महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदैव धौम्यानुमते महात्मा कृत्वा जटां प्रव्रजितः स जिष्णुः। तदैव तेषां न बभूव हर्षः कुतो रतिस्तद्गतमानसानाम् ॥ १४ ॥ जबसे धौम्य मुनिकी आज्ञा लेकर महामना अर्जुन सिरपर जटा धारण करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुए थे, तभीसे उन पाण्डवोंके मनमें रंचमात्र भी हर्ष नहीं रह गया था। उनका मन निरन्तर अर्जुनमें ही लगा रहता था। ऐसी दशामें उन्हें सुख कैसे प्राप्त हो सकता था? ॥ १४ ॥
भ्रातुर्नियोगात् तु युधिष्ठिरस्य वनादसौ वारणमत्तगामी। यत् काम्यकात् प्रव्रजितः स जिष्णु- स्तदैव ते शोकहता बभूवुः ॥ १५ ॥ गजराजके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले वे अर्जुन जब बड़े भाई युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर काम्यक वनसे प्रस्थित हुए थे, तभी समस्त पाण्डव शोकसे पीड़ित हो गये थे ॥ १५ ॥
तथैव तं चिन्तयतां सिताश्व- मस्त्रार्थिनं वासवमभ्युपेतम्। मासोऽथ कृच्छ्रेण तदा व्यतीत- स्तस्मिन् नगे भारत भारतानाम् ॥ १६ ॥ जनमेजय! अस्त्रविद्याकी अभिलाषासे देवराज इन्द्रके समीप गये हुए श्वेतवाहन अर्जुनका चिन्तन करनेवाले पाण्डवोंका एक मास उस पर्वतपर बड़ी कठिनाईसे व्यतीत हुआ ॥ १६ ॥
उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षनिवेशने। अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि विबुधेश्वरात् ॥ १७ ॥ आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम्। ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ॥ १८ ॥ यमस्य धातुः सवितुस्त्वष्टुर्वैश्रवणस्य च। तानि प्राप्य सहस्राक्षादभिवाद्य शतक्रतुम् ॥ १९ ॥ अनुज्ञातस्तदा तेन कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। आगच्छदर्जुनः प्रीतः प्रहृष्टो गन्धमादनम् ॥ २० ॥ इधर अर्जुनने इन्द्र-भवनमें पाँच वर्ष रहकर देवेश्वर इन्द्रसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। इस प्रकार अग्नि, वरुण, सोम, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, ब्रह्मा, परमेष्ठी, प्रजापति, यम, धाता, सविता, त्वष्टा तथा कुबेरसम्बन्धी अस्त्रोंको भी देवेन्द्रसे ही प्राप्त करके उन्हें