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहकर प्रधानरूपसे धर्मका ही आश्रय लेते थे। उनका आचार-व्यवहार अत्यन्त पवित्र था। वे सत्यमें स्थित होकर सत्यव्रतपरायण महारथी अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ १०-११ ॥

इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनंजयेन । इति ब्रुवन्तः परमाशिषस्ते पार्थास्तपोयोगपरा बभूवुः ॥ १२ ॥ ‘इस पर्वतपर आये हुए हम सब लोगोंको यहीं अस्त्रविद्या सीखकर पधारे हुए अर्जुनके दर्शनसे शीघ्र ही अत्यन्त हर्षकी प्राप्ति हो;’ इस प्रकार परस्पर शुभ-कामना प्रकट करते हुए वे सभी कुन्तीपुत्र तप और योगके साधनमें संलग्न रहते थे ॥ १२ ॥

दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि किरीटिनं चिन्तयतामभीक्ष्णम् । बभूव रात्रिर्दिवसश्च तेषां संवत्सरेणैव समानरूपः ॥ १३ ॥ उस पर्वतपर विचित्र वन-कुंजोंकी शोभा देखते और निरन्तर अर्जुनका चिन्तन करते हुए पाण्डवोंको एक दिन-रातका समय एक वर्षके समान प्रतीत होता था ॥ १३ ॥