महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ।
यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ ॥ ७ ॥
यच्चापि वज्रपाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम ।
एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय ॥ ८ ॥
‘महातेजस्वी वीर! मैं ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप अर्जुन! जिस प्रकार तुम्हारे ऊपर महादेवजी तथा देवराज इन्द्र संतुष्ट हुए और वज्रधारी इन्द्रका जो प्रिय कार्य तुमने सम्पन्न किया है, वह सब पूर्णरूपसे बताओ’ ॥ ७-८ ॥
अर्जुन उवाच
शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् ।
शतक्रतुमहं देवं भगवन्तं च शङ्करम् ॥ ९ ॥
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन ।
भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम् ॥ १० ॥
अर्जुन बोले— महाराज! मैंने जिस विधिसे देवराज इन्द्र तथा भगवान् शंकरका दर्शन किया था, वह सब बतलाता हूँ, सुनिये! शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश! आपकी बतायी हुई विद्याको ग्रहण करके आपहीके आदेशसे मैं तपस्या करनेके लिये वनकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ९-१० ॥
भृगुतुङ्गमथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तपः ।
एकरात्रोषितः कञ्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि ॥ ११ ॥
काम्यक वनसे चलकर तपस्यामें पूरी आशा रखकर मैं भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचा और वहाँ एक रात रहकर जब आगे बढ़ा, तब मार्गमें किसी ब्राह्मणदेवताका मुझे दर्शन हुआ ॥ ११ ॥
स मामपृच्छत् कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे ।
तस्मा अवितथं सर्वमब्रुवं कुरुनन्दन ॥ १२ ॥
उन्होंने मुझसे कहा—‘कुन्तीनन्दन! कहाँ जाते हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।’ तब मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बता दिया ॥ १२ ॥
स तथ्यं मम तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम ।
अपूजयत मां राजन् प्रीतिमांश्चाभवन्मयि ॥ १३ ॥
नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणदेवताने मेरी यथार्थ बातें सुनकर मेरी प्रशंसा की और मुझपर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १३ ॥
ततो मामब्रवीत् प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत ।
तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विबुधाधिपम् ॥ १४ ॥